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अथूम ब्रह्मणा
दुर्गति-नाशिनि दुर्गा जय-जय, काल-विनाशिनि काली जय जय । उम्ा-रमा-ब्रहद्माणी जय जय, राधा-सीता-रुक्मणि जय जब ॥ साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, साम्ब सदाशिव, जय शंकर। हर हर शंकर दुखहर सुखकर अघ-तम-हर हर हर शंकर ॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ जय-जय दुर्गा, जब मा तारा। जय गणेश जय शुभ-आगारा॥ जयति शिवाशिव जानकिराम । गौरीशंकर सीताराम ॥ जय रघुनन्दन जय सियाराम | ब्रज-गोपी-प्रिय राधेशश ॥ रघुपति राघव राजाराम। पतितपावन सीता
(संस्करण १,७५,०००) रे #अफकशकऋअऊ
करफक फकफ्रक पफ्क्रफ फरिऊर्क्र आफ फ के
भगवान् श्रीहरि सबका कल्या» करें अहम कम
यद्योगिभिर्भवभयार्तिविनाशयोग्यमासादय वन्दितमतीव विविक्तचित्तैः । तह: पुनातु. हरिपादसरोजयुग्ममाविर्भवत्करमविलड्वितभूभुवः स्व: ॥ पायत्स 5: सकलकल्मषभेददक्षः क्षीरोदकुक्षिफणिभोगनिविष्टमूर्ति: । श्वासावधूत्सलिलोत्कलिकाकराल: सिन्धुः प्रनृत्यमिव यस्य करोति सड्जत् ॥ नारायण नमसस््कृत्य नरं चैत्र नरोत्तमम्। देवीं सरस्वती व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥
! जिनमें जन्म-मुत्युरूप संसारके भय और पीडाओंका नाश करनेकी पूर्ण योग्यता है, पवित्र अन्तःकरणवाले योगिजन जिन्हें ध्यानमें देखकर बारम्बार मस्तक झुकाते हैं, जो वामनरूपसे विराट्रूप धारण करते समय प्रकट होकर क्रमशः भूलोंक, भुवलोंक तथा खर्गलोकको भी लाँघ गये थे, श्रीहरिके वे दोनों चरणकमल आपलोगोंको पवित्र करते रहें । जो समस्त पापोंका संहार करनेमें समर्थ हैं, जिनका श्रीविग्रह क्षीरसागरके गर्भमें शेषनागकी शय्यापर शयन करता है उन्हीं शेषनागकी श्वास-वायुसे कम्पित हुएजलकी उत्ताल तरझेंके कारण विकराल प्रतीत होनेवाला समुद्र जिनका सत्सड्ढ पाकर प्रसन्नतासे नृत्य-सा करता जान पड़ता है, वे भगवान् नाययण आपलोगोंकी रक्षा करते रहें। भगवान् नारायण, पुरुषश्रष् नर, उनकी लीला प्रक्रट करनेवाली भगवती सरस्वती तथा उसके वक्ता महर्षि बेटव्यासको नमस्कार करके "जम!
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मनन 8 2072: 07: नम कक का पाठ करना चाहिये। बी फफ़फफ क्रफ+# ४ फर्क दक्ष फक+ फर्फफफ्फ्क्फफकफफफ कक ्रफऊ ऊंडडफफ फेज फेक फफ फफफ कफ कक कफ फ कफफफऋऊ 59४5 इस अड्डक्ा पृल्य
पावक रवि चद्ध जयति जय । सत-चित-आनैंद भूमा जय जय ॥
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यार्षिक शुल्क जय पाव (डाक-व्ययसहित ) (डाक-व्ययसहित) मारतमें ४४.०० रु > जय जेब विश्वरूप हरि जय । जय हर अखिलात्मन् जय जय ॥ < भारतमें ४४.०० मे" विदेशमें ६ पौंड विदेशमे ६ पड़ 0 का ले गम पल लक १० डालर जय विराद जय जगत्पते | गोरीपति.. जब. रमापते || अथवा ९० डाला
संघ्यापऋ--ब्रह्मलीन परप श्रद्धेय थ्रीजयदयालजी गोयन्दका आदिघवम्एदक--नित्यलीलालीन भ्राइंजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार
सनाएक-- राधैश्याम खेमका
मोव्ल्दिभवन-कार्यलियके लिये जगदीशप्रसाद जालानद्वारा शीताप्रेस, गोर्खपुरस मुद्रित तथा अकाशिते |
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कप, के -नसकर
'कल्याण'के सम्मान्य आराहकों ओर प्रेमी पाठकोंसे नम्न निवेदन
१-'कल्याण'के ६३वें वर्ष (वि संवत् २०४६) का यह विशेषाड्लः 'पुराणकथाडू” पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत है। इसमें ४३८ पृष्ठोमें पाउय्सामग्री और १० पृष्ठोंमें सूची आदि हैं। कई बहुरंगे तथा सादे चित्र भी यथास्थान दिये गये हें।
२-जिन आहकोंसे शुल्क-राशि अग्रिम मनीआर्डरद्वारा प्राप्त हो चुकी हे, उन्हें “विशेषाडु” सोर बैशाख-अड्डके सहित रजिस्ट्री्वारा भेजे जा रहे हैं तथा जिनसे शुल्क-राशि प्राप्त नहीं हुई है, उन्हें अड्डू बजचनेपर ही ग्राहक-संख्याके क्रमानुसार दीग्पीग्पी० द्वारा भेजा जा सकेगा। रजिस्ट्रीकी अपेक्षा वी० पी० पी० द्वारा 'विशेषाह्ृ” भेजनेमें डाकखर्च अधिक लगता है, अतः आहक महानुभावोंसे विनम्र अनुरोध है कि वे वी० पी० पी० की प्रतीक्षा और अपेक्षा न करके अपने तथा 'कल्याण'के हितमें वार्षिक शुल्क-राशि कृपया मनीआर्डरद्वारा ही भेजें . एण'का वार्षिक शुल्क डाकखर्चसहित ४४.०० (चौवालीस) रू० मात्र है, जो मात्र विशेषाड्डुका ही मूल्थ” हे।
३-आहक सज्जन कृपया मनीआर्डर-कूपनपर अपनी आहक-संख्या अवश्य लिखें। ग्राहक-संख्या या “पुराना ग्राहर्!ः न लिखनेसे आपका नाम नये आहकोंमें लिखा जा सकता है, जिससे आपकी सेवामें 'पुराणकथाडू” नयी ग्राहक-संख्याके . क्रमसे पहुँतेगा और पुरानी आहक-संख्याके क्रमसे इसकी वी० पी० - पी० भी जा सकती हे। ऐसा भी हो सकता है कि उधरसे आप शुल्क-राशि मनीआर्डरसे भेज दें ओर उसके यहाँ पहुँचनेके पहले ही इधरसे वी" पी० पी० भी चली जाय। ऐसी स्थितिमें आपसे प्रार्थना है कि आप कृपया वी० पी० पी० लोटायें नहीं, अपितु ग्रयत्न करके किन््हीं अन्य सज्जनको 'नया आहक' बनाकर वी० पी० पी० से भेजे गये “कल्याण'अड्जू उन्हें दे दें और उनका नाम तथा पूरा पता सुस्पष्ट, सुवाच्य लिपिमें लिखकर हमारे कार्यालयको भेजनेका अनुग्रह करें। आपके इस कृपापूर्ण सहयोगसे आपका अपना “कल्याण” व्यर्थ डाक-व्ययकी हानिसे तो बचेगा ही, इस प्रकार आप भी “कल्याण'के पावन ग्रचारमें सहायक एवं सहयोगी बनकर पुण्यके भागी होंगे।
४-विशेषाड्ड् 'पुराणकथाडुू'के साथमें सोर वैशाख वि० सं० २०४६का (दूसरा) अछ्डू भी आहकोंकी सेवामें (शीघ्र और सुरक्षित पहुँचानेकी दृष्टिसे) रजिस्टर्ड पोस्टसे भेजा जा रहा है। यद्यपि यथाशकक्य तत्परता - ओर शीघ्रता करनेपर भी सभी ग्राहकोंको अछ्ढू भेजनेमें अनुमानतः ६-७ सप्ताह तो लग ही सकते हैं, तथापि विशेषाह्ु! आहक-संख्याके क्रमानुसार ही .भेजनेकी प्रक्रिया होनेसे किन्हीं महानुभावोंको अड्ड: कुछ विलम्बसे मिलें तो वे अपरिहार्य कारण समझकर कृपया हमें क्षमा करेंगे।
५-विशेषाडुके लिफाफे (रैपर) पर आपकी जो आहक-संख्या लिखी गयी है, उसे आप कृपया पूर्ण सावधानीसे नोट कर लें। रजिस्ट्री या ती० पी० पी०्का नंबर भी नोट कर लेना ' चाहिये, जिससे आवश्यकतानुसार पत्राचारके समय उल्लेख किया जा सके। इससे कार्यकी सम्पन्नतामें शीघ्रता एवं सुविधा होगी एवं कार्यालयक्मी शक्ति और समय व्यर्थ नष्ट होनेसे बचेंगे।
६-'कल्याण'-व्यवस्था-विभाग एवं. “गीताप्रेस-पुस्तक-विक्रय-विभाग” को. अलग-अलग समझकर सम्बन्धित पत्र, पार्सल, पैकेट, मनीआर्डर, बीमा आदि पृथक्-पृथक् पतोंपर भेजने चाहिये। पतेके स्थानपर केवल “गोरखपुर' ही न लिखकर पत्रालय--गीताप्रेस, गोरखपुरके साथ पिन-२७३००५ भी अवश्य लिखना चाहिये ।
व्यवस्थायफ--'कल्याण ' -कार्यालय, पत्रालय--गीताप्रेस, गोरखपुर, पिन-२७३००५७
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श्रीगीता-रामायण-प्रचार-संघ श्रीमरूगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस दोनों विश्व-साहित्यके अमूल्य अन्थ-रत्र हैं। इनके पठन-पाठन एवं मननसे मनुष्य लोक-परलोक दोनोंमें अपना कल्याण-साधन कर सकता है। इनके स्वाध्यायमें वर्ण, आश्रम, जाति, अवस्था आदि. कोई भी बाधक नहीं है। आजके समयमें इन दिव्य अन्धथोंके पाठ और ग्रचारकी अत्यधिक आवश्यकता है। अतः धर्मपरायण जनताको इन कल्याणमय अमन्थोंमें प्रतिपादित सिद्धान्तों एवं विचारोंसे अधिकाधिक लाभ पहुँचानेके सदुद्देश्यसे श्रीगीता-रामायण-प्रचार-संघकी स्थापना की गयी है। इसके सदस्योंकी संख्या इस समय लगभग बावन हज़ार है। इसमें श्रीगीताके छः प्रकारके और श्रीरामचरितमानसके तीन प्रकारके सदस्य बनाये गये हैं। इसके अतिरिक्त उपासना-विभागके अन्तर्गत नित्य इष्टदेवके नामका जप, ध्यान ओर मूर्तिकी पूजा अथवा मानसिक पूजा करनेवाले सदस्यॉकी श्रेणी भी है। इन सभीको श्रीमद्धमवदगीता एवं श्रीरामचचरितमानसके नियमित अध्ययन तथा उपासनाकी सत्प्रेरणा दी जाती है। सदस्यताका कोई शुल्क नहीं है। इच्छुक सज्जन परिचय-पुस्तिका निःशुल्क मैंगवाकर पूरी जानकारी प्राप्त करनेकी कृपा करें एवं श्रीगीताजी और श्रीरामचरितमानसके प्रचार-यज्ञमें सम्मिलित होकर अपने जीवनका कल्याणमय पथ अ्रशस्त करें। । पत्र-व्यवहारका पता--मन्त्री, श्रीगीता-रामायण-प्रचार-संघ, पत्रोालय--स्वर्गाभ्रम---२४९३०४ (वाया-ऋषिकेश ), जनपद--पौड़ी-गढ़वाल (उ० ज्र०) साधक-सघ मानव-जीवनकी सर्वतोमुखी सफलता आत्म-विकासपर ही अवलम्बित है। आत्म-विकासके लिये जीवनमें सत्यता, सरलता, निष्कपटता, सदाचार, भगवत्परायणता आदि दैवी गुणोंका अहण और असत्य, क्रोध, लोभ, मोह, द्वेष, हिंसा आदि आसुरी गुणोंका त्याग ही एकमात्र श्रेष्ठ और सरल उपाय है। मनुष्यमात्रको इस सत्यसे अवगत करानेके पावन उच्देश्य्से लगभग ४१ वर्षपूर्व 'साधक-संघ'की स्थापना की गयी थी। इसका सदस्यता-शुल्क नहीं है। सभी कल्याणकामी स्त्री-पुरुषोंको इसका सदस्य बनना चाहिये। सदस्योंके लिये ग्रहण करनेके १९ और त्याग करनेके १९६ नियम बने हैं। प्रत्येक सदस्यको एक 'साधक-दैनन्दिनी' एवं एक 'आवेदन-पत्र' भेजा जाता है, सदस्य बननेके इच्छुक भाई-बहनोंको (इधरमें डाक-खर्चमें विशेष चृद्धि हो जानेके कारण साथक-दैनन्दिनीका मूल्य ०.४५पैसे तथा डाकखर्च ०.३ ०पैसे) मात्र ०.७५८पैसे डाक्रटिकट या मनीआर्डरद्वारा अग्रिम भेजकर उन्हें मैगवा लेना चाहिये। साधक 322: > 028 नियम-पालनका ॥ विशेष जानकारीके लिये कृपया निःशुल्क नियमात्र कस इ्वारा-- 'कल्याण' सम्पादन-विभाग, पत्रालय--गीताप्रेस, जनपद--“गोरखपुर--२७३००५ (उ० अ०) _....._ श्रीगीता-रामायण-परीक्षा-समिति हरी कल ह ५ ; श्रीमद्धगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस दोनों मज्जलमय एर्व ता तल नल समस्याओंका समाधान मिल जाता है तथा जीवनमें अपूर्व सुख-श के है और करोड़ों मनुष्योंने इनके अनुवादोंको भी पढ़कर अवर्णनीय लाभ विश्वमें इन अमूल्य ग्रन्थोका समादर न टिक परिकत करनेकी दृष्टिसे श्रीमद्गवदगीता किया गया है। दोनों अन्थोंकी परीक्षाओंमें बैठनेवाले लगभग और श्रीरामचरितिमानसकी परीक्षाओंका अबन्ध नह नियमित कहर बीस हजार परीक्षार्थियोंके लिये ४०० (चार सो) परीक्षा
निम्नलिख्बित पतेपर पत्र-व्यवहार करें । नि की वस्थापक--ओऔगीता-रामायण-परीक्षा-समिति, पत्रालय--स्वगश्रिम, . पि (वांया-ऋषिकेश ) , जनपद--पौड़ी-गढ़वाल (3० अ्र०)
पुराणकथाडू'की विषय-सूची
विषय पृष्ठ-संख्या
१ -पुराण-विग्रह भगवान् विष्णु 2883 «6 ० «जज ४३ 5 ७ ४5 किन श् मड़लाचरण---
२-स्वस्त्ययन २०० ००००००००५०५००७०००००००००७००७००००+००००»० २
३-विधज्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् : ०8०7० हब 2० है नहर ३
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"-सुभद्रश्नवसे नमो नमः **००-००००००००००००००००००* रु
६-त॑ शह्डरं शरणदं शरण व्रजामि *********०***-** ७-नमामि ते रूपमिदं भवानि ! “-वेदव्यासं सर्वदाह नमामि ९-व्याससूनु नतो5स्मि १०-पुराण-महिमा ११-कीर्तनीय: सदा हरिः प्रसाद-आशीवादि-- १२-पुराण (अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य श्रीमद्ब्रह्मानन्द सरस्वतीजी महाराजके उपदेशामृत) १३-पुराणोंमें धर्म और सदाचार (पूज्यपाद अनन्तश्री ब्रह्मलीन स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज) १४-पुराणोंमें भगवन्नाम-महिमा (अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी श्रीकृष्णबोधाश्रमजी महाराज) १५-पुराणोंका परम प्रयोजन--भगवत्माप्ति (ब्रह्मलीन स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज) '* १६-सुहृत्-सम्मित पुरण (अनन्तश्रीविभूषित दक्षिणाम्रायस्थ शुंगेरी-शारदापीठाघीश्वर जगद्गुरु शकराचार्य स्वामी श्रीअभिनवविद्यातीर्थजी महाराज) १७-पुराणोंकी वेदवत् प्रतिष्ठा (अनन्तश्रीविभूषित ऊर्ध्वाग्नाय श्रीकाशी- (सुमेरु) पीठाधीश्वर जगदगुरु ' शंकराचार्य स्वामी श्रीशंकरानन्द सरस्वतीजी महाराज) १८-भगवानको प्रसन्न करनेवाले आठ भाव-पुष्प १९-पुराणोंकी महिमा (अनन्तश्रीविभूषित तमिलनाडुक्षेतस्थ काञ्लीकामकोटिपीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य वरिष्ठ स्वामी श्रीचन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीजी महाराज) ** २०-सभी कथाओंका तात्पर्य--भगवत्म्राप्ति (अनन्तश्रीविभूषित श्रीमद्विष्णुस्वामिमतानुयायी श्रीगोपालवैष्णवपीठाचार्यवर्य श्री १०८ श्रीविइ्लिशजी महाएाज) २१-शार्तप्रतिपादित पुराण-माहात्य - (त्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका)
०१५७ ००७०५ ०५० ७००३७००७००७०७०७००७०००००००००१००००*०७
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विषय २२-पुराणोंका क्रम और सृष्टिविद्याका निरूपण (महामहोपाध्याय स्व० पं० श्रीगिरिधरजी शर्मा चतुर्वेदी) **.. २४
पृष्ठ-संख्या
२३-साधु कोन ? असाधु कोन 7? «5६००००००००००००००००० २७ २४-हिंदू-संस्कृतिके पुराणोपर एक दृष्टि (नित्यलीलालीन
श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोह्दर) ***०*०-०४* २८ २५-मुक्तिकाउपाय (श्रद्धेय स्वामी श्रीयमसुखदासजी महाराज) ** ३१
२६-पुराण-महिमा (पृज्यपाद श्रीदेवराह्य बाबाजी महाराजके अमृत वचन) [प्रेः--श्रीमदनजी शर्मा शास्त्री]
२७-पुयणोंका महत्त्व (पूज्यपाद श्रीप्रभुदत्त त्रह्मचारीजी महाराज) ३४
२८-पुराणोंकी ग्रामाणिकता, दार्शनिकता और महत्ता (स्वामी
श्रीनिश्चवलानन्द सरस्वतीजी महाराज) ***-००+-०००००-- ३५ २९-पुराणकी महिमा एवं माहात्म्य (अनन्तश्री स्वामी माधवाश्रमजी महाराज ) *५*०००००००१००१०००००००००००० ३७ ३०-भारतीय पुराणोंका महत्त्व (श्री १०८ दण्डी स्वामी श्रीविपिनचन्द्रानन्द सरस्वतीजी 'जज स्वामी') **«-«--: ३८ ३१-सिद्धोंकी पौराणिक प्रासंगिकता (गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त-श्रीअरवेद्यनाथजी महाराज) *****-०--०-०--०००-- ३९ ३२-पुराणं सर्वशास्त्राणं प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् (पु० श्रीलालबिहारीजी मिश्र) ४8७2७ बेड ४४४७४ ४००४ २१ ४१ ३३-श्रेष्ठ भगवद्धक्त कौन हैं? "**००००:-०------०--५... ४५ पुराणोंके प्रतिपाद्य विषय--- ३४-प्रधान वर्ण्य विषय ३००७:३४ ४७००७ #« «७ ४७ ४०.०७४०५ ८० ६०० ४६ ३५-पुराणोंमें सभी शास्त्रों, विद्याओं, कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञानका समावेश 2०7 ४० $ ४573: १३ १०००५०००००० ४९ पुराणोंमें जीवन-चर्या--- *-*--:०--:०--०-........ द्ष्र बल रकार ४2«५५३४०४०४५३५४ 2० क ४ ब4३ 2 0077 ६३ 3 3 न आम अर की न ली ल ७8 ३३ ८-दैनिक चर्या *००००००००००००००००००००००००००»० ००», ७५ ३९ -देवोपासना #०००००००००००००००००००००००८०००००००५७ ७९. हा मी शमी हम ला ली जल 3 ४४>बर्णश्रेमघर्म' ह०२०२४०४३ सेशन २७ पटक ४ २४ न ४5६ ५५६ ९२ डर न्आश्रम-व्यवस्था $+६०००००००००००५१०००००००००७००००७०+५०० ९ ८ ड३ -ब्रतोपवास हुगोड बा रंजन कब उ कल ०४ 422०४ के । ०* ०८ * ०००१५ १०१ ४४-दान >२०००००००००००००००००००००००००००००००००००००० १०५ ४५-दानकी महत्ता ***०**००००००००००००००००००००००००००- १०७ ४६-तीर्थ-- ह श् -नदी-रूप त्तीर्थ «४3४०४ ०४४४४ ८६४ ० ०६:०४४३४०:६८०६ न १०८ २ -भारतके पवित्र कुल-पर्वत 3:3७ 2७०४० ६:३४ कल ७ 20० हि १५४ ३-सात मोक्षदायिनी पुरियाँ अर बाद जब 22 2० ४ जाए ११८
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(५) सोमशर्मा
विषय पृष्ठ-संख्या १ ३-तृष्णासे मानवता मर जाती है **-««-------- १५३ १४-सुनीथाकी कथा (ला० बि० मि०) -----०००-- १५३ १५-सीता-शुकी-संवाद (मो० ला० आ०) +*+०---- १५६ १६-सत्कर्ममें श्रमदानका अद्भुत फल (ला० बि० मि०) *" १५८ -विष्णुपुराण--- »२०४४६ ७७१०४ ४०४० पोज पद दर १५९
“स्त्री, शूद्र और कलियुगकी महत्ता (राग्पब्सिंग) -*-
२>घन्य कौन 2 “ये ०४४ हनन 8 57५ ०; १६२ -अतिशोधका त्याग (खा०् ओंग् आग *«००-+«- १६३ ४(क) शिवपुराण-- ***००*००*०*००*००००५०*५«»«»* श्द्द४ड १-नारदजीका कामविजय-विषयक अभिमान -भड्ट **- १६७ २-नल-दमयन्तीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त ***०००००***- १६८ ३-अभिमानी. रावणकी शिव-भक्ति (मन्प्रग्गो०) १६९ ४-किरातवेषधारी शिवजीकी अर्जुनपर कृपा ******* १७० ५-गुणनिधिपर भगवान् शिवकी कृपा (मर्प्रव्गो०) *** १७१ ६-महान् तीर्थ--माता-पिता ४06०४ ४०७४७ ०५३ ४ ढऊ ७०२६४ श्छ२ (ख) बायुपुराण-- --*-:-********-००-०१००*** १७४ १-पुराणवक्ता सूतजी (लाण्बिग्मि०) **४*९५००५५००५* १७५ २-परमात्मरूप शिव ****५००५०००२००००००००००००५* श्७५् ३-लोकहितके लिये विषपान (लाग्बिण्मि०) ****** श्छध ४-कुवलाश्वके द्वारा जगत॒की रक्षा **०*****-******* १७७ "-भक्तका अद्भुत अवदान (लाग्बिष्मि०) ******** १७८ ६-ब्रह्मवेत्ता याज्वल्क्य **+०००००००९०*००*०*०*०****** १७८ ७-जहाँ मन, वहीं हम ********************** १७९ ८-चरणारविन्दोंकी महिमा ***********५९*०९***०९०*** १८० 4-भायवत-- (क) श्रीमद्धायवतपुराण --
१-महर्षि सौभरिकी जीवन-गाथा (पद्मभूषण आचार्य श्रीबलदेवजी उपाध्याय) ***०९*०००***** १८१ २-द्रीपदीकी क्षमाशीलता (स्वा० ओं० आ०) ***** १८५ १८६
३-पिबत भागवत रसम् (आलयम्) (लागबि्मि०) ४-भगवान्का अवतार महान् ज्ञानीमें रसोल्लासके लिये. १८७
५-श्रीमद्धागवरतमें सापेक्षवादका उदाहरण *-१7१९९* १८८ ६-कुसंग परमार्थका बाघक (लाग्बिष्मि०) ******* श्ट्ट ७-दुःख-दर्दकी माँग (लाबबिन्मि०) ***०*००**९*४*** १८९ ८-भगवल्नाम समस्त पापोंको भस्म कर देता है. **** १९० ९-कथा-श्रवणसे भगवल्माप्ति ***०*“““*““८*“****** १९१ (ख) देवीभागवतपुराण--
१-सत्यव्रत भक्त उतथ्य (ह* कृ०् दु०) * १९२
38055 27244 88 १९०
२-सुदर्शनपर जगदम्बाकी कृपा
विषय पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या -तुलसी (का० ना० मे०) ************ १९६ ५-महर्षि वसिष्ठकी क्षमाशीलता ***"**********- २४९ -मुनिवर गौतमद्वारा कृतप्न ब्राह्मणॉको शाप * १९९ ६-आँख खोलनेवाली गाथा ***************** २५० 4-नारदपुराण-- *'**************१*९००**** २०१ ७-संगीतसे भगवद्माप्ति ***९०**०*५०००*०*९६००*०**५** २५१ >देलान अरे २३२ ०४+ ० ह ३३०३० ३ नह 5३ कह 3 मत २०३ ८-भगवदगानमें रोड़ा न अटकावे (ला० बि०मि०) ** २५२ २-भगवान् विष्णुकी आराधना एवं एकादशी-ब्रतकी ९-दरिद्रा कहाँ-कहाँ रहती है ? ***-*********** २५३ महिमा (ह० कु० दु०) **लवन्चनन००«२००२००५०* २०६ १०-द्वादशाक्षर-मन्त्रकी महिमा (ला० बि० मि०) ३४५ २५४ -सत्संग एवं भगवानके चरणोदककी महिमा ११-विश्वासकी विजय ********* #*०००००००००००० २५५ (हैं कर दूं. 3०8 ०+रब्त३>+5 55३४४ न३ढ5 5 २०८ १२-परा एवं अपरा विद्याके ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति २५६ ४-कुसड्भका दुष्परिणाम एवं एकादशी-ब्रतकी महिमा २१० ?१२-वराहपुराण--- ************०**०**००*०***** २५७ ५-पुण्यसलिला भगवती गड्ला (ह० कृष् दु०) ****. २११ १-श्रीवराहावतार-कथा ****०*००००००००००*०- + ००... २५८ -वेदमालिको भगवद्माप्ति **********०**००***- २१३ २-भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकता ***०००००*०० २६० ७-मार्कप्डेयपुराण-- ३-नारायण-मन्त्रकी महिमा ****-०००५०२००००००००० २६१ १-राजा खनिन्नका सद्भाव (म० प्र० गो०) ५ २०७7४ ६:४ २१५ ४-कर्म-रहस्य शहद ०० लव बा ड द बह ५०० 257 302 २६३ २-राजा राज्यवर्धनको भास्करदेवका वरदान ५-दशावतारोंकी उद्धव-तिथियाँ **०*०*०००००००*- र्ध्ड हम बेर और “5३३३ + 5 उन ४३३०१२०उ है 88 > २१७ ६-गणेशजीकी उत्पत्तिका प्रसड़ और ३-विपुलस्वान् मुनि और उनके पुत्रोंकी कथा चतुर्थी-तिथिका माहात्म्य *****०**०*०*००००***- २६५ (म० प्र० गो०) ००४७ ०/४०७:०७ ५७७३४ ०००० लकी ०४४७ ४३० २१८ ७-कीर्तन-फल (स्वा० ओऑ० आ०) कम, कक २६६ ४-राजा विदूरथकी कथा (म* ग्र० गो) ******* २२१ ८-मज्जल-कामना एवं शान्ति-पाठ ***-*****-०**- २६७ ५-श्रीदुर्गासप्तशतीकी संक्षिप्त कथा ********०*०** २२३ ५ ३ -स्कन्दपुराण-- 8००६३ ००४८४ 307८: ८ हक ० शो बढ 5 ४४ ०० ० २६८ ८ -अग्निपुराण-- ढे डर « शा ४७275 2७% २४ #ढड ० कोड बढ 5 २२७ १ -दीर्घायुष्य ण्वं मोक्षके हेतुभूत भगवान् १-जडभरत ओर सौवीर-नरेशका संवाद ********- २२८ शंकरकी आराधना ****०५०००००००००००००००० २६९ २-भगवान् विष्णुका स्वरूप और उनकी प्राप्तिक उपाय. २३१ २-शबर-दम्पतिकी दृढ़ निष्ठा **०००००५००००००००- २७० ९-भविष्यपुराण-- जा ड शक डे ०४८० ८ 5८0७ ०:० ० बेड २३२ ३-सदाचारसे कल्यीग 20005 2 ८ इक (5 रह १-पुराण सुनने-सुनानेका फल *****६*६*०*००००००००० २३३ ४-कीड़ेसे महर्षि मैत्रेय *५०-०००००००००००००००००- २७२ २-भगवान् सूर्यका परिवार ह१०००००००००००००००००० २३३ ५-नन्दभद्र (ह० कु० दु०) +०००००००००००००००००० र्छ्ड ३-भगवान् भास्करकी आराधनाका अद्भुत फल “*. २३४ ६-भारतके कुमारिकाखण्डकी कथा (जाब्नान्श०) ** २७६ ४-कर्तव्यपरायणताका अद्भुत आदर्श ********** र्श्६ ७-भोला भक्त विष्णुदास और चक्रवर्ती ०-ब्रह्मवैवर्तपुराण-- 25 है» "कब ४० लौटे क बेड २३७ सम्राट् चोल (ब० दा० वि०) **-०००००००००-- . २७८ १-श्रीनारदजीका अभिमान-भन्ल “दा र३९ १४-वामनपुराण-- ****-०*०००००००*००००००००- कर २-गरुड, सुदर्शनचक्र और श्रीकृष्णकी अगामनावतार २८ रानियोंका गर्व-भट्ढ *' ०० कक जन २४० १- 34020 | किक 02 के २८१ 3 8 लक लरिक कप ४१५... रेभक्ति बड़ी है या शक्ति 2 "नल २८५ व मो र३.€> रे-तामनपुाणमें वाराणसी (आ० प्र) हनन २८६ ५-गणेशजीपर शनिकी दृष्टि "हनन न न २४३... सेंदर्शनचक्रकी कथा (आ० 50 किक किक २८७ ६-पृथ्वी किनके भारसे पीड़ित रहती है ? **-**-* श४४ड ५-बलिद्वारा भगवान् वामनका संस्तवन ********- २८८ ११-लिड्रपुराण--- *****************०******* र४५ १५-कूर्मपुराण-- ---:--:----०-०-०००००-००००- २८९ १-भक्तिके वश भगवान् (ला० बि० मिं०) ****** २४६ श् श्रीकृर्मावतार-कथा अर म २९० २-ज्योतिर्लिड्ल्डका प्राकद्य ***-० ८० ८ ० *********** २४६ -मानव-जीवनकी चरितार्थता मोक्ष-प्राप्तिमें ३-भक्तिसे सर्वातिशायी सामर्थ्य (ला० बि० मि०) *** २४७ (ला० बि० मि०) ***०*६०५०००००००००००००००००० २९१ ४-रुद्रावतार नन्दीश्वर (ला० बि० मि०) ********* २४८ ३-आसत्तिसे विजेता भी पराजित (ला० बि०मि०) ** २९२
विषय ४-जयघध्वजकी विष्णुभक्ति (म० प्र० गो० ५-शह्डुकर्णसे शहडुकर्णेश्र... ०) / हा: १६-मत्यपुराण-- »०००००० है ९०१३६ ९१ ०*००९**०० १-श्रीमस्यावतारकी कथा **“***००***०*०****** २-श्राद्धकर्मकी महिमा डनलोग् हल ह३ ३ ५५०५५ *९* यम ३-अविमुक्तन्क्षेत्रमें शिवार्चन एवं तपःकर्मसे- यक्षको गणेशत्प्राप्ति ***०**००००***०****** <४-लवणाचल-दानकी महिमा **************** ">मदनद्वादशीत्रतका अद्भुत प्रभाव *********** ५ ७-गरुडपुराणं--- ००००००००००००००००००००१००
१-गया-श्राद्धसे प्रेतल-मुक्ति (ला" बि० मि०) *: २-सोमपुत्री जाम्बव॒ती (*) रत ३-ओऔर्ध्वदेहिक दानका महत्त्व (२ दे” मि०) *'
-प्रेतकल्पकी कथा (शि० दु०) ५-सर्वोपरि साधना--वाक्-संयम (स्वा० ऑ० आ०)
७» ००५००५+००००*०
५ ८ -ब्रह्माण्डपुराण-- ब०००००००००००००००९००००+०००
ढक 8 अंक कक #े के # के के के | व ७ के के के, ०:७६ $ $ + ७ +
-चोरीकी चोरी -आदिशक्ति ललिताम्बा ३-भगवान् श्रीयमको कथाएँ, अति ब्रिय थीं बिविध पौराणिक कथाएँ-- ५१-चौबीस अवतारोंकी कथाएँ-- १-श्रीसनकार्दि २-भगवान् नर-नारयण ३-भगवान् यश '**''** ८4 >ज० जे शडडेडे >र डहह रह -ऋषभदेवके अवतारकी कथा ५-आदिराज पृथुकी अवतार-कथा
0१ ००००+०००००+४७००+०००
९००००००९०००००००००४०००००००००*
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६-धन्वन्तरिके अवतारकी कथा "हट ह
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७-श्रीमोहिनी ८-भगवान् हयग्रीव ९-वामनावतारकी कथा (आए अ्र5) १०-गजेद्रोड्धारक भगवान् श्रीहरि ** ११-परशुरामावतारकी कथा "ही 7 १२-भगवान् व्यास "न न १३-भगवान् श्रीहंस “5 दी ड कजड सके गरह> जहर कचरे
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१५ १६-भगवान् बुद्ध ५२८ १-स्वायम्भुव मनुकी कथा
4७४० ४४६ ७४७ >लेडीन बडे शान क कह का ध है ढँढे ० के के हे हे ४ के के कक
४०९६०५५०६००३०००००१०
[६)
पृष्ठ-संख्या - विषय ४ २९३ २-स्वारोचिष मनुकी कथा २६४६५४४६ ४०४७४ २४७४६ हर २९४... ३-औत्तम मनुकी. कथा (म० फ्रन् गोणे हल रे २९५. ४-तामस मनुकी कथा “० न ०० १० २९६ ५-रैवत मनुकी .क्रथा (म० प्र० गो०) ***+०* के २९७ ६-चाक्षुप मनुकी कथा ७) नल ३५३
. ७-वैव्सत मनुकी कथा (०७) “० शक २९९ ८-सावर्णि मनुकी कथा “लि लिलल न ३५६ ३०१ ९-दक्षसावर्णि; मतुकी कथा “३१ ३५७ ३०१ १०-बह्यमसावर्णि .मनुकी कथा *''**'****०***५* ३५८ . ३०३. ११-धर्मसावर्णि मनुकी कथा **'***** * १४१ ०१ ३५८ ३०५ १२-रुद्रसार्वर्णि--मतुकी कथा ***********+*०***** ३५८ ३०५... १३-रैच्य मतुकी कथा (म० प्र०् गो०े * हा ३०६ श्४ड भौत्य मनुकी कथा *******-*००*०*००*५*९*०५६ ३५९ ३०७. ५३-द्वादश ज्योविर्लिड्रेके आख्यान-- ३११ १-सोमनाथ, (जा ना० श०) ** ४१०१९, ३६० ३१२ २-मल्लिकार्जुन | ०००००*००५०१९५०००००*५५०*५**४***** ३६१ ३१३ ३-महाकालेश्वर (जा० ना० श०) "हा ३६२ ३१४ ४-परमेश्वर. .(ओंकरिश्वर) ** "१४१" ३६२ ३१५ ७-केदरियर 40505 2४% 2252४ 3) ३६३ ६-भीमशंकर (जा” नाण शण्)े "हट ३६३ ७-विश्वेश्वर .. ह (७) ***०००००००००***०९** ३६४ ३१६ “-त्यम्बकेशधर.. (७) ६०**** ३६४ ३१८ ९-वैदनाथेश्व:. 00 हल ३६६ ३२० 7 का आप 20 लक ३६६ ३२९ १ १-श्रीरामेश्वर (७) **'*****९*१*०****** ३६७ ३२२ १२-घुश्मेश्वर (७) *********४००****** ३६७ ३९३ ५४-छबग्बीस एकादशियोंकी कथाएँ-- ३२५ १-अगहन मासकी एकादशियोंकी ३२६ महिमा (ला० बि० मिंण) * 6 हट: ३६८ ३२८ २-पौषमासकी एक्ादशियोंकी महिमा (ला“विर्गमि" ३६९ ३२९ _माघमासकी एकादशियोंकी महिमा(?) ३७० ३३१ ४-फाल्गुनमासकी एकादशियोंकी महिमा *'*'*'* ३७१ ३३३ - एकादशियोंकी महिमा (लाग्विगम०)_ रै४६ ३३६ ००-अद्भुत याचना “हा ३७२ ३३७. ५६-बिना दान दिये परलोकमें भोजन नहीं मिलता *"*.._ रे४३ ३३८. ५७-दानका खरूप (स्ा० ओ० आ०) '*** ४९०*** ३७३ ३४० ७५८-पाँच महातीर्थ ५२००४ बज सेल > आज रेड बने बट हज हर ० ३७६ ३४१ १-पितृती र्थ *० ३७६ ३४३ २-पतितीर्ध ५८2 20450% जे डचक २ कलह ह १8 ३७६
# ०७००७ ०+७०७७७००७०००००७९७५००७७०७०७७०७ ७ ०००७७ ++०७०७०७०००७७७७०७५७०५५+५०७०७७०७७ ७ 4 बा9 ७99० कक ००००-७9 कक ७३०७० ०७०५७ ००५७
७० ०००+७० ०७०० ७००+५७०७०७०७००७०५०५७७
७५९-पञ्चगड़ा-माहात्य ६०-उत्कलदेशके पुरुषोत्तम-क्षेत्रकी महिमा ६१-गौओंको घास खिलानेसे श्राद्ध-फल ६२-कार्तिकमासका माहात्य (१) कार्तिकमें भगवान् और वेदका जलमें निजास (२) कार्तिक-श्रतके पुण्यदानसे एक राक्षसीका उद्धार ६३-माघमासका माहात्म्य (१) माघमासके पुण्यदानसे चार प्राणियोंका उद्धार ** (२) माघ-स््रानसे दिव्यलोककी प्राप्ति (ला० बि० मि०) ६४-ब्रह्मचर्यके आदर्श-- १-श्रीहनुमानजी २-उत्तड्डू ६५-दानधर्मके आदर्श-- १-दैत्यगज विरोचन २-महादानी कर्ण ३-दानधर्मकी महिमा ६६-देवी षष्ठीकी कथा ६७-नागपञ्चमी-त्रत-माहात्म्य (शि० पृ० पा०) ६८-उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप ब्रत ६९-उपपुराण एवं उनके रोचक आख्यान --- १-गणेशपुराण-- ० ********०**०+**** १-सच्ची निष्ठाका फल २-नृपश्रेष्ठ वरेण्यपर भगवान् गजाननकी कृपा (ह० कृन्दु०) २ -नरसिंहयुराण--- ७४०००००००००००००००००५०००००+५० १-नृसिंहावतार-कथा २-एकमात्र कर्तव्य क्या है ? ३-कल्किपुराण-- *-*****------४-००**-**०*- १-कल्कि-अवतारकी कथा.
+$०७५०७०००७०५००७०७७०५००७००७०
० ०७००० ००७००७ ७०५१ +०९०७३७००७००७००००७
७ ७०+१०००७+७०७०७०७७०५७५०००५०७०७०७
७ ०७०५७ ०७७०१०+१०७५७०+१५००५०० ००००७
७० ९७9+१०००७०७ ००७०० ०७०० ००७००+५००००७००७००+०५७०५०
# ७०+७७०७७७+७७७५०७०+७५०००५७०५०७०००
० ३१०७७ ७००७०७०७+०५०५०००७०७००५५०५००५०७
9 ००७०+५००७०७७००५७७०५७००७७०५७०५००७
७ ००७०७००७००७०००७००७००५७००५७००७०४७४७००५०७०७७
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# ०००७० ७०५०»०+५०७०५५७०७०५०००७०+१५०७०७००+
+ ००७० ०+१+७०७०५०००००७५०७००५००५७०७ ७
७ ७० ००००७०+५०७०७०७७+७४००
७ ०९७७०७५०७०७७+७७००१०००००७०७
४-एकामग्रपुराण--- ७०००००००००००००००००००००७००० ॥
१-भगवान् श्रीरामका एकाम्रक्षेत्रीय अश्वमेध-यञ्ञ ५-कपिलपुराण--- _
१-जगन्नाथ-द्षेत्र
२-कपिलावतारकी कथा ६-कततपुराण--
७००७३१७७००७५०७७०३७७०७७ ० ७ ७२ ७ ७ ७५ ००५७ ९.०७ ००५००७०५००७५+५०७००७०७०७०७ ०७० ०५७७
७ ००%९१०७००+७०७ ०७५ ७७ ७७७७++५७००७००७७०७+७०७
३८४ ३८४
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३८७ ३८८ ३९० ३९२
३९३ ३९४
३९५ ३९७ ३९८ ४०० ४०२ ४०३ ४०७५ ४०७
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डश० ड१३
विषय पृष्ठ-संख्या -भगवान् दत्तात्रयकी अवतार-कथा ********* डेश्ड ७-श्रीविष्णुधरमोत्तरपुराण-- बल को शान ० गिरे नरक 6 5०० ४१५७ १-भरतद्वारा शैलूषबंशी गन्धवोका उत्सादन ****. ४१७ ८-युद्गलपुराण-- 7 ४१९ १-सक्तुप्रस्थीय मौदगल्योपाख्यान >०१०००००००००० ४२० ७०-पुराणोंके प्रासड्िक चरित्र-- १-अगस्य “***१०००००००००००००००*००००००००+ ४२३ २-अजामिल ह%००९०००००००००००००००००००००००००० * ४२३ ३-अदिति ० टे७ंडछ कल ४ ७:४६ ८४ को कक को >> कक के «करा ० ० ढक ४२४ के पल जज अजय धर४ ५-अम्बरीष ७ ००7७ ४४ हो फेक बढ रत कर कक 20276 7 कल ढा 5 डर४ ६-अशधिनीकुमार ४०००००००००००००००००००००००००० ४२ प् ७७ अहेल्यो-गौतिमि: >३०४०७४४३४ «०४५५८ ३केनसररार सर ड२५ ८न्कट्ू * न लललननरन०+१००-«* ड२५ -गड़ा और भगीरथ ****-********** $६०००००० ४२६ 3 श आ आ "४२६ ३१-गणिका *+-*१*१-*०+-०+०+६५००+००००००६०००००० हर६ नी ४२७ २३आलंब हेजल: हक सन्त पहल व मी के + डर७ १४-चन्द्रमा 8०५०३ ७००७०५७७००७०००००००००५००००५०७४०७ ४२७ १ ५-चित्रकेतु ७:३७ ४४७ ४,७०७ ०७ 4:७० ० ७ + डे ४5 ०७ ० ०5४४ ५ ४४० ४२८ १६-तपस्विनी बज ०२० कोन लाक नेक छल >० ४ ने ० नो ७०% > ० ००७ ८ ४२८ १७-त्रिशंकु "लगन ० ४२८ : १८-दक्ष प्रजापति *****००००००*०*०००-०«५«५ ०८० ०«»«««;२«»«' . ४२९ १९-दधीचि **-*--००००००-००००००००००००००००००० *, ४२९ २०-नल-नील ******-००९००००००००००५००००००००० : ४३० २१-नहुप “ललित न०न5न+ ४३० २२-मकरी और कालनेमि -*---८००००--०००-०००० * 8 3३ -पार्वष्डेय 28००8 588१३०३:०३ १३४ कप ४३७ 'र४-ययाति “लिन ० हनन... ४३१ २५.-रन्तिदेव «64 ०३/०७शेढ « डजट० बडे डाक 5 दी व 0 ४ ह ७ ० न आग ० पे * ४३ १ २६-राहु-केतु #>०७:०:०७४१०४:७७ #7०७ रे ४०:७:७:७:४ ७०४७६ »:० ४ रू ४३ २ २७-विराध ४८४ ७० हेड ड हद 45 5 कड़े बह ०० ८४/० ७ कब मकान ४ ०४ 5 ४३२ २८-वसिष्ठ 3:०० ५७४ >ड को ०००८ ३५०:७ ०४४० २४४०० ४० हे डा > 5 ४३२ २ ९-विश्वामित्र >७००००००५००७०७०५०००७०७०७०७०००+१०००००० ४३ २ ३०-शुब्जी «६००५० ००४० ७५७५०७७४०७ ७०७०० ०७७७ ७०००७ ७०७४७ ७ « ४३३ ३६ शिबि + ० २४नरेस ३४ लव ४५5८5 ४०%४६५३३ ३८४४ हे 5 ४३३ ७१-पौराणिक कथाओंका तात्पर्य--भगवद्याप्ति ८ (डॉ* श्रीरामचरणजी महेन्द्र, एम॒०ए०,पी०-एचन्डी०) डेट
[८]
विषम्न
विषय
७२-मुक्तिका सहज "राव - हज उपाय *+**६*६+६५५००५०००५००००००००००० डरेड (आचार्य डॉ० श्रीजयमन्तजी मिश्र) 5००४६ 225 ७३-पुराणोंका परम प्रयोजन--श्रेय और प्रेयकी प्राप्ति __. ४४-नम्र निवेदन और क्षमा-पर्थना *००००००-०----- जे ५05 अल ६ चित्र) १७-सुबाहु और सुदर्शनके द्वारा भगवती दुर्गाका स्तवन <- १-पुराणोंके आदिवक्ता चतुर्मुख भगवान् अह्य - .. . ..” आवरण-पृष्ठ. १८-बद्माजीद्वारा शह्नचूड तथा तुलसीको - २-पुराणपुरुषोत्तम भगवान् विष्णु -**००-००००-०-०००- १ दाम्पत्य-सूत्रमें बैंधनेका आदेश *«-«*+०-०-०-००-- बे>नबगह-उपासती ३ ४०००४६७-नब>+ ६०२८4 २५2५ ७९ १९-भगवानका प्रकट होकर परम बैष्णव राजा: ४-महामति गणेशकी मातृ-पितृ-भक्ति **००-०००-*- १५० रुकमाड्दको पुत्र-हत्यासे रोकना *-०-००००००००००- ५-यज्ञमूर्ति भगवान् अग्निदेव ***००-९०५०-*००*-** २२७ २०-महर्षि उत्तडडुके धर्मोपदेशसे गुलिक व्याधका उद्धार ** ६-देवों तथा ऋषिगणोंको भगवान् वराहके दिव्य दर्शन २५७ २१-मुनिवर जानन्तिका .वेदमालिको ज्ञानोपदेश देना **- ७-भगवान् विष्णु वामन-रूपमें **-००००-०००००००*** २८१ २२-महर्षि वसिष्ठसे ब्राह्मणोंकी मृत्युका समाचार सुनकर ८-भगवान्के चौबीस अवतार ****-०-*०९**०-** ३१६ . राजा खनिन्नके मनमें निर्वेद होना **-०*००*०***** ९-भगवानके चौबीस अवतार ****--*-*००--०**** ३४० २३-भगवान् सूर्यका णज्यवर्धनकी प्रजाको वरदान देना ** १०-मड़लमूर्ति भगवान् गणपति *******०*०*०***००** ३९३ २४-मुनिवर शमीककी आज्ञासे मुनिकुमारोंका ११-भक्त प्रह्मदपर भगवान् नरसिंहका अनुग्रह **** . ३९७ 'पक्षिशावकोंकोी आश्रमपर लाना *******९***०००५० १२-भगवान् व्यासका पुराण-प्रवचन *****००*००**** ४२३ २५-वत्सप्रीका आलिड्लन करनेके लिये राजा विदूरथका इकरंगे (सादे चित्र) सिंहासनसे उतरना ***०**०*६०००*००+००९००००००००- १-माता पार्वतीके द्वारा आहसे बालककी रक्षा **** . १३४ २६-जडभरतका सोवीर-नरेशकी पालकी ढोना “****** २-कपोत दम्पतिद्वार व्याधका विलक्षण आतिथ्यं *- १३६ २७-देवर्षि नारदका ग़ग-रागिनियोंके साथ संवाद ***** ३-भगीरथद्वारा गज्जाकी स्तुति *************०५*** १३७ २८-गरुड एवं सुदर्शनचक्रको काँखमें दबाये ४-नन्दा गायकी धर्मनिष्ठासे व्याप्तका उद्धार ****** १४३ श्रीहनुमानूजीका सीता-रामके रूपमें राधा-मांधवका ५-सप्तर्षियोंके मध्यमें स्थित बालक मार्कण्डेयको देशत करनों 28:४० २७४४ ३४३०7 ३४७७४ ३४ ब्रह्माजीद्वार दीर्घायु होनेका वर-प्रदान ********* १४६ २९-शनिकी दृष्टि पड़नेसे पार्वतीकी गोदमें स्थित बालक ६-ब्रह्माजीका' पतिब्रता शैव्यासे सूर्योदयके लिये | गणेशका सिर कटना ******२*०*०*०५*९००००*९००००००००० निवेदन करना **************९*५००००००००*५-*- १४९ ३०-महर्षि लोमशद्वारा राजा इन्द्रद्यु्नको शिवभक्तिका उपदेश ७-शिवशर्मद्वारा कोढ़ी माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम “*.._ १५२ ३१-शिवयोगी ऋषभद्दारा रानी सुमति तथा उसके पुत्र ८-गन्धर्वकुमारको कोड़ोंसे पीटनेपर सुनीथाका भद्रायुको सदाचारका उपदेश ' लि ललर शापका भागी बनना *****“**-४-००-०१*००****** १५४ ३२-सत्यव्रतकी नन्दद्रको समन्मार्गसे च्युत॒ करनेकी ९ -सीताका अपनी सखियोंसे तोतेका असफल चेष्टा #&०>े० ह४ बडे ७० हे डे ५.४० «७ डा» ०६०० ०:८६: ०४ जोड़ा पकड़ लानेके लिये कहना “*-**-०००- १५६ ३३-कुमारीको दर्पणमें ब॒करीका मुख देखकर अपने १०-मुनियोंके पूछनेपर व्यासजीका उन्हें सी पूर्वजन्मका स्मरण हो जाना "लए 2५ अड 0 १६०. ३४-रोटी चुराकर भागते हुए चाप्डालके पीछे करणहदय
शुद्र तथा कलियुगकी महत्ता बतलाना
११-मोहभज्क होनेपर नारदजीका प्रभु-चरणोंमें पड़ना ** १६८ १२-धनुर्धारी अर्जुनपर भगवान् शह्डूरका अनुग्रह *** .. १७० १३-गुणनिधिका शिवमन्दिस्में नैवेध्य चुरानेकी इच्छासे प्रवेश. १७२ १४-अन्तःपुरमें मान्धाताकी कन्याओंद्वार सौभरिका वरण-*.. रैटढ
१५०-धर्मराजका अपने दूतोंको भगवद्धक्तोंका महात्य बतलाना “हल १९१ १९४
१६-सत्यव्रती उतथ्यका व्याधको समझाना **१****** *
विष्णुदासका घी देनेके लिये दौड़ना ************ ३५-ब्द्मचारी हनुमानूजीका रावणके अन््तःपुरमें
माता सीताकी खोज ******"***********०****** ३६-उत्तड्डका पातालसे कुष्डल लाकर गुरुपल्रीकी प्रदान करना ३७-दैत्यराज विरोचनका ब्राह्मणरूपघारी देवराज
इन्द्रको अपना सिर काटकार दान करना ३८-महर्षि अगस्त्यद्वारा श्रीगयमको दिव्य आभूषण-प्रदान
>+ ०9९०६ ०७००१
१९७
२०८
२१४
२१६ २१८
२१९
२२२
२२८
२३९
२४०
२४३ २६९
२७१
२७५
२७७
२७९
३८४ ३८५
३८६ ३८७
विषय ३९-विप्रवर पुण्डरीकको देवर्षि नारदद्वारा भक्तिका उपदेश ४०-पुण्डरीकको गरुडारूढ नारायणके दर्शन ४१-पुत्रका अपना भी सत्तुभाग अतिथि
ब्राह्मणको देनेके लिये पितासे निवेदन ***६ ४२-महाराज युधिष्ठटिस्के अश्वमेध यज्ञमें एक अर्धस्वर्णिम- शरीर नेवलेका आगमन ***********
४३-महर्षि अगस्त्य
७०७०३ + ००७ ०+७७०७+७००७००
७ ७ ७७७७७ ७७ ३०५००५०७३७५०५७०
[९]
पृष्ठ-संख्या विषय पृष्ठ-संख्या ४४-भक्तराज अम्बरीप ***०००००००-०००००००*००*०** डर
2 कल ४००. ४५-राजा चित्रकेतु ' चलो ह 7०... ४२८ 22 के ४०१५ ४६-महर्षि दघीचि *“*“**-० ०० ० ० ० ० «***१०**१*०*०*. ४२९ ४७-मुनिवर मार्कप्डेय "ने लिन ४३०
३839 ४२१५ ४८-महान् दानी रन्तिदेव * हल ०5.. ४३१ ४९ महंतिलखिए ४ ०+३ ३४३४७ ११३९ रत रवि ४३२
कम ४२२ ७५०-महर्षि विश्वामित्र *--०-०-०-००५०«-०००-०« «०-०० ० **०००० .. ४३२ री ४२३. ५१-राजा शिबि नस्ल. ड३9
“+<*खिन्दिडडइइसरह 0
गीताप्रेस, गोरखपुरद्ठारा प्रकाशित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ परम श्रब्वदेय श्रीजयद्यालजी गोयन्दकाकृत कुछ जीवनोपयोगी पुस्तकें
शिक्षाप्रद पत्र रामायणके आदर्श पात्र महाभारतके आदर्श पात्र तत्त्व-चिन्तामणि भाग १ भाग ! भाग 7 भाग ! भाग !) भाग ५ भाग मनुष्यका परम कर्तव्य कर्मयोगका तत्त्व आत्मोद्धारके साधन भक्तियोगका तत्त्व परमशान्तिका मार्म ज्ञानयोगका तत्त्व प्रेमयोगका तत्त्व अध्यात्मविषयक पत्र
छू #& ८६%. ०७ <7०0 «० ४०
परमार्थ-पत्रावली भाग १ है भाग २ 2 भाग ३ ५५ भाग '४
आदर्श भ्रातृ-प्रेम
बाल-शिक्षा
ब्रह्मचर्य ओर संध्या-गायत्री नवधाभक्ति
आदर्श नारी सुशीला
श्रीमद्धशवद्गीताका तात्तिक विवेचन
ध्यानावस्थामें प्रभुसे वार्तालाप भारतीय शास्त्रोमें नारी-धर्म श्रीसीताके चरित्रसे आदर्श शिक्षा भगवान् क्या है?
भरतजीमें नवधा भक्ति
नारी-धर्म
सामयिक चेतावनी
सत्संगकी कुछ सार बातें
, तीन आदर्श देवियाँ
गीतोक्त कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोगका रहस्य
भगवत्माप्तिके विविध उपाय प्रेमभक्ति-प्रकाश
संत-महिमा
वैराग्य
चेतावनी
सत्यकी शरणसे मुक्ति
भगवानकी दया:
व्यापार-सुधारकी आवश्यकता शोकनाशके उपाय परलोक और पुनर्जन्म अवतारका सिद्धान्त ज्ञानयोगके अनुसार विविध साधन कल्याण-प्राप्तिकी कई युक्तियाँ धर्म क्या है? स्त्रियोंके लिये घरेलू प्रयोग गीतोक्त सांख्ययोग और निष्काम कर्मयोग आता हमारा कर्तव्य ' प्रेमका सच्चा स्वरूप ईश्वर दयालु ओर न्यायंकारी है तीरथोमें पालन करने योग्य उपयोगी बातें त्यागसे भगवत्प्राप्ति महात्मा किसे कहते हैं श्रीमद्धशवद्गीताका प्रभाव ् (ला5 ० पापा एथा | ह
72 ज़्वा वा 5पा6 50695 [/0 504 फ्ारम्वा 4५ 5000 ? पर 5 70भधभाा३ ?
६॥ ९४४४-०८.
[१०]
श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारद्वारा रचित तथा अनुषादित सत्साहित्य मेँगायें
श्रीरधा-माधव-चिन्तन
पद-रल्लाकर
संत-वाणी
सुखी बननेके उपाय
मधुर
सत्संगके बिखरे मोती
भगवतन्नाम-चिन्तन
भगवच्र्चा भाग १
भांग २
?”. भाग ३ का भाग ४ ? भाग ५ का भाग ६
लोक-परलोक-सुधार भाग १ ' भाग २
.. भाग ३ : भाग ४ भाग ५
93
व्यवहार और परमार्थ भवरोगकी रामबाण दवा उपनिषदोंके चौदह रत्न साधन-पथ , ह कल्याण-कुंज भाग १
” भाग २
!४ भाग ३ दिव्य सुखकी सरिता
सफलताके शिखरकी सीढ़ियाँ मानव-धर्म श्रीभगवन्नाम
* गोवध भारतका कलंक एवं गायका माहात््य
गोपी-प्रेम
ब्रह्मचर्य
आनन्दकी लहरें -
मनको वशमें करनेके कुछ उपाय
. भगवान् श्रीकृष्णणी कृपा
सिनेमा-मनोर॑जन या विनाशका साधन राधा-माधव-रस-सुधा-सटीक विवाहमें दहेज
स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराजकी आत्मबोध करानेवाली पुस्तकें पढ़ें
गीता-साधक-संजीवनी गीता-दर्पण
गीताकी राजविद्या गीतामाधुर्य
गीताका ज्ञानयोग गीताका भक्तियोग गीताका आर59्म गीताकी विभूति और विश्वरूप-दर्शन गीताकी सम्पत्ति और श्रद्धा गीताका कर्मयोग-खण्ड २
पिताकी सीख
बालकॉकी बातें
चोखी कहानियाँ
बड़ोंके जीवनसे शिक्षा
वीर बालक
गुरु और माता-पिताके भक्त बालक सच्चे और ईमानदार बालक बालकेकि कर्तव्य
दयालु और परोपकारी बालक-बालिकाएँ
वीर बालिकाएँ
गीताका ध्यानयोग गीता-परिचय
गीताका सारभूत श्लोक मानसमें नाम-वन्दना जीवनोपयोंगी प्रवचन कल्याणकारी प्रवचन गुजगती भगवद्माप्तिकी सुगमता तात्तिक प्रवचन
सत्संगकी विलक्षणता वास्तविक सुख
पढ़ी, समझे और करो-- भाग श्से १श्तक बालचित्रमय श्रीकृष्णलीला भगवान् श्रीकृष्ण ; भगवान् श्रीराम
बालचित्र रामावण बालचित्रमय बुद्ध-लीला बालचित्रमव चैतन्य-लीला वर्तमान शिक्षा
आदर्श भ्रावृप्रेम
जीवनका सत्य
साधकोंके प्रति
भगवन्नाम
कल्याणकारी प्रवचन प्रथम द्वितीय
स्वाधीन कैसे बनें
छलाल्तंलणश 7500फ0805
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पृफठ 9ए॥6 'पिथा८
विद्यार्थियों और बालकोंके लिये उपयोगी पुस्तकें
बालकके गुण
आओ बच्चों तुम्हें बतायें बालशिक्षा
बालककी दिनचर्या बालकोंकी सीख बालकके आचरण वाल-अमृत-वचन भक्त वालक
चालकॉकी वोलचाल
प्रल्याण चर हट
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शेर शिय संभव आवशसबम सदच्छमा घोपशंणोति ते संकेत कर्थ गुणज्ञो विरमेद्विना पशु श्रीर्यत्मवत्रे गुणसंग्रहेच्छया ॥॥
ह ॥ संख्या २ वर्ष ६३ » गोरखपुर, सोर चैत्र, वि"सं० २०४६, श्रीकृष्ण-सं० ५२१५, अग्रैल १९८९३ ० ५ ' पूर्ण संख्या ७४६
पुराण-विग्रह भगवान् विष्णु ब्राह्म॑ मूर्धा हरेरेव हृदय पद्मसंज्ञ़कम्॥ ै वैष्णवं दक्षिणो बाहु: शैवं वामो महेशितु: | ऊरू भागवत प्रोक्ते नाभि: स्यान्नारदीयकम् ॥ मार्कण्डेयं च॒ दक्षाडिस्नर्वामो ह्ाग्नेयमुच्यते | भविष्यं दक्षिणो जानुर्विष्णोरेव महात्मन: ॥ ब्रह्मवैवर्तससंसे_ तु वामजानुरुदाहतः । लैड तु गुल्फर्क दक्ष बाराह॑ वामगुल्फकम् ४ " स्कान्दं पुराणं लोमानि त्वगस्थ वामनं स्मृतम्। कोर्म पृष्ठ समाख्यातं मात्स्य मेद: प्रकीर्त्सते। मज्जा तु गारूडं प्रोक्ते ब्रह्माण्डमस्थि गीयते। एबमेबाभवह्िष्णु: पुराणावयवो हरिः ॥ न् ह ह (पद्मपु०, स्व० ख० द६२। रन्नज 8 ४ 'ब्रह्यपुुण भगवान् विष्णुका सिर, पद्मपुराण हृदय, विष्णुपुराण दक्षिणबाहु, शिवपुराण वामबाहु, भागवत ४ मे जड्डायुगंल, नारदपुराण नाभि, मार्कण्डेयपुराण दक्षिण और अग्निपुराण वाम चरण है। भविष्य उनका .दक्षिण - जानु, ब्रह्मबैवर्त वाम जानु, लिड्डपुराण दक्षिण गुल्फ (टैंखना), वरहपुराण वाम गुल्फ, स्कन्दपुराण रोम, वामनपुराण त्वचा, तु कूर्मपुरण पीठ, मल्स्यपुराण मेद, गरुड मज्जा और ब्रह्माप्डपुराण अस्थि है। इस प्रकार भगवान् विष्णु पुराण-विग्रहके /# न रूपमें प्रकट हुए हैं। हनी |
२ * सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा « [पुराणकथा-
स्वस्ति नो मिमीतामश्चिना भगः स्वस्ति देव्यदितिरनर्वण: । स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः स्वस्ति छावापृथियी सुचेतुना ॥ दोनों अश्विनीकुमार हम सबका कल्याण करें सूर्यदेवता, अव्याहतगतिक पूषा देवता, शत्रुनाशक, प्राण एवं शक्तिको हू प्रदान करनेवाले असुर (वरुणदेव), अदितिदेवी तथा चुलोक एवं पृथ्वीलोक हम सबका मड्गल करें और हमें शोभन ज्ञानसे सम्पन्न करें। स्वस्तये वायुम्तुप बत्रवामहै सोम स्वस्ति मुवनस्थ यस्पतिः । बृहस्पतिं सर्वगर्ण स्वस्तये स्वस्तथ आदित्यासो भवन्तु नः॥ . हम क्षायुदेवता और लोकोंके पालक सोमदेवताकी स्तुति करते हैं तथा महान् कर्मों और ज्ञानके पालक बृहस्पति तथा सभी देवगणोंसे कल्याणके लिये प्रार्थना करते हैं। ये सभी देवता तथा द्वादश आदित्यगण हम सबका मड्नल करें | विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वेश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये। . देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्वहसः ॥ सभी देवता शुभ कर्मोको आरम्भ करते समय हमारा कल्याण करें| संसारके संचालक तथा सबके आश्रय वैश्वानर $. अग्निदेव हमारा कल्याण करें | ऋभु नामक देवगण पालन और भगवान् रुद्रदेव सभी पाप-तापोंसे हमारी रक्षा करें । स्वस्ति मित्रावरुणा स्वस्ति पथ्ये रेयति । स्वस्ति न इन्द्रश्नाग्निश्ष स्वस्ति नो अदिते कृधि॥ है अहोरात्रके आत्मस्वरूप मित्रावरुण देव | आप हम सबका कल्याण करें | हे भूलोक एवं अन्तरिक्षलोकके मार्गोमें कल्याण करनेवाली पथ्या देवि ! और उनके साथ चलनेवाली तथा धन प्रदान करनेवाली रेवती देवि ! आप हम लोगोंका सर्वत्र कल्याण करें| देवराज इन्द्रदेव एवं परम तेजस्वी अग्निदेव तथा देवमाता अदिति देवि ! आप सभी हम लोगोंका
मड्ढल करें ।
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स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्याचन्द्रमसाविव । पुनर्ददताप्नता जानता सं गमेमहि ॥
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जैसे सूर्य और चन्द्रमा नियलम्ब अन्तरिक्षमें निरापद एवं राक्षसादिसे अबाधित निर्विध्न यात्रा करते हैं, विचरण करते 5
हैं, वैसे ही हम भी अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ लोक-यात्रामें स्नेहपूर्वक निर्विष्न चलते रहें और हम सबका मार्ग ५ मड्जलमय हो । ४ तच्चक्षुदेवहित॑ पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्। पश्येम शरदः शत जीवेम शरदः शतम कै:
शृणुयाम शरद: शर्त प्रत्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरदः शर्तें भूयश्ष शरदः शतात ॥ ९
हे संसारके नेत्र-स्वरूप, देवताओंके हितचिन्तक, पूर्वदिशामें उदित होनेवाले निष्पाप तथा शुद्ध-बुर, निरन्तर ॥६ गतिशील सूर्यदेव ! आपके अनुग्रहसे हमलोग सो वर्षोतक जीते रहें। सौ वर्षोतक हमारी अविकल दृष्टि-शक्ति एवं #$# अप री इन्द्रियोंसे | शक्तियुक्त कोकर 77
श्रवण-शक्ति बनी रहे । सौ वर्षोतक सुस्पष्ट वावशक्ति बनी रहे और सौ वर्षोतक हम सभी इन्द्रियोंसे के हा र 2
से सम्पन्त को ।.. है
4 अदीन अर्थात् समृद्ध बने रहें और सौ वर्षसे भी अधिक समयतक समृद्धिशाली ओर सभी शक्तियेसि सम्पन्त रे रु 5! 3% शान्ति: ! 3» शान्ति: !! 3» शात्तिः !!! हु ) छ पाया शा
| 00 हक है 82082 8 82 68:09: %4: ४900 ४४७७
अड्डू ] :-* विन्ले ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् + |
| मु थम कग १
विजन्न॑ ममापहर सिख्देविनायक त्वम् विज्लेश विघ्नचयखण्डननामधेय श्रीशंकरात्मज सुराधिपवन्द्यपाद । दुर्गामहात्रतफलास्तिलमड्लात्मन् विन्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ सत्पद्यरागमणिवर्णशरीरकान्ति: श्रीसिखिबुद्धिपरिचर्चितकुड्'ुमश्री: । दक्षस्तने वबलयितातिमनोज्ञशुण्डो विज्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ पाशाड्डुशाब्जपरश्श्च॑ दधच्चतुर्भिदोर्भिश्न॒ शोणकुसुमस््रगुमाड्जातः । सिन्दूरशोभितललाटविधुप्रकाशो विप्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम् ॥ कार्येषु विप्नचयभीतविरक्चिमुख्ये: सम्पूजित: सुरवरैरपि मोदकाझे: । सर्वेषु चर प्रथममेव सुरेषु पूज्यो विश्ल॑ ममापहर सिश्विविनायक त्वम्॥ शीघ्राद्चननस्खलनतुड्ूंरवोरध्वकण्ठ स्थूलेन्दुरुद्रणणहासितदेवसड्डू: । शूर्पश्रुतिश्व॒पृथुवर्तुलतुड्डतुन्दो विज्च॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ यज्ञोपवीतपदलम्भितनागराजो मासादिपुण्यददृशीकृतऋक्षराज: । भक्ताभयप्रद दयालय विघ्नराज विज्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ सद्ब॒ल्मारततिराजितसत्किरीट:._ कोसुम्भचारुवसनद्वय ऊर्जितश्री: । सर्वत्र मडझलकरस्मरणप्रतापो विज्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ देवान्तकाद्यसुरभीतसुरार्तिहर्ता विज्ञानबोधनवरेण.._ तमोउपहर्ता । आनन्दितत्रिभुवनेश कुमारबन्धो विघ्न॑ ममापहर सिद्धिविनायक त्वम्॥ (मुद्गलपुराण) हे विप्नेश ! हे सिद्धेविनायक ! आपका नाम विघ्न-समूहका खण्डन करेवाला है। आप भगवान् शंकरके सुपुत्र हैं । देवराज इन्द्र आपके चरणोंकी वन्दना करते हैं। आप श्रीपार्वतीजीके महान् ब्रतके उत्तम फल एवं निखिल मड्जलरूप हैं। आप मेरे विप्नका निवारण करें | सिद्धिविनायक ! आपके श्रीविग्रहकी कान्ति उत्तम पद्मरागमणिके समान अरुण वर्णकी है। श्रीसिद्धि और बुद्धि देवियोंने अनुलेपन करके आपके श्रीअड्जोमें कुछ्कुमकी शोभाका विस्तार किया है। आपके दाहिने स्तनपर वलयाकार मुड़ा हुआ शुण्ड-दण्ड अत्यन्त मनोहर जान पड़ता है। आप मेरे विघ्च हर लीजिये। सिद्धिविनायक ! आप अपने चार 'हाथोंमें क्रमश पाश, अद्भुश, कमल और परशु धारण करते हैं, लाल फूलोंकी मालासे अलंकृत हैं और उमाके अड्डसे उत्पन्न हुए हैं तथा आपके सिन्दूरशोभित ललाटमें चन्द्रमाका प्रकाश फैल रहा है, आप मेरे विप्नोंका अपहरण कीजिये | सभी कार्योमें विप्न- आ पड़नेकी आशज्जासे भयभीत हुए ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवताओंने भी आपकी मोदक आदि मिष्टान्नोंसे भलीभाँति पूजा की है। आप समस्त देवताओमें सबसे पहले ही पूजनीय हैं। आप मेरे विप्न-समूहका निवारण कीजिये। सेद्धिविनायक | आप जल्दी-जल्दी - चलने, लड़खड़ाने, उच्चस्वरसे शब्द करने, ऊर्ध्वकण्ठ, स्थूल शरीर होनेसे चन्द्र, रुद्रगण आदि समस्त देवसमुदायको हँसाते रहते हैं। आपके कान सूपके समान जान पड़ते हैं, आप मोटा गोलाकार और ऊँचा तुन्द (तोंद) धारण करते हैं। आप मेरे विश्नोका अपहरण क्रीजिये। आपने नागराजको यज्ञोपवीतका स्थान दे रखा है, आप बालचन्द्रको मस्तकपर धारणकर दर्शनार्थियोंको पुण्य प्रदान करते हैं। भक्तोंकी अभय देनेवाले दयाधाम विध्नराज | सिद्धिविनायक ! आप मेरे विष्नोंको हर लीजिये। आपका सुन्दर किरीट उत्तम रलोंके सार भागोंकी श्रेणियोंसे उद्दीप्त होता है। आप कुसुम्मी रंगके दो मनोहर बस् धारण करते हैं, आपकी शोभा--कान्ति बहुत बढ़ी-चढ़ी है और सर्वत्र आपके स्मरणका ग्रताप सबका मड्जल करनेवाला है। सिद्धिविनायक ! आप मेरे विघ्न हर लें। सिद्धिविनायक ! आप देवान्तक आदि असुरोंसे डरे हुए देवताओंकी पीडा दूर करनेवाले तथा विज्ञानबोधके वरदानसे सबके अज्ञानान्थकारको हर लेनेवाले हैं। त्रिभुवनपति इन्द्रको आनन्दित करनेवाले कुमारबन्धो | आप मेरे विध्नोंका निवारण कीजिये। पड पल कलनद कट न्न्ट
है * सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा « [पुराणकथा- #फफ्ालछऋरुफ जा क़फफ़्फ। नरक फ़फ़जक्फ़कफसझफड़फाह शक्ल कक फ कफ आप प्र क्र कप फफ्रऊऊक
| नमः सवित्रे
जयति किरणमाली _ भासुर सप्तसप्तिसकलभुवनधामा . प्राग्दिगन्ताइहास: । भवत्ति विगतपापं कीर्तनादेव चस्य प्रचुरकलुषदोषेर्मस्तमड़ं ह नराणाम् ॥ उद्यन्तमम्बरतले सुरसिद्धसज्ञः सन्रहादेत्यमुनिकिन्नरनागयक्षा: । त्वामर्चचन्ति. वि्रुधा:. ग्रणतैः शिरोभिश्वद्धत्किरीटमणिभाभिर नुत्तमाभि: ॥ प्राग्दिग्वधूतिलक भासुरकर्णपूर मन्दाकिनीदयितनाथ जगत्मदीप । हेमाद्रितापन नभस्तलहाररल सन्ध्याड्रनावदनराग नमो नमस्ते ॥। ब्रहण्य सत्य शुभ मड्जललोकनाथ व्योमाम्बुजेश मुनिसंस्तुत बिश्वमू्तें । आर्तस्थय शोकहर किड्ठडरपालकश्न॒ सवे॑ मे प्रसीद भगवज्छरणागतस्य ॥|
नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्सूतिस्थितिनाशहेतवे
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरक्चिनारायणशड्डरात्मने ॥
उाम अफ कफ ऋकऊ कक फू कफ फक्क कफ कक कफ ऋर
(स्कंन्द०, अवन्ती०, अ० ४३) किरणोंकी मालासे मण्डित, अत्यन्त प्रकाशमान एवं सात घोड़ोंके रथपर चलनेवाले उन भगवान् सूर्यकी जय हो, जिनका तेज समस्त भुवनोंमें व्याप्त है, जो पूर्व दिशाके अद्टहासकी-सी छवि धारण करते हैं तथा जिनके नामोंका कीर्तन करनेमात्रसे प्रचुर पाप-तापमय दोषोंसे ग्रस्त हुए मनुष्योंके अज्ग निष्पाप हो जाते हैं। भगवन् ! जिस समय आप आकाशमें उदित होते हैं, उस समय देवताओं और सिद्धोकि समुदाय, ब्रह्मा आदि देवेश्वर, दैत्य, मुनि, किन्नर, नाग, यक्ष तथा ज्ञानी देवगण अपने झुके हुए मस्तकोंद्राश चमकती हुई मुकुटमणियोंकी उत्तम प्रभावोंसे आपकी अर्चना करते हैं। हे वधूरूपिणी प्राची दिशाके भाल-तिलक ! देदीप्यमान कर्णपूर घारण करनेवाले मन्दाकिनीके प्रियतम नाथ ! सुमेरु पर्वतको प्रकाशित करनेवाले ! आकाशके महान् हाररल | अंड्ुनारूपी सन्ध्याके मुखको रज्लित करनेवाले ! जगत्प्रदीप ! आपको बारंबार नमस्कार है। हे ब्रह्मण्य ! सत्य ! शुभ ! मड्गल ! लोकनाथ ! आकाशकमल ! ईश ! मुनि-संस्तुत ! विश्वमूर्ते । आर्तजनोंका शोक नाश करनेवाले ! सेवकोंका पालन करनेवाले ! भगवन् | मैं आपकी शरणमें आया हूँ मुझपर प्रसन्न होइये | जो सम्पूर्ण जगत्के एकमात्र नेत्र हैं, वेदत्रयीमय हैं अथवा त्रिभुवन-स्वरूप हैं, त्रिगुणात्मक शरीर धारण करनेवाले हैं ओर समस्त विश्वकी उत्पत्ति, पालन तथा संहारके हेतु हैं, उन ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप भगवान् सूर्यकों मेरा नमस्कार है।
सुभद्रश्॒वसे नमो नमः यत्कीर्तन॑ यत्स्मरणं यदीक्षणं यह्वन्दन॑ यच्छुव्ण यदर्हणम् । लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मे सुभद्रश्नवसे नमो नमः ॥ तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमड्डलाः । क्षेम न बिन्दन्ति बिना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥ . (श्रीमद्धा० २।४।१५, १७) जिन मड़ुलमय भगवानके मड़लमयी कीर्तिका श्रवण सभी प्रकारके मड्रलोंका विस्तार करता है, जिनका कीर्तन, स्मरण दर्शन, वन्दन और पूजन जीबोके पापोंको तत्काल नष्ट कर देता है, उन पुण्यकीर्ति भगवान् पुराण-पुरुष श्रीविष्णुका बार॑बार नमस्कार है। बड़े-बड़े तपस्वरी, दानी, यशस्वी, मनस्वी, सदाचारी और मन्त्रवेत्ता जबतक अपनी साघनाओंकों तथा अपने-आपको उनके: (भगवानके) चरणोंमें समर्पित नहीं कर देते, तबतक उन्हें कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती, जिनके प्रति आत्मसमर्पणकी ऐसी महिमा है, उन कल्याणमयी कीर्तिवाले भगवान् पुराण-पुरुष श्रीविष्णुकी बारेबार नमस्कार ह£।
अड्डू ] * त॑ शट्टरं शरणदं शरणं ब्रजामि * - ५
ऋफककऋ५+अऊ्रक्रफफफ्फ्फफफफ्क फ्क्फ़फफ्लफ्क्फऊ फफऊफफफफफऊकऊ कफ कऋफक कक ऊऊऊ € फरमक कफ कफ फक फ फ कक किक फीकी फल की डक जिििसए्िएर: फफकफक कफकरफ कक फक कक कफ पफ का फू कफ ऋफ फकफ फफऋ फ कफ फ फ़ कू_
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तं शद्धूरं शरणदं शरणं ब्रजामि
कृत्स्नस्य योडस्थ जगत: सचराचरस्य कर्ता कृतस्य च तथा सुखदुःखदाता । संसारहेतुषपि यः पुनरन्तकालस्त॑ शद्भरं शरणदं शरणं त्रजामि ॥ ये योगिनो विगतमोहतमोरजस्का भवक््त्येकतानमनसो विनिवृत्तकामा: । ध्यायन्ति चाखिलधियो5मितदिव्यमूर्ति तं॑ शड्भूरं॑ शरणदं शरणं ब्रजामि ॥ यश्चन्द्रखण्डममल विलसन्मयूखं बद्ध्वा सदा सुरधु्नी शिरसा बिभर्ति | वामाड्के विधृतवान् गिरिराजपुत्रीं त॑ शद्भूरं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥ यः सिल्धचारणनिषेवितपादपद्मो गड्ं महोर्मिविषमां गगनात् पतन्तीम्। मूर्श्ना दधे सत्रजमिव त्रिजगत्पुनन्तीं त॑ शड्भूरं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥ कैलासगोत्रशिखरे. परिकम्पमाने कैलासशुड्रसद्शेन दशाननेन । यः पादपदपरिपीडनसेव्यमानस्त॑ शट्भूरं शरणदं शरणं त्रजामि ॥ ब्रहोन्द्रविष्णुमरुतां च॒ सषण्मुखानां योउदाद्वरान सुबहुशो भगवान् महेश: । श्वेत चर मृत्युवदनात् पुनरुजहार त॑ शड्डरं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥ ह आराधितस्तु तपसा हिमवन्निकुओे धूम्रावतेन तपसा5पि _ परैरगम्यः। . सद्खीविनीं समददाद् भूगवे महात्मा तं शट्डूरं शरणदं शरणं ब्रजामि ॥ ह (स्कन्दपुराण, अवन्तीखण्ड०, अ० ४९) 'जो इस सम्पूर्ण चराचर-जगतके कर्ता और इसे अपने किये हुए कमोके अनुसार सुख-दुःख देनेवाले हैं, जो संसारकी उत्पत्तिके हेतु तथा उसका अन्तकाल भी स्वयं ही हैं, सबको शरण देनेवाले उन्हीं भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके मोह, तमोगुण और रजोगुण दूर हो गये हैं, वे योगीजन, भक्तिसे मनको एकाग्र रखनेवाले निष्काम भक्त तथा अपरिच्छिन्न बुद्धिवाले ज्ञानी भी जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, उन अनन्त दिव्यस्वरूप शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सुशोभित किरणोंवाले निर्मल अर्धचन्द्रका मुकुट बाँधकर सदा अपने मस्तकपर गज्ञाजीको धारण करते'हैं और जिन्होंने अपने वामाड्रभागमें गिरियरजकिशोरी उमाको धारण कर रखा है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। सिद्ध और चारण जिनके चरणारविन्दोंकी सेवा करते रहते हैं और जिन्होंने आकाशसे ऊँची-ऊँची उत्ताल तस्ज्ञोंके साथ विषम वेगसे गिरती हुई त्रिभुवनपावनी गड्जाको अपने मस्तकपर पुष्पमालाकी भाँति धारण कर लिया था, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी में शरण लेता हूँ। जिसके भारसे कैलासपर्वतका शिखर हिलने लगता था, कैलास-शुज्जंके सदूश ही उस विशालकाय दशाननने भी जिनके युगल चरणारविन्दोंकी सेवा की है, उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्होंने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, मर्दूगण और कार्त्तिकेवको अनेक बार बहुत-से वर प्रदान किये तथा अपने भक्त महामुनि श्वेतको मृत्युके मुखसे निकाल लिया था', उन शरणदाता भगवान् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। आचार्य शुक्रने हिमालयपर्वतके निकुझोंमें अग्निसे समुत्यित धुएँसे आबूत होकर, उसका पान कर, अन्य किसीसे भी असाध्य तपद्दारा भगवान् शंकरकी आराधना की। इससे असन्न होकर जिन महान् आत्मा महादेवने उन्हें संजीवनी-विद्या प्रदान कर दी , उन शरणदाता भगवांन् शंकरकी मैं शरण लेता हूँ। | मे
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ऊंपयज्-पपन+-पन-भ+ऊदूएप््््एएघद्ञ्]नप््+-..ह.ढन. २-महामुनि श्वेतकी यह कथा लिड्डपुराण पूर्वखण्ड अ० ३० में विस्तारपूर्वक प्राप्त होती है। ह २-यह कथा मत्स्यपुराुण अ० ४७ श्लोक ८२ से १२२ तकमें प्राप्त होती है।
[पुराणकथा-
द् * सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा «
कक कफ कफ क कह: कक कफ कक फू फू चर
नमामि ते रूपमिदं भवानि !
आा्य॑ महान्तं पुरुषाभिधान प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजम्। ऐश्वर्यविज्ञानविरोधप्रमैं: समन्वितं देवि नतोडस्मि रूपम् ॥
सर्वाश्नय॑ सर्वजगद्ठिधानं सर्वत्रग॑ जन्मविनाशहीनम् | सूक्ष्मं विचित्र त्रिगुणं प्रधान नतो5स्मि ते रूपमरूपभेटम् ॥।
यदेव पश्यन्ति जगत्मसूर्ति वेदान्तविज्ञानविनिश्चितार्था:। आनन्दमात्र प्रणवाभिधानं तदेव रूप शरणे प्रपद्ये ॥
सहस्रमूर्धानमनन्तशक्ति. सहस््नरबाहूं पुरुष पुराणम् | शयानमन्तःसलिले तबैब नारायणाख्य प्रणतो5स्मि रूपम् ॥
प्रहणशोक॑ प्रविहीनरूपं॑. सुरासुरैरचिंतपादपद्यम् | सुकोमलं देवि विभासि शुभ्र॑ नमामि ते रूपमिदं भवानि ॥
नमस्तेउस्तु महादेवि नमस्ते परमेश्वारि। नमो भगवतीशानि शिवायै ते नमो नमः ॥
(कूर्मपुण, पूर्वाग, अ० १२) है देवि ! आपका जो रूप आद्य, महापुरुषसंज्ञक प्रधान प्रकृति-अवस्थावाला, सत्त्व-रज आदि तीनों गुणोंका बीजभूत ओर ऐश्वर्य, विज्ञान एवं अनेक परस्पर विरुद्ध धर्म तथा गुणोंका आश्रय है, मैं उसे प्रणाम करता हूँ। देवि ! जो आपका रूप समस्त संसारका आश्रय, विश्व-विधाता , सर्वत्रगामी, जन्म-जरा-मृत्युसे रहित, अतिसूक्ष्म, विचित्र, त्रिगुणमय, प्रधान तथा निर्गुण एवं सगुण-स्वरूप है, मैं उसे नमस्कार करता हूँ। वेदान्त एवं विज्ञानशाख्रके द्वारा सुनिश्चित निर्णय-प्राप्त: ऋषिगण, जगतको उत्पन्न करनेवाले आनन्दमात्र आपके जिस ओंकारस्वरूपका सदा ध्यान करते हैं, हम उसकी शरण ग्रहण करते हैं, सहस्न मस्तक, सहसत भुजा एवं अनन्त शक्तियोंको धारण करनेवाले अन्तःसमुद्रशायी पुराणपुरुष भगवान् नारायण भी आपके ही रूप हैं, में आपके उस रूपको प्रणाम करता हूँ । हे भवानी देवि ! तुम निर्शुण-निराकार होती हुई भी सम्पूर्ण शोक-मोहसे शून्य, देवता एवं असुरोद्वारा अर्चित, सुकोमल चरणकमलवाली, गौरीरूपमें प्रकाशित हो रही हो, मैं तुम्हारी वन्दना करता हूँ। हे षडैश्चर्यसम्पन्न परमेश्वर महादेवि ! आपको
प्रणाम है। समस्त संसारपर शासन करनेवाली हे भगवती शाड्डूरि ! मेरा आपको बारंबार नमस्कार है।
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बेदव्यासं सर्वदाहं नमामि पाराशर्य परमपुरुष॑. विश्ववेदेकयोनिं निःसृत शाखरूपी सुधाधाराका संसार पान करता छह विद्याधारं विमलमनसं वेदवेदान्तवेद्यम् | न तेउस्त्थविदितं किंचित् त्रिपु लोकेपु वे प्रभो॥ शश्वच्छान्तं शमितविषयं शुद्धजुद्धिं विशालं सर्वज्ञ्व॑. महाभाग.. देवेष्विव.. बृहस्पति: । वेदव्यासं विमलयशसं सर्वदाहं नमामि ॥। नमस्यामो महाप्राज्ञ ब्रहि्ठ त्वां महामुनिम ॥
(पद्म०, उ० खं० २१९।४२) येन त्वया तु बेदार्था भारते प्रकटीकृता: ।
महर्षि पराशरके पुत्र, परम पुरुष, सम्पूर्ण वैदिक कः शक्तोति गुणान् वक्तुं तब सर्वान् महामुने ॥ शाखाओंके उत्पत्तिके स्थान, सम्पूर्ण विद्याओंके आधार, अधीत्य चतुरो वेदान् साड्रान् व्याकरणानि च्य् निर्मल मनवाले, वेद-वेदान्तोंके द्वारा. परिज्ञेय, सदा शान्त, कृतवान् भारतं॑ शार तस्मे ज्ञानात्मने नमः ॥
रागशून्य, विशाल विशुद्ध-बुद्धि तथा निर्मल यशवाले महात्मा नमोउस्तु ते व्यास विशालयुद्ध रै ि फुल्लारबिन्दायतपपेत्र हे । ! बेदव्यासजीको मैं सर्वदा नमस्कार करता हूं। पत्नमत्र जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहदयनन्दनो व्यासः । येन तवया. भारततलपूर्ण: यस्थास्यकमलगलितं वाडःमयममृते जगत् पिवबति ॥ प्रज्वजालितो.. ज्ञानमयः. भरदाप: ।|
(वायु० १११२) (ब्राथ> २ «८७ ३3-११)
श्रीपराशरजीके पुत्र, सत्यवतोके हृदयको आनन्दित करनेवाले उन भगवान् व्यासकी जय हो, जिनके मुखकमलस
(म॒निगण बोले--) महाभाग भगवान् व्यास पॉसती |! आए देवताओंमें वृहस्पतिकी भाँति सबंध
बढ ३ 8 शव ् शक्ल काफी स्पष्ट पे ऋषि हशाय टगान: सती कह 5१. हक *ई
लोकोंकी कोई भी वस्तु अज्ञात नहीं है, आपने सम्पूर्ण वेदोंके अर्थको महाभारतमें प्रकाशित किया है तथा आप महामुनिं, महाप्राज्ञ एवं ब्रह्मवेत्ता हैं, हम आपको प्रणाम करते हैं। महामुने ! आपके गुणोंका वर्णन करनेमें कोन समर्थ हो सकता है ? आपने अज्जोंसहित चारों वेदों ओर उनके भाष्योंको अच्छी तरह पढ़कर महाभारतशासत्रकी रचना की है। ज्ञानस्वरूप आपको हम प्रणाम ' करते हैं। आपके नेत्र प्रफ्ल्लित कमलके समान विशाल हैं। आपने महाभारतरूपी तेलसे भरे हुए ज्ञानपूर्ण दीपकको प्रज्वलित किया है। हे विशाल बुद्धिवाले व्यासजी ) आपको हमारा प्रणाम है।: नमस्तस्मे मुनीशाय तपोनिष्ठाय धीमते ।
* व्याससूनुं नतोउस्मि * हि रे
प् #फऋफऋफऋफ़ऋफआऋऊऋ कफ फू ऋ फऋफ फ ऋफ एफ कफ शक फ आफ फ़छ ऋ ऋ कफ कफ फ फऋफ़ फऋ छफऋ ऋ ऋफऋ ऋ कह का.
. त॑ नमामि महेशान मुर्नि धर्मविदां वरम्। शबाम॑ जटाकलापेन शोभमान शुभाननम्॥ मुनीन् सूर्यप्रभान् धर्मान् पाठयन्त सुवर्चसम् । नानापुराणकर्तारं वेदव्यासं महाप्रभम् ॥
(बृहद्घर्मपुणण १।१५॥२३-२५)
जो तपोनिष्ठ, मुनीध्वर, अमिततेजस्वी, महाकवि, रागसे सर्वथा शून्य तथा अत्यन्त निर्मल बुद्धिसे संयुक्त एवं महामुनि शिवस्वंरूप, श्यामवर्णके हैं, जिनका मुखमण्डल जटाजूटसे सुशोभित है और जो धर्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं तथा सूर्यके समान प्रभावाले मुनियोंको धर्मशास्त्रोंका पाठ पढ़ानेवाले हैं, ज्योतिर्मय हैं, अत्यन्त कान्तिमान् हैं, सभी पुराणों तथा उपपुराणोंके रचयिता
वीतरागाय. कवये व्यासायामिंतत्तेजसे ॥ हैं, उन व्यास भगवानको बारंबार नमस्कार है। “अं केन्कीओस ५ करी किलेंद ध 7१7 व्याससूनं नतो5स्मि [शुक्-वन्दना ] यं अब्रजन्तंमनुपेतमपेतकृत्यं 'श्रीशुकदेवजी महाराज अपने आत्मानन्दमें ही निमग्न
ट्वेपायगो विरहकातर आजुहाव । पुत्रेति तन््मयतया त्तरवो5भिनेदु- स्तं॑ सर्वभूतहदययं मुनिमानतो5स्मि ॥। “जिस समय श्रीशुकदेवजीका यज्ञोपवीत-संस्कार भी नहीं हुआ था, सुतरां लोकिक-वैदिक कमेकि अनुष्ठानका अवसर भी नहीं आया था, उन्हें अकेले ही संन्यास लेनेके उद्देश्यसे जाते देखकर उनके पिता व्यासजी विरहसे कातर होकर पुकारने लगे--बेटा ! बेटा !! उस समय तन्मय होनेके कारण श्रीशुकदेवजीकी ओरसे वृज्षोने उत्तर दिया | ऐसे सबके हृदयमें विराजमान श्रीशुकदेवमुनिको मैं नमस्कार करता हूँ।' स्वसुखनिभ्ृतचेतास्तदव्युदस्तान्यभावो- उप्यजितरुच्चिरलीलाकृष्ठसारस्तदीयम् । व्यतनुत कृपया अस्तत्त्वदीप॑ पुराण ततमखिलवृजिनल्न व्याससून नतो5उस्मि ॥
थे। इस अखण्ड अद्वेत स्थितिसे उनकी भेद-दृष्टि सर्वथा निवृत्त हो चुकी थी। फिर भी मुरलीमनोहर श्यामसुन्दरकी
'. मधुमयी, मड़लमयी, मनोहारिणी लीलाओंने उनकी वृत्तियोंको
अपनी ओर आकर्षित कर लिया और उन्होंने जगतंके श्राणियोंपर कृपा करके भगवत्तत्त्वकों प्रकाशित करनेवाले इस महापुराणका विस्तार किया। में उन्हीं सर्वपापहारी व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकेदेवजीके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ।'
योगीच्धाय नंमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे । संसारसर्यद्ट यो. विष्णुरातममूमुचत् ॥ (श्रीमद्धागवत १२।१३।२१)
“हम उन योगिराज ब्रह्मस्वरूप श्रीशुकदेवजीको नमस्कार करते हैं, जिन्होंने श्रीमद्धागवत महापुराण सुनाकर
संसार-सर्पसे डसे हुए राजर्षि परीक्षितको मुक्त किया ।'
चल -+- जम“ कशककट पक टे-
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
[पुराणकथा-
.._ पुराण-महिमा
ये पठन्ति घुराणानि शृण्वन्ति च्र समाहिताः । प्रत्यक्ष लभन्त्येते कपिलादानज॑ फलम्॥ अपुत्रो लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम्। विद्यार्थी लभते विद्यां मोक्षार्थी मोक्षमाघुयात् ॥ ये शुण्वन्ति पुराणानि कोटिजन्मार्जित खलु । पापजालं तु ते हित्वा गच्छन्ति हरिमन्दिरम्॥ (पद्म०, ब्रह्मखण्ड २५। २९-३१) जो मानव समाहितचित्त होकर पुराणोंका पठन और श्रवण ररते हैं, उन्हें प्रत्येक अक्षरपर कंपिला गायके दानका फल एप्त होता है। पुत्रहीनको पुत्र, धनार्थीको धन, विद्यार्थीको त्रद्या तथा मोक्षार्थीको मोक्ष प्राप्त होता है तथा पुराण-श्रोताके उ्रेटि-जन्मकृत पाप-जाल नष्ट हो जाते हैं ओर वे भगवद्धामको प्त करते हैं | यथा पापानि पूयन्ते गड्भावारिविगाहनात्। तथा पुराणश्रवणाद् दुरितानां विनाशनम् ॥ | (वामनपु० ६९ । २) जिस प्रकार गड्ढाजलमें स्नान करनेसे सारे पाप नष्ट हो ते हैं, उसी प्रकार पुराणका श्रवण करनेसे समस्त पाप नष्ट जाते हैं। 6 । । स्मृतिरवेदी गृहाश्रमे ॥
यज्ञकर्मक्रियावेदः स्मृतिर्वेद: : क्रियाबेद: पुराणेषु . प्रतिष्ठित: । पुराणपुरुषाज्ञात॑ यथेदं॑. जगददूभुतम ॥
तथेदं वाडन्मयं जात॑ पुराणेभ्यो -न संशय: ।
न वेदे अहसंचारो न शुद्धि: कालबोधिनी ।
तिथिवृद्धिक्षयो बापि पर्वग्रहविनिर्णय: ॥
इतिहासपुराणैस्तु निश्चयो5्य॑ कृतः पुरा।
यन्न दृष्ठ हि वेदेषु तत्सर्व॑ लक्ष्यते स्मृतो ॥
उभयोर्यन्न दुष्ट हि. तत्पुराणैः प्रगीयते।
. प (नारं० पु०ण, उग, अ० २४)
यज्ञ एवं कर्मकाण्डके लिये वेद प्रमाण हैं। गृहस्थोंके यये स्मृतियाँ ही प्रमाण हैं। किंतु वेद और स्मृतिशास्त्र धर्मशाख) दोनों ही सम्यक् रूपसे पुराणोंमें प्रतिष्ठित हैं। जैसे एम पुरुष परमात्मासे यह अद्भुत जगत् उततन्न हुआ है, वैसे
ही सम्पूर्ण संसारका वाइमय--साहित्य पुराणोंसे ही उत्पन है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। वेदोमें तिथि, नक्षत्र आदि काल-निर्णायक और ग्रह-संचारकी कोई युक्ति नहीं बतायी गयी है। तिथियोंकी वृद्धि, क्षय, पर्व, अहण आदिका निर्णय भी उनमें नहीं है । यह निर्णय सर्वप्रथम इतिहास-पुरणोंके द्वार ही निश्चित किया गया है। जो बातें वेदोंमें नहीं हैं, वे सब स्मृतियोंमें हैं ओर जो बातें इन दोनोंमें नहीं मिलतीं, वे पुराणोंके द्वारा ज्ञात होती हैं। श्रुतिस्पृती तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदय स्मृतम्। श्रुतिस्पृतिभ्यां हीनोउन्ध: काण: स्थादेकया विना ॥ पुराणहीनादधृच्छून्यात् काणान्धावषि त्तौ बरौ। श्रुतिस्मृत्युदितो . धर्म: पुराणे परिगीयते ॥ यस्यधर्मेंडस्ति जिज्ञासा यस्य पापाद्धयं महत् । श्रोतव्यानि पुराणानि धर्ममूलानि तेन चै॥ . चअतुर्दशसु॒ विद्यासु पुराण दीप उत्तमः। अन्धोजपि न तदालोकात् संसाराब्धौ क्वचित् पतेत् ॥ (स्क० का० २।९६-९७, ९९-१००) विद्वानोंके श्रुति-स्पृति--ये दो नेत्र हैं और पुराण हृदय हैं। इनमेंसे जिसे श्रुति-स्मृतिमेंसे किसी एकका ज्ञान नहीं है वह काना, दोनोंके ज्ञानसे हीन अन्धा है, किंतु जो पुराणरूपी विद्यासे हीन है वह तो हृदयहीन या शून्य होनेके कारण इन
ः द्वोनोंसे भी निकृष्ट है। श्रुति तथा स्मृतियोंमें कहा गया धर्म
पुराणमें प्रतिपादित है । जिसकी धर्ममें जिज्ञासा या रुचि हो, जो पापोंसे डरता हो, उसे पुराणोंका श्रवण करना चाहिये, क्योंकि वे ही धर्मके मूल हैं। चौदहों विद्याओंमें पुराण विद्या ही उत्तम दीपक है। इसके आलोक-प्रकाशमें स्थित अन्धा भी संसार- सागरमें कभी नहीं गिरता । ब्राह्म॒णं च पुरस्कृत्य ब्राह्मणेन च कीर्तितम । पुराण. शृणुयाज्नित्य महापापदवानलम् ॥| पुराणं सर्वतीर्थेषु तीर्थ चाधिकमुच्यते । यस्वैकपादश्रवणाद्धरिरेव प्रसीदति ॥ यथा सूर्यवपुर्भूत्वा प्रकाशाय चरेद्धरि: । सर्वेषां जगतामेव हरिरालोकहेतवे ॥
अड्डू । * पुराण-महिमा « ण्
फफफ्शफफ्फफ़फफफफफ फफ्फ फ्फफ फ्रफक फ्फ कफ फफ फफ फ फफ फफ्रफफ्फ्रफ ऊफ फफ फफ फ्ररश कफ कक अफअफफ ऊ जज ऊ ऊ कफ आफ क की कि आफ पा फ जा फ कक कफ फ्फऋ पक फ ऋ फ ५४ कफ कफ कफ एक कु का कहा का पर कफ फू हक दफा आकर तथैवान्त:प्रकाशाय... पुराणावबवो. हरि: । जगद्यथा निरालोक॑ जायतेडशशिभास्करम् । विचरेदिह भूतेषु पुराण पावन परम् ॥ विना तथा पुराणं हाध्येयमस्मान्मुने सदा ॥
तस्माद्यदि हरेः प्रीतेरुत्यादे धीयते मतिः । श्रोतव्यमनिर्श पुम्भि: पुराणं कृष्णरूपिण: ॥ विष्णुभक्तेन. शान्तेन. श्रोतव्यमतिदुर्लभम् । पुराणाख्यानममलममलीकरणं परम ॥। | अस्मिन् वेदार्थमाहत्य. हरिणा व्यासरूपिणा । पुराणं निर्मितं विशप्र तस्मात् तत्यरमो भवेत्॥ पुराणे निश्चितों धर्मों धर्मश्न केशवः स्वयम्। तस्मात् कृती पुराणे हि श्रुत्े विष्णुर्भवेदिति ॥ साक्षात् स्वयं हर्रिविष्र: पुराणं च तथाविधम्॥ एतयों: सड़मासाद्य. हरिरेत्र.. भवेन्तर:॥ (पद्मपु०, स्वर्गख० ६२। ५८--६६) ब्राह्मणके साक्ष्यमें ब्राह्मणके मुखसे कहे हुए पुराणका प्रतिदिन श्रवण करना चाहिये। पुराण महापापोंके बनको जलानेके लिये दावानलके समान है। अतः पुराणोंको समस्त तीर्थोमें श्रेष्ठ तीर्थ बतलाया गया है। पुराण-गन्थोंके एक पाद (चतुर्थांश) के श्रवणसे ही श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। जैसे भगवान् विष्णु सम्पूर्ण जगतको प्रकाश तथा देखनेकी शक्ति प्रदान करनेके लिये सूर्यका शरीर धारण करके आकाशमें विचरते हैं, उसी प्रकार पुराणस्वरूप श्रीहरि सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें ज्ञानका प्रकाश करनेके लिये इस जगत विचरते हैं। पुराण सबसे बढ़कर पवित्रताका साधन है, अतः यदि भगवान्को प्रसन्न करनेका मनमें संकल्प हो तो प्रत्येक पुरुषको निरन्तर श्रीविष्णुके अड्भभूत पुराणका श्रवण करना चाहिये। पुराणकी कथा अत्यन्त दुर्लभ और स्वरूपसे ही निर्मल है तथा अन्तःकरणको निर्मल बनानेका सबसे उत्कृष्ट साधन है। अतः विष्णुभक्त पुरुषको शान्तभावसे इसका श्रवण करना चाहिये। ब्रह्मन् ! व्यासरूपी भगवान् श्रीहरिने वेदार्थका संग्रह करके पुराणकी रचना की है, इसलिये उसके श्रवण ओर अध्ययनमें तत्पर रहना चाहिये। पुराणमें धर्मके स्वरूपका निश्चय किया गया है और धर्म साक्षात् श्रीविष्णुका विग्रह है। अतः विद्वान् पुरुष पुराण-श्रवण करके विष्णुरूप ही हो जाता है। ब्राह्मण स्वयं श्रीहरिका स्वरूप है और पुराण भी ऐसा ही माना गया है। इन दोनोंका सज़ा पाकर मनुष्य नस्से नारायण हो जाता है।
अश्वमेधसहस्लस्य. यत्फल॑ सपुदाहतं । तत्फल समवाप्रोति देवाग्रे यो जप चरेत् ॥ विशेषतः कलो व्यास पुराणश्रवणादूते । परो धर्मों न पुंसां हि मुक्तिध्यानपरः स्पृतः ॥ या गति: पुण्यशीलानां यज्वनां च तपस्विनाम् सा गति: सहसा तात पुराणश्रवणात् खलु ॥ ज्ञानावाप्तिरयदा न स्थाद्योगशास्त्राणि यत्नत: | अध्येतव्यानि पोराणं शास्त्र श्रोतव्यमेव च ॥ पापं॑ संक्षीयत्ते नित्य धर्मश्षैव विवर्धते । पुराणश्रवणाज्ज्ञानी न संसार प्रपद्यते ॥ ' अतएव पुराणानि श्रोतव्यानि ग्रयत्नतः । धर्मार्थकामलाभाय मोक्षमार्गाप्तमे तथा ॥ यज्ैदनिस्तपोभिस्तु यत्फल॑ तीर्थसेवया । तत्फल॑ समवाप्नोति पुराणश्रवणान्नर: ॥
अन्यो न दृष्टः सुखदो हि मार्ग: पुराणमार्गों हि. सदा शास्त्र विना सर्वमिदं- न भाति सूर्येण हीना इब जीवलोका: ॥
वरिष्ठ:।
(शिवपु० उमासंहिता, अ० १३)
(सनत्कुमारने भगवान् व्यासदेवसे कहा कि मुने |)
जिस प्रकार चन्द्रमा और सूर्यके बिना सारा संसार अन्धकारमय हो जाता है अर्थात् अन्धेके समान कुछ भी नहीं देख पाता उसी प्रकार मनुष्य पुराणके बिना अज्ञानान्धकारमें पड़ा रहता है, अतः हे व्यासदेवं ! सर्वदा इनका स्वाध्याय करना चाहिये। जो मनुष्य पुराणोंका भगवानके सामने पाठ करता है, वह हजार
-अश्वमेध-यज्ञोंका जो फल कहा गया है उसे प्राप्त कर लेता
है। विशेषतः कलियुगमें पुराणश्रवणको छोड़कर पुरुषके लिये सिद्धि ओर मोक्ष प्रदान करनेवाला कोई और धर्म---उपाय नहीं है। जो पुण्यशीलों, यज्ञकर्ताओं और तपस्बियोंकी गति कही गयी है वही गति पुराण-श्रोताओंको बड़ी सरलतासे अनायास ही प्राप्त हो जाती है। मनुष्यको यदि योगादि शास्त्रों, अन्य मार्गों या साधनोंसे ज्ञानकी प्राप्ति न हो तो पुराणोंका प्रयत्रपूर्वक श्रवण...
९० # सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा « [पुराणकथा-
तथा अध्ययन करना चाहिये। पुराणोंके श्रवणसे सारे पापोंका क्षय होता है, धर्मकी अभिवृद्धि होती है और मनुष्य ज्ञानी होकर संसारमें पुनर्जन्म नहीं लेता । इसलिये अत्यन्त अयल्लसे
धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिये पुराणोंका श्रद्धासे श्रवण करना चाहिये। यज्ञ, दान, तपस्या और तीर्थोकी सेवासे
जो फल प्राप्त होता है, वही फल पुराणोंके श्रवणसे अनायास प्राप्त हो जाता है। पुराण-मार्ग सर्वदा सर्वश्रेष्ठ रहा है। दूसरा कोई भी मार्ग सुखद नहीं देखा गया । जैसे सूर्यके बिना समस्त जीवलोक प्रकांशित नहीं होता, वैसे ही पुरणशासत्रके बिना यह सब कुछ अज्ञानान्धकारमें डूबा-सा रहता है।
कीर्तनीय: सदा हरिः
यस्मिन् न््यस्तमतिर्न याति नरक स्वर्गोडपि यच्चिन्तने
विघ्लो यत्र निवेशितात्ममनसो ब्राह्मोणपि लोकोउल्पकः । मुक्ति चेतसि यः स्थितोडइमलधियां पुंसां ददात्यव्ययः
कि चित्र यदघ प्रयाति विलय तत्राच्युते कीर्तिते॥ यज्ञैर्यज्विदो चजन्ति सततं॑ यज्लेश्वरं कर्मिणो
से सै ब्रह्म परावरमर्य ध्यायन्ति च ज्ञानिनः ।' ये संचिन्य न जायते न प्रियते नो वर्धते हीयते
तैवासन्न च सखद्थवत्यति ततः कि वा हरेः श्रूयताम ॥ कव्य॑ यः पितृरूपधृग्विधिहुतं हव्य॑ भुडन्के विभु-
देवत्ये भगवाननादिनिधन:ः स्वाहास्थधासंज्ञिते । यस्मिन् ब्रह्मणि सर्वशक्तिनिलये मानानि नो मानिनां
निष्ठायै प्रभवन्ति हन्ति कलुषं श्रोत्र स यातो हरि: ॥ नान््तोउस्ति यस्य न चर यस्य समुद्धवोउस्ति वृद्हिर्न यस्य परिणामविवर्जितस्य । नापक्षययं च समुपैत्यविकारि वस्तु यस्ते नतो5स्मि पुरुषोत्तममीशमीड्यम् ॥।
(विण्णुपुण, अंश ६, अ ८) जिममें चित्त लगानेवाला (व्यक्ति) कभी नरकमें नहीं जा सकता, जिनके स्मरणमें स्वर्ग भी विप्नरूप है, जिनमें चित्त लग र ब्रह्मलोक भी अति तुच्छ प्रतीत होता है तथा जो अव्यय प्रभु निर्मलचित्त पुरुषोंके हृदयमें स्थित होकर उन्हें मोक्ष देते न अच्युतकी कथाओंका कीर्तन करनेसे यदि पाप विलीन हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य ही क्या है ? यज्ञवेत्त कर्मनिष्ठ यज्ञोंद्वार जिनका यज्ञैध्वर्रूपसे यजन करते हैं, ज्ञानाजन जिनका परावरमय ब्रह्मस्वरूपसे ध्यान करते हैं जिनका स्मरण ते पुरुष न जन्मता है, न मरता है, न बढ़ता है और न क्षीण ही होता है तथा जो न सत् (कारण) हैं और न असत् )) ही हैं, उन श्रीहर्कि (यशके). अतिरिक्त और कया सुना जाय 2 जो अनादिनिधन भगवान् विभु पितृरूप धारगकर
अग्निमें विधिपूर्वक हवन किये हुए हव्यका श्राद्धमें विनियुक्त कव्यको स्वधा शब्दसे उच्चरित होकर ब्राह्मणरूपमें तथा अग्निमें वक हवन किये ह 25 आम कक श्रयभूत खरयप्रकाश भगवानक विपयम॑
होकर स्वाहा शब्दोच्चारणद्वारा ग्रहण करते हैं और जिन समस्त शक्तियोंके आ वय्रव वि डे प्रमाणकुशल पुरुषोंके प्रमाण भी इयत्ता करनेमें समर्थ नहीं होते, वे श्रीहरि श्रवण-पथमें जाते ही समस्त पापोकी न
ते हैं। जिन हास-विकासरहित प्रभुका न आदि है, न अन्त, न वृद्धि और न अपक्षय ही होता है, जो नित्य निर्विकार
हैं, उन स्तवनीय प्रभु युरुषोत्तमको मैं नमस्कार करता हूं।
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पुराण (अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य श्रीमद्व़्ह्मानन्द सरस्वतीजी महाराजके उपदेशामृत)
पुराण भारतका सच्चा इतिहास है। पुराणोंसे ही भारतीय जीवनका आदर्श, भारतकी सभ्यता, संस्क्रति तथा भारतके विद्या-वैभवके उत्कर्षका वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। प्राचीन भारतीयताकी झाँकी और प्राचीन समयमें भारतके सर्वविध उत्कर्षकी झलक यदि कहीं प्राप्त होती है तो पुराणोंमें । पुणण इस अकाट्य सत्यके च्योतक हैं कि भारत आदि-जगदगुरु था और भारतीय ही प्राचीन कालमें आधिभौतिक, आधिदेविक और आध्यात्मिक उन्नतिकी पराकाष्ठाको पहुँचे थे। पुराण न केवल इतिहास हैं, अपितु उनमें विश्व-कल्याणकारी त्रिविध उन्नतिका मार्ग भी प्रदर्शित किया गया है।
वेदोंकी महिमा अपार है, पर उनकी शब्दावलि दुर्बोध और प्रतिपादन-प्रक्रिया पर्याप्त जटिल है। उन्हें निरुक्त, ब्राह्मणग्रन्थ, श्रोतसूत्र तथा व्याकरण आदि अड्डों, ऋषि, छन्द, देवता आदि अनुक्रमणी और भाष्योंके आधारपर बड़ी कठिनतासे ठीक-ठीक समझा जा सकता है। पर पुराण अकेले ही उनके समस्त अर्थोको सरल शब्दोमें और कथानकशैलीके सहारे सामान्य बुद्धिवाले पाठकोंको भी हृदयंगम करा देते हैं। इसीलिये सभी स्थानोंपर वेदोंको इतिहास, पुराणके द्वारा समझनेकी सम्मति दी गयी है। जो विद्वान् इतिहास-पुराणसे अनभिन्ञ हैं, उन्हें अल्पश्रुत, अल्पज्ञ कहकर वेदार्थ-प्रतिपादन- का अधिकार नहीं दिया गया है। वेद उनसे डरते हैं कि ये मेरा निश्चय रूपसे अनर्थ कर जनसमुदायमें उद्भ्रान्ति उत्पन्न करेंगे । इतिहास शब्दसे महाभारत तथा वाल्मीकि आदि रामायण एवं योगवासिष्ठादि अन्थ भी अभिव्यक्त होते हैं। पुराण शब्दसे पद्म, स्कन्द आदि अठारह महापुराण, विष्णुधर्मोत्तरादि उपपुराण तथा नीलमत, एकाम्रादि स्थलपुराण भी गृहीत होते हैं। इन पुराणोंमें सभी विद्याओंका संग्रह हुआ है।
ज्ञानके भण्डार और धर्मके मूलस्नोत वेद हैं अवश्य, पर उनमें अहॉंका संचार, समयंकी शुद्धि, खर्वा, त्रिस्पृशा आदि विशिष्ट लक्षणोंसहित प्रतिपदासे पूर्णिमातककी कालबोधिनी
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तिथियोंका सुस्पष्ट निर्देश नहीं हुआ है, इसीलिये एकाठशी, शिवरात्रि आदि ब्रतोंका माहात्म्य, ग्रहण आदि विशिष्ट पर्बोकि कृत्य और दर्शन-शास्त्रोंके सूक्ष्मज्ञान तथा पाझरात्र आदि विविध वैष्णव, शैव, शाक्तादि आगमोंके प्रतिपाद्य विषय स्पष्टरूपसे उपदिष्ट नहीं हैं, किंतु पुराणोंमें समस्त चेदार्धसहित ये सभी उपर्युक्त विषय, सभी वेदाड़ एवं धर्मशास्रोंके धर्म- कृत्य, देवोपासना-विधि, सदाचारके विस्तृत उपदेश और कथा उदाहरणसहित वेदान्त, सांख्य आदि प्रक्रियाओंको भी सबको हृदयंगम करानेका प्रयत्न किया गया है। इसलिये भारतीय संस्कृतिसे सम्बद्ध सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान और कल्याणकारी क्रियाओंकी जानकारीके लिये ये ही चिरकालसे आश्रयणीय रहे हैं। इन पुराणोंसे ही पूर्वके विद्वानोने अनेक सुन्दर निबन्ध एवं प्रबन्ध अन्थोंकी रचना की है, जो दैनंदिन सभी कत्योंसे लेकर यावज्जीवन होनेवाले विशेष प्रयोजन-युक्त कर्म, संस्कार तथा यज्ञादि अनुष्ठान, पर्व-महोत्सव आदिके भी निर्देशक हैं। कृष्णद्रैपायन भगवान् वेदव्यासने बड़े परिश्रमसे वेदोंको शाखा-प्रशाखा, ब्राह्मण, कल्पसूत्र, निरुक्त आदिकी प्रक्रियाओंमें विभाजन करके भी जब पूर्णलोकोपकारमें सफलता नहीं देखी, तब उन्होंने विशेष ध्यानस्थ होकर भागवतादि पुराणों, महाभारतादि इतिहासोंकी रचना कर वेदोंके गूढतम संदेशको जन-जनतक पहुँचानेका संकल्प किया। उन्हींकी भास्वती कृपासे समुद्धूत समग्र पुराण-रशि हमारे सामने उपस्थित होकर विश्वकल्याणमें निरन्तर अवृत्त हे। यह पुराण-वाड्मय सूक्ष्म विचार करनेपर वर्तमान समस्त विश्वसाहित्यकी अपेक्षा सभी प्रकार शुद्ध, सभ्यभाषायुक्त सुबोध कथाओंसे समन्वित और मधुरतम पदविन्यासोंसे समलझ्लूत है। इस प्रकार यह पुराणसाहित्य सभीके हृदयको आकृष्ट कर कल्याण करनेके लिये नित्य-निरन्तर तत्पर हैं। विश्व-कल्याणके लिये श्रीभगवान् भारतीयोंको कल्याण- पथ-प्रदर्शक पुराणोंके प्रति आदर, श्रद्धा और भक्ति प्रदान करें, यही उनसे प्रार्थना है।
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+ सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
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पुराणोंमें धर्म ओर सदाचार
[पुराणकथा-
कफ ऋष्रकक कक कफ कक पक भुफक 8 अजक ४ कक
(पूज्यपाद अनन्तश्री ब्रह्मलीन स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज)
व्यक्ति, समाज, रा्ट--किं बहुना अखिल. विश्वके धारण, पोषण, संघटन, सामझस्य एवं ऐकमत्यका सम्पादन करनेवाला एकमात्र पदार्थ हे--धर्म। धर्मका सम्यग् ज्ञान अधिकारी व्यक्तिको अपौरुषेय वेद-वाक्यों एवं तदनुसारी पुराणादि आर्षधर्मग्रन्थोंद्ार ही सम्पन्न होता है। सभी रुस्थितियोंमें सभी प्राणी धर्मका शुद्ध ज्ञान नहीं प्राप्त कर क्ते। राजर्षि मनुका कहना है कि सज्जन विद्वानोंद्वारा ही पका सम्यग् ज्ञान एवं आचरण हो सकता है। जिन ज्ञनोंका अन्तःकरण राग-द्वैषसे कलुषित है, वे परिस्थिति- ग़ात् धर्मके यथार्थ ख्वरूपका अतिक्रमण कर सकते हैं, तः ऐसे सजन-- जिनके अन्तःकरणमें कभी साग-द्वेणादिका व नहीं पड़ता, वे ही सही मानिमें घर्मका तत्व समझ सकते । कितु उनका आचरण (कर्म) भी कभी-कभी किसी रणसे धर्मका उल्लड्डन कर सकता है, इसलिये ऐसे सज्जन द्रनू जिनका हृदय राग-द्वेषसे कभी कलुषित नहीं होता, वे यसे वेद-पुराणादिसम्मत जिस कर्मको धर्म मानते हैं, वे ही पली धर्म हैं। मनुका वचन इस प्रकार है--.... विद्वदूभिः सेवितः सदभिर्नित्यमद्नेघधागिभि: । हृदयेनाभ्यनुज्ञाता यो .धर्मस्त निबोधत ४0 (मनुं० २) १) इसके अनुसार उपर्युक्त सज्जनोंके आचरणको ही पचार कहा जाता है--'आचारप्रभवो धर्म:” (महाभारत ० पर्ब १४९।३७) | यहाँ उसी सदाचार धर्मका कुछ जन््यतः दिग्दर्श कराया जा रहा हैं। भीमांसक एस्लिभइके अनुसार वे धर्म या आचार भी वेद- णानुमोदित ही प्रशस्त होते हैं। सर्वत्र सभी देशोंकी परम्परा प्रशस्त नहीं होती, किंतु जहाँ अनादिकालसे वर्णा्रम, धर्म आदि सभीका पालन होता आ रहा है, उसी देशकी चारकी परम्परा प्रशस्त मानी गयी है। इसीलिये भगवान् कहते हैं-- त्तस्मिनू देशे थे आचारः पारम्पर्यक्रमागतः ।
चर्णानां सान्तरालानां स सदाचार ज्यते ॥
सरखती और दृषह्॒ती--इन देवनदियोंका अन्तराल
- (मध्यभाग) विशिष्ट देववाओंसे अधिष्ठित रहा, अतः यह
देवनिर्मित देश 'ब्रह्मावर्त' कहा जाता है। यहाँ तथा आर्यावततेमें उत्पन्न होनेवाले जनोंका अन्तःकरण पवित्र नदियोंके विशिष्ट जल पीनेके कारण अपने प्राचीन पिठृ-पितामह, प्रपितामहादि- द्वारा अनुष्ठित आचारोंकी ओर ही उन्मुख होता है, अतः वर्णाश्रमधर्म तथा संकर जातियोंका धर्म यहाँके सभी निवासियोंमें यथावत् था । यहाँ उत्पन्न होनेपर भी जिन लोगोंका अन्तःकरण ग्राचीन परम्पराप्राप्त धर्मकी ओर उन्पुख नहीं हुआ और वे लोग मनमानी नयी-नयी व्यवस्था करने लगें तो उनका भी आचार घधर्ममें प्रमाण नहीं हो सकता, अतः परम्परा भी वही मान्य होगी, जो अनादि-अपौरुषेय वेद एवं तदनुसारी आर्ष- धर्मग्रन्थोंसे अनुमोदित, अनुप्राणित हो ।
मनुष्योंको सदा ही सदाचारका पालन और दुराचारका परित्याग करना चाहिये। आचारहीन दुराचारी प्राणीका न॑ इस लोकमें कल्याण होता है, न परलोकमें | असदाचारी प्राणियों करा अनुष्ठित यज्ञ, दाम, तप--सभी व्यर्थ जाते हैं, कल्याणकारी नहीं -होते। सदाचारके पालनसे अपने शरीरादिमें भी वर्तमान अलक्षण दूर होते हैं, अपना फल नहीं देते। सदाचाररूप वृक्ष चारों पुरुषार्थोंका देनेवाला है। धर्म ही उसकी जड़, अर्थ उसकी शाखा, काम (भाग) उसका पुष्त और मोक्ष उसका फल है--
धर्मोडिस्थ पूले धनमस्थ शाखा
पुष्प च कामः फलमस्थ मोक्षः । (वामनपुएण १४१ ९९)
यहाँ इस सदाचारके स्वरूपका कुछ चर्णन क्रिया जाता है... सर्वप्रथम ब्रह्ममुहूर्तमें उठकर भगवान् शंकरद्वारा उपदिषट अपात-मड्अलका स्तरण का चाहिये। इसके द्वीस- देवग्रहादि-स्मरणसे दिन मड्जलमय बीतता है और दुःसम्रका फल शान्त हो जाता है। वह सुप्रभातस्तोत्र इस प्रकार है--
ब्रह्मा मुरारिख्विपुरान्तकारी है भानु: शशी भूमिसुतों वुधद्ष
अट्टू ]
& पुराणोंमें धर्म ओर सदाचार « १३
फ्फ्रम कक्रफऋ्फ#%फ्फ कफ फक्रफ क्र कफ कफ फ़फ फफफफ फ कफ कफ +फ़ कफ फफफफ फफफ फफ़फ कफ क कक फ्् क कफ ऋफ़फ फ कक क कक फफऊ कफ + ४ ४ % कफ कक जे कक फक आफ कफ जप ह कह थे
गुरुक्ष शुक्र: सह भानुजेन कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ सनत्कुमार: सनकः सननन््दनः सनातनोउप्यासुरिपिड्रलो उऋ। स॒प्त स्वरा: सप्त रसातलाशक्ष कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् | सप्तार्णवा: सप्तकुलाचलाश्व सप्तर्षयो द्वीपवराश्च सप्त। भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥ इस प्रकार इस परम पवित्र सुप्रभातके प्रातःकाल भक्तिपूर्वक उच्चारण करनेसे, स्मरण करनेसे दुःस्वप्रका अनिष्ट फल नष्ट होकर सुस्वप्रके फलरूपमें प्राप्त होता है। सुप्रभातका स्मरण कर पृथ्वीका स्पर्शपूर्वक प्रणाम करके शय्या त्याग करना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है-- समुद्रवसने देविं पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्रि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व में ॥ फिर शौचादि कर्म करना चाहिये। शौच जानेके बाद मिट्टी और जलसे इन्द्रियॉंकी शुद्धि कर दन्तधावन करना चाहिये। तदनन्तर जिहा आदिकी मलिनता दूरकर स्त्रान करके संध्योपासन करना और सूर्या्ध्य देना चाहिये । केवल जननाशौच ओर मरणाशौचमें ही बाह्मसंध्याका परित्याग निर्दिष्ट है। उसमें भी मानसिक गायत्री-जप और सूर्यार्ध्य विहित है। किंतु अन्यत्र इन कार्योका परित्याग कभी नहीं होता। ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास--ये चार आश्रम ब्राह्मणोंके लिये ही बिहित हैं। क्षत्रियके लिये संन्यास छोड़कर तीन आश्रमोंका विधान है। बैश्यके लिये ब्रह्मचर्य
और गार्हस्थ्य दो ही आश्रम विहित हैं तथा शूद्रके कल्याणके लिये केवल एक ही आश्रम गार्हस्थ्य ही कहा गया है-- गाह॑स्थ्यं ब्रह्मचर्य च वानप्रस्थे त्रयो मताः । क्षत्रियस्यापि गदिता य आचारो द्विजस्य हि ॥ ब्रह्यचर्य च गाह॑स्थ्यमाश्रमद्धितयं॑ विश: ॥ गाह॑स्थ्यमाश्रम॑ ल्वेके शूद्रस्थ क्षणदाचर ॥ (वामनपुराण १४। ११९-१२०) प्रायः ये ही बातें लेखानस आदि धर्म-सूत्रों एवं स्मार्त-सूत्रोंमें निर्दिष्ट हैं। सदाचारी व्यक्तिको अपने वर्णानुसार और आश्रमानुसार धर्मका परित्याग कभी नहीं करना चाहिये | जो धर्मका परित्याग कर देता है, उसके ऊपर भगवान् भास्कर (सूर्य) कुपित हो जाते हैं। उनके कोपसे प्राणीके देहमें रोग बढ़ता है, कुलका विनाश प्रारम्भ हो जाता है और उस पुरुषका शरीर ढीला पड़ने लगता है---
स्वानि वर्णाश्रमोक्तानि धर्माणीह न हापयेत् । यो हापयति तस्यासो परिकुप्यति भास्कर: ॥ कुपित: कुलनाशाय. देहरोगविवृद्धये । भानुर्वे चतते तस्थ नरस्य क्षणदाचर ॥ (वामनपुराण १४।॥ १२१-१२२ ) महाभारत (आश्वमेधिकपर्व) के अनुसार 'अन्तमें धर्मकी ही जय्र होती है, अधर्मकी नहीं, सत्यकी विजय होती है, असत्यकी नहीं । क्षमाकी जय होती है, क्रोध की नहीं', अत
सभीको--विशेषतया ब्राह्मणको सदा क्षमाशील रहना चाहिये--- ।
' धर्मों जयति नाधर्म: सत्यं जयति नानृतम् | क्षमा जयति न क्रोध: क्षमावान् ब्राह्मणो भवेत् ॥
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समाभश्रिता ये
पदपल्लवप्लवं
महत्पदं॑ पुण्ययशोमुरारे: ।
भवाम्बुधिर्वत्सपर्द पर॑ पद पद परद्द यद् विपदां न तेषाम् ॥
(भाग १० | १४ । ०८)
(जिन्होंने पुण्यकीर्ति मुकुन्द मुरारीके पदपललवकी नौकाका आश्रय लिया है, जो कि सत्पुरुषोंका सर्वस्व है, उनके लिये यह भव-सागर बछड़ेके खुरके गढ़ेके समान है । उन्हें परमपदकी प्राप्ति हो जाती है और उनके लिये विपत्तियोंका निवासस्थान--
यह संसार नहीं रहता !
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* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा *
[पुराणकथा-
पुराणोंमें भगवज्नाम-महिमा
(अनन्तश्रीविभूषित ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य ज्रह्मलीन स्वामी श्रीकृष्णयोधाप्रमजी महाराज)
भगवान्. अचिन्त्यपौरुष,.. अनन्त-गुण-गणार्णव, अच्छेद्यापरिमित-विग्रह, अपरिमिय शक्तिसम्पन्न हैं। उनके नाम-स्मरण-जप तथा रूप-माधुर्यकी सुधा-छटाके पान-रूप महावातसे आहत मेघराशिकी भाँति प्राणीके अनन्तानन्त- जन्मार्जित पापपुझ् नष्ट हो जाते हैं। नाममें ऐसी शक्ति है कि उसका एक बारका उच्चारण सेसारके सभी पातक- पुञ्चको अग्निसात् कर देता है। पुराण कहते हैं कि सभी पातकी जीव यावज्जीवन अपनी सामर्थ्यसे अधिक शक्ति लगाकर भी उतनी पापराशि अर्जन नहीं कर सकते, जितना एक भगवन्नाम सभी पातकोंको दूर करनेकी शक्ति रखता है । नाम्न्यस्ति यावती शक्तिः पापनिहरणे हरेः । तावत् कर्तु न शक्नोति पातर्कं पातकी जनः ॥ (बूहद्धर्मपुराण) जो मनुष्य गिरते, पैर फिसलते, अज्ञ-भज्ञ होते, साँपके डैसते, आगमें जलते तथा चोट लगते समय भी विवशतासे 'हरि-हरि' कहकर भगवानके नामका उच्चारण कर लेता है, वह यमयातनाका पात्र नहीं रह जाता। उसका सर्वविध कल्याण होता है। पतित:ः स्वलितों भग्नः संदष्टस्तप्त आहत: । हरिरित्यवशेनाह . पुमान्नाहति यातनाम् ॥ (श्रीमदूभा? ६।२। १५) संज्ञा-संज्ञीका अभेद अब विचारणीय यह है कि यह शक्ति भगवानकी है या भगवानके नामकी। शब्द-शक्तिवादी कहते हैं कि नाम और नामीमें अभेद है। इसी अभेद-सम्बन्धको तादात्य-सम्बन्ध भी कहते हैं। अनन्त-शक्तिसम्पन्न ऋरुणावरुणालय भगवान् सच्चिदानन्दघनका जिस प्रकार चित्-अचित् विश्व-विवर्त है, ठीक उसी प्रकार उनके चत-अंशका विवर्त समस्त शब्द-वाड्मय है, क्योंकि जैसे चत् प्रकाशक है, उसी प्रकार शब्द भी श्रकाशक है । ब्रह्मके सर्देशका विवर्त--सभी अभिधिय अर्थजन्यमात्र है, क्योंकि सत्तारूपसे ही सभी पदार्थ विद्यमान रहते हैं।
सभी शब्द और अर्थ चैतन्य-तत्त्वके विवर्त हैं। महाकवि कालिदास रघुवंशके आस्म्भमें पार्वती और परमेश्वरकी स्तुति करते हुए उन्हें वागर्थकी तरह सम्पृक्त कहते हैं। सभी शब्दोंकी शक्ति जातिमें है ओर जाति सत्तारूप है। सत्ता ही सत-तत्त्व है, इसीलिये सभी शब्दोंका अभिधेय यानी अर्थ सत्तारूप ही होता है।
लोकमें जिस प्रकार घट शब्द चिदंशका विवर्त है, उसी प्रकार कम्बु-ग्रवादिमद् व्यक्ति सतका विवर्त है। यह विवर्तवाद सच्चितुकी एकताकी भाँति घट शब्द ओर घट-अर्थकी एकताका पोषक है। इसी प्रकार भगवानके अनन्त नाम उनके वाचक होते हुए भी वाच्य भगवदर्थके साथ एकता-सम्पन्न हैं। लौकिक भेंद औषाधिक है। भगवानके अनन्त नाम उनके अनन्त स्वरूपके परिचायक हैं।
शब्दमें विलक्षण शक्ति है। किसी व्यक्तिका नाम लेनेपर वही आता है। वैयाकरणोंके अनुसार कोई भी व्यवहार शब्दानुगमनसे व्यभिचरित नहीं है। जिस प्रकार शब्दानुविद्ध लौकिक व्यवहार अबाधितरूपसे चलते हैं और लोक उनके प्रति कभी भ्रान्त नहीं होता, ठीक उसी प्रकार प्रत्यग्भिन्न चैतन्यमें- भी शब्दका चमत्कार दीखता है। भगवन्नाम उच्चारण करनेसे तीक्ष्ण तीरके लक्ष्यभेदकी भाँति वह भगवानके हृदयपर प्रभाव करता है। जिससे जीवके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। फलस्वरूप प्राणी भगवत्कृपाका भाजन बनता है-“
तस्मात् संकीर्तन विष्णोर्जगन्मड्रलमंहसाम् । (श्रीमदभा? ६।३। ३१)
साथ ही संस्कृत-साहित्यमें प्रयुक्त होनेवाली जितनी शब्दराशि है, वह अपने वास्तविक अर्थसे ओतप्रोत है। जैसे जल्दी बढ़नेसे वृक्ष, पैस्से जल पीनेसे पादप, पश्षियोंके उड़कर बैठनेसे तरु आदि शब्दोंकी सार्थकता है, उसी प्रकार प्रत्येक भगवन्नाम भी अपने अर्थकी शक्तिसे युक्त है। स्वर्य भगवत्राम शब्द जो 'भग-बत्-नाम'--इन तीन पदोंसे मिलकर बना हैं विशिष्ट व्युतत्तियुक्त है। पुराण कहते हैं--
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# पुराणोंमें भगवन्नाम-महिमा * १५
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ऐश्वर्यस्थ समग्रस्थ धर्मस्य यशसः प्रिय: । ज्ञानवैराग्ययोश्वैब षण्णां भग इतीरणा ॥ * (विष्णुपु० ६। ५। ७४) इस प्रकार भगवान् शब्द समस्त ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैरग्यमयताका संकेत करता है। यह गौरव भगवानको ही प्राप्त है। उनमें अनन्त ब्रह्माण्डोंके अनन्त जीवोंका ज्ञान, उनके अनन्तानन्त कर्मोका ज्ञान, अनन्तानन्त कमेकि फलोंका ज्ञान और उन कर्मफलोंको देनेकी सामर्थ्य है । अस्तु ! भगवन्नामका किसी भी प्रकार उच्चारण किया जाय, वह प्राणीके सर्वविध अघ-वृत्तिका समुच्छेदन करता है ।
- फिर भी--“जगत्पवित्र हरिनामधेयं
'क्रियाविहीन न पुनाति जन्तुम् | '
-+परमपिताके नाम यद्यपि जगत्को पावन करनेवाले हैं, परंतु धर्म--सत्-क्रिया-विरुद्ध प्राणीको वे पवित्र नहीं करते। जिस प्रकार महोषधसेवन रोग-निवृत्तिके प्रति कारण अवश्य है, परंतु उसके साथ सुपथ्य-सेवन और कुपथ्य- परिवर्जज भी आवश्यक है। सुपथ्य-सेवन तथा कुपथ्य- परिवर्जनके साथ यदि ओषधिका प्रयोग नहीं किया गया तो वह सर्वविध गुणगणयुक्त होते हुए भी हितावह नहीं होती । इसी प्रकार अधर्मी व्यक्तिका भगवन्नाम-रूपी ओषध परम कल्याण नहीं करता ।
भगवजन्नामके साथ वर्णाश्रम-धर्म
भगवज्ञामोच्चारण यदि वर्णाश्रम-मर्यादाका अनुसरण करते हुए किया जाय तो उसमें सदगुण आता है। यह ठीक है कि अजामिल-जैसोने पुत्रके नाम 'नारायण'से ही कल्याण प्राप्त किया, परंतु वह पहले अपने स्वधर्मका पालन अवश्य करता था। जिसका जो धर्म हो उसके अनुसार उसे व्यवहार करते हुए अधिकारानुसार ही भगवतन्नाम-संकीर्तन करनेसे
कल्याण होता है। इसीलिये--
त्यक्वा स्वधर्म चरणाम्ब॒ुजं॑ हरे-
भ्रजन्नपक्वोड्थ पतेत्ततोी. यदि ।
यत्र क्व वाभद्रमभूदमुष्य कि को वार्थ आप्तो5भजतां स्वधर्मत: ॥ (श्रीमदभा" १। ५। १७)
जो स्वधर्मका पालन न करते हुए यदि हरिका नामोच्चारण करता है ओर कदाचित् वह गिर जाय तब क्या उसका कल्याण हो सकेगा ? साथ ही धर्मपालनपूर्वक हरिको न भजनेवालेको क्या कोई लाभ हो सकेगा ? अर्थात् ख्धर्मानुष्ठानपूर्वक हरिनाम-कीर्तन कल्याणप्रद होता है। यही मुख्य कारण है कि आज रामायण और गीताका अधिकाधिक प्रचार-प्रसार होते हुए भी नास्तिकता, उच्छुछ्डुलता तथा शास्त्रोमें अविश्वासकी वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थितिमें जहाँ एक ओर भगवत्नाम- महिमाकी चर्चा होती है, वहाँ स्वधर्म-पालनकी चर्चा भी होनी चाहिये। 'स्वल्पमप्यस्थ धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।' स्वधर्मका थोड़ा भी अनुष्ठान महाभयसे मुक्त करता है। 'स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि, विन्दति मानव: ।! अर्थात् मानव अपने वर्ण और आश्रमधर्मका पालन करते हुए भगवद्गुणानुवादवर्णन, उनके दिव्य मड़ल-विग्रहका दर्शन, उनके पवित्र नामोंका उच्चारण करता हुआ कल्याणका भागी बन सकता है। श्रुति, स्मृति, पुरुण और रामायण-महाभारत आदि सभी स्वधर्मानुष्ठानपूर्वक भगवन्नाम-संकीर्तनसे कल्याण- का निर्देश करते हैं। ॒
इन सभी बातोंको तात्तिक रूपसे जाननेके लिये संस्कत भाषाका ज्ञान अत्यावश्यक है। आज देशके नव-शिशु धर्मसे और धार्मिक वातावरणसे दूर हटते चले जा रहे हैं। एक ओर राम-नामकी महिमा गायी जाती है तो दूसरी ओर शिखा-सूत्रको जलाञ्जलि दे दी जाती है। शिखा-सूत्रविहीन जो भी कर्म किये जाते हैं, सब निष्फल हो जाते हैं।
सदोपवीतिना भाव्यं॑ सदा बद्धशिखेन च।
विशिखो व्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम्॥-
(कात्यायनस्मृति १।४)
अतएव स्वधर्मपालनपूर्वक ही हसरिनामस्मरण पूर्ण
कल्याणप्रद हो सकता है, यही निर्विवाद सिद्धान्त है।
हि ---#«म्ऊे#€«२-+ ्त-+ राम नाम गुन चरित सुहाएं।जनम करम अगनित श्रुति गाए॥ जथा अनंत राम भगवाना । तथा कथा कीरति गुन नाना।॥
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* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
(पुराणकथा-
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पुराणोंका परम प्रयोजन-- भगवद्ाप्ति (ब्रह्मलीन स्वामी श्रीअखण्डानन्दजी सरस्वती महाराज)
संस्कृत बाड्मयमें पुराणोंका एक विशिष्ट स्थान है। इनमें वेदार्थका स्पष्टीकरण तो है ही, कर्मकाण्ड, उपासनाकाप्ड तथा ज्ञानकाण्डके सरलतम विस्तारके साथ-साथ कथा-वबैचित्रयके द्वार साधारण जनताको भी गूढ़-से-गूढ़तम तत्त्वको हृदयड्रम करा देनेकी अपनी अपूर्व विशेषता भी है। इस युगमें धर्मकी रक्षा और भक्तिके मनोरम विकासका जो यत्किंचित् दर्शन हो रहा है, उसका समस्त श्रेय पुराण-साहित्यको ही है! साधारण मनुष्यकों जब यह मालूम होता है कि भगवान् देश, काल ओर वस्तु-भेदोंके परे, हमारी बुद्धि एवं इन्द्रियोंसे अतीत, अपने स्वतः-सिद्ध स्वरूपमें स्थित हैं, तब वह यह घोचकर भयभीत हो जाता है कि जो हमारी वृत्तियोंके आकलमनसे सर्वथा अतीत है, उसकी हम उपासना कैसे करें, प्यृति कैसे करें, उसे हम अपने हुृदय-मन्दिरमें लाकर कैसे ब्रैठायें ? मनुष्यकी इस विवशताको पुराणों और संतोंने भली- भाँति अनुभव किया और उन्होंने भगवानकी कृपालुताका आश्रय जेकर उनकी सर्वव्यापकता एवं सर्वोत्तकताके यथार्थ आधारपर देश, काल ओर वस्तुओंके भीतर ही भगवान्के प्रॉनिध्य, उपासना ओर स्मृतिका ऐसा प्रशस्त द्वार उद्घाटित केया, जिसे देखकर उनके सामने कृतज्ञताके भारसे सिर चर्य ही अवनत हो जाता है। आयः सभी पुराणोंमें अनेक तरर्थों, त्रतों और पवित्र वस्तुओंके रूपमें जो भगवान्का हस्यमय वर्णन आता है, उसका यही रहस्य है। सभी तीर्थ प्रलौकिक हैं, भगवन्मय हैं और भगवान्की विचित्र तीलाओंके स्मृतिचिह्न होनेके कारण दर्शन, सेवन, स्मरण ओर प्रभिगमनमात्रसे चित्त-शुद्धि करनेवाले हैं। तीर्थोकी महिमाका र्यवसान भी ' भगवान्की स्मृतिर्में ही है, पद्मपुराणमें कहा या है-- तीर्थानां च पर तीर्थ कृष्णनाम महर्षयः ॥ तीर्थीकुर्वन्ति जगरती गृहीत॑ कृष्णनाम ये: । (स्वर्गखप्ड ५० | १६,१६७) 'समस्त तीर्थोमें सबसे बड़ा तीर्थ क्या है ? भगवान् गकृष्णका नाम | जो लोग श्रीकृष्ण-नामका उच्चारण करते हैं, । सम्पूर्ण जगतको तीर्थ बना देते हैं। इसके पूर्व--' अ्रतिमा
च हरेदृ्टवा सर्वतीर्थफलं लपेत' इत्यादि वचनोंसे स्पष्ट मालूम होता है कि तीर्थोकी महिमा भगवस्त्मृतिके लिये है। उनका तात्पर्य, उनका पर्यवसान निरन्तर भगवत्स्परणमें ही है।
यह सम्पूर्ण नाम-रूप-क्रियात्मक जगत् भगवत्स्वरूप ही है। यह घट है, यह पट है, यह मठ है आदि जितनी भी विकल्पनाएँ हैं, वे भगवत्खरूपसे पृथक् नहीं हैं। सृष्टि और सृष्टि-कर्ता, पाल्य और पालक, संहरणीय और संहर्ता--सब कुछ एकमात्र प्रभु ही हैं! मनसे जो कुछ संकल्प-विकल्प होता है, चक्षुरादि इन्द्रियोंसे जिन-जिन विषयोंका गहण होता है और बुद्धिके द्वार जिन-जिन वस्तुओंका आकलन होता है, वे चाहे देशके रूपमें हों, कालके रूपमें हों अथवा बस्तुके रूपमें हों सब भगवानके ही स्वरूप हैं।
यद्ब॒प॑ मनसा ग्राह्मं यव् ग्राह्मं चक्ष्रादिभि:।
बुद्धया च यत्परिच्छेद्य॑ तद्रुपपखिले तब ॥
जिस प्रकार मन्त्रसंहिताओंमें 'पुरुष एबेदं सर्वम' तथा उपनिषदोंमें 'सर्व खल्विदं ब्रह्म” इत्यादि श्रुतियाँ परमात्मा सर्वस्वरूप है' इस बातका प्रतिपादन करती हैं, ठीक वैसे ही पुराण भी भगवान्कों सर्वात्मक स्वीकार करता है। इसीसे किसी भी तीर्थके रूपमें, ब्रतके रूपमें, भागवतादि ग्रन्थके रूपमें तुलसी आदि वस्तुके रूपमें कहीं भी यदि भगवद्भाव हो जाय तो धररि-धीरे उस वस्तुकी जड़ता और पृथकूता नष्ट होने लगती है और चैतन्यस्वरूपका आविर्भाव हो जाता है|
उपर्युक्त वर्णन पढ़कर यह प्रश्न स्वाभाविक ही उठता है कि यदि परमात्मा सर्वस्वरूप है तो क्या वह परिणामको प्राप्त होकर जगतके रूपमें हुआ है अथवा उसने प्रकृति, परमाणु आदिके रूपमें स्थित जगत्कों ही आत्मप्राधान्यसे उज्जीवित किया है अथवा वह स्वाभाविक ही जगद्गभूप है ? परमात्माको परिणामी मानतेसे उसकी निर्विकारता नहीं बनती। प्रकृति-परमाणु . आदिका अस्तित्व स्वीकार करनेपर अद्वितीयताका व्याकोप होता है। स्वाभाविक ही जगद्गूप माननेपर जन्म-मृत्यु आदिकी प्राप्ति दुर्निवार है। ऐसी अवस्थामें परमात्मा सर्वरूप है--इस वाक्यका क्या अर्थ है ? सर्व भी है और परमात्मा भी है अथवा केवल परमात्मा ही
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है ? इस सम्बन्धमें उपनिषदादि समस्त शास्त्रोंके साथ पुराणकी एकवाक्यता है। जैसे श्रुतियाँ ज्ञाननिर्वर्य होनेके कारण प्रपञ्ञको मिथ्या स्वीकार करती हैं, पुरुषका बोध करके जैसे स्थाणुका बोध होता है, ठीक वैसे ही पुराण भी प्रपश्चकी भ्रान्तिजन्यता ओर परमात्माके अतिरिक्त अन्य वस्तुकी असत्ता प्रतिपादन करता है। परमात्मा त्वमेवैकों नान्योउस्ति जगतः पते। ज्ञानस्वरूपमसिलं जगदेतदबुद्धय: । अर्थस्वरूपं पश्यन्तो भ्राम्यन्ते तमसः प्लवे ॥
- 'हे जगत्पते! एकमात्र तुम्हीं परमात्मा हो, आपके अतिरिक्त और कोई नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत् ज्ञानस्वरूप ही है। इस बातको जाननेवाले अज्ञानीजन जगत्को विषयरूप देखते हैं ओर अज्ञानमय संसार-सागरमें भटकते रहते हैं, उन्हें पार जानेका मार्ग ही नहीं मिलता |!
पसमात्माके निर्विशेष स्वरूपका स्पष्ट प्रतिपादन है--
पर: पराणां . परम: परमात्मा पितामहः ।
रूपवर्णादिरहितो. विशेषेण॒ विवर्जितः ॥
अपि वृद्धिविनाशांभ्यां परिणामविजन्मपग्रि: ।
गुणेविंवर्जित: सर्व: स भातीति हि केवलम् ॥
'परमात्मा समस्त कार्य-कारणसे परे, अरूप, अवर्ण, निर्विशेष, हासोललाससे रहित, निर्विकार, अज एवं निर्गुण हैं। वह केवल ज्ञानस्वरूप, स्फुरणस्वरूप हैं।' वेदान्त-प्रतिपाद्य परमात्माका इस प्रकार वर्णन करके पुराणोंमें आत्माके साथ इसके एकत्वका भी स्पष्टरूपसे निर्देश किया गया है।
नान्ये देव महादेवाद् व्यतिरिक्ते प्रपश्यति।
तमेवात्मानमन्वेति यः स याति पर पदम ॥
मन्यन्ते ये स्वमात्मानं विभिन्न परमेश्वरात्।
न ते पश्यन्ति ते देव वृथा तेषां परिश्रम: ॥
: “जो अधिकारी पुरुष सर्वप्रकाशक परमात्मासे अतिरिक्त अन्य किसी प्रकांशकको नहीं देखता और उस परमात्माको ही अपनी आत्मा जानता है, उसे परमपदकी प्राप्ति होती है। जो अज्ञानीजन अपने-आपको परमात्मासे पृथक् मानते हैं, उन्हें परमात्माके दर्शन नहीं होते, उनका सारा परिश्रम व्यर्थ है।'
“उन दोनों श्लोकोमें अन्वय-व्यतिरिकसे स्पष्टरूपंसे यह बात कही गयी है कि जो परमात्मो और आत्माके एकत्व-
ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन्हें परमपदकी प्राप्ति होती है और हे एकत्व-ज्ञानको स्वीकार नहीं करते, उनका परिश्रम व्यर्थ ४ । अब हम इस परिणामपर पहुँचते हैं कि समस्त थेदान्तोंक्रा परम तात्पर्य जिस प्रकार प्रपञ्ञके मिथ्यात्त ओर ब्रह्मात्यिम्वफ
प्रतिपादन करता है, क्योंकि मीसांसा-पद्धतिके अनुसार समस्त शास्त्रोंकी एकवाक्यता अनिवार्य है ओर बिना उसके कोई भो वचन शाख््रकी श्रेणीमें नहीं आ सकता | व्यतिरिक-मुखसे यह बात कहीं जाती है कि भगय्ान् सबसे परे हैं और अन्वय-मुखसे यह बात कही जाती है कि सब कुछ भगवान् ही हैं। केवल भगवान् हो ऐसे हैं जिनमें इच्छाकी एकता, स्मृतिकी एकता, दृष्टिकी एकता सम्पादन क्री जा सकती है। पुराणोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है--.. ऊर्ध्वबाहुरह॑ं वच्मि शूणु मे परम बच: । गोविन्दे धेहि ह्दद्यं 'मैं बाह उठाकर श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ बात कहता हैं , सावधान होकर सुनो, जैसे हो वैसे अपना हृदय भगवान्को समर्पित करो। उनकी स्मृतिमें डूब जाओ, वही सर्वमड्रलकी जननी है ।' परमात्मतत्त्के साक्षात्कारके लिये जीवको ज्ञान और ध्यानकी शरण लेनी चाहिये। श्रवण-मननसे सुनिष्पन्न अर्थमें चित्तकी स्थापना अथवा भगवत्स्मृतिकी परिपक्व परिणत अवस्थाका नाम ही ध्यान है। यह ध्यान सब अधिकारियोंके लिये सुलभ न होनेके कारण ही तीर्थ, ब्रत, भागवत-गीता- माहात्य, साधुसद्ज, ब्राह्मण-पूजा आदिके द्वारा अन्तःकरण- शुद्धिपूर्वक भगवत्स्मृतिको जगानेकी चेष्टा की गयी है। जैसे श्रुतियाँ 'स्मृतिपरिशुद्धी सर्वग्रन्थीनां विध्रमोक्ष:' वर्णन करती और 'नान्य: पन्था विद्यतेडयनाय' आदि शत-शत बचनोंसे ज्ञानके द्वारा ही तत्त्व-साक्षात्कारका निरूपण करती हैं, ठीक वैसे ही पुराण भी--- ह .. साधुसड्जाद् भवेद चरिप्न शास्तराणां श्रवर्ण प्रभो: । । रत, तस्मात् तत्तो ज्ञान ततो गतिः॥ मि हल का आकक 0 करनबाता हे लक श्रट्धता और सन््यताका
निर्णय होनेपर ऑआस्लिक्री र्णय होनेपर इतर वस्तुकी आस्तिक्री इच्छा नि्रालि टी जाती £
और एकमात्र भगवत्याप्तिकी इच्छारूपा भगवद्भक्तिका उदय होता है, भगवद्भक्तिसे भगवत्तत्त-विज्ञान और ततदनन्तर परमगतिकी प्राप्ति होती है।'
परमगतिको प्राप्त करानेवाले तत्त्तज्ञानका अव्यवहित साधन भगवद्भक्ति है। इसी तत्त्वके प्रतिषादनमें समस्त पुराणोंकी अपूर्वता है। श्रीमद्भागवतमें “भक्तिविरिक्ति- भंगवस्रबोध:' का भी यही अर्थ है। बिना भगवदभक्तिके अन्तःकरण-शुद्धिकी पूर्णता और भगवत्तत्व-विज्ञान नहीं हो सकता। इसीलिये कहीं-कहीं तो तत्वज्ञानसे बढ़कर भी भक्तिकी महिमाका उल्लेख मिलता है। सत्य ही है, साधनमें बिना अनन्यनिष्ठा हुए साध्यकी प्राप्ति त्रिकालमें भी नहीं हो सकती। समस्त पुराण इस सिद्धान्तका प्रतिपादन करते है--भक्ति ही श्रेष्ठ है, भक्ति ही श्रेष्ठ है।
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा «
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[पुराणकथा-
कक आर कर आ करा इ कफ फफक कफ कफ फफक कह फऋ कफ फ ऋ कफ ऋफऊ 7
मनत्र-जप, पूजा, ध्यान, रहस्य आदिका भी पुराणोंमें अत्यन्त ओष्ठ शेलीसे निरूपण किया गया है। नाम, धाम, रूप, लीला--ये सब चिन्मय भगवत्स्वरूप हैं, इन सबका अथवा इनमेंसे किसी एकका भी आश्रय गहण कर लेनेपर जीवके लिये कुछ कर्तव्य शेष नहीं रह जाता। ज्ञान, मुक्ति आदि तो इनमेंसे एक-एक्रके सेवक हैं। अवश्य ही ऐसे वर्णनोंसे अपनी निष्ठामें साधकोंकी अनन्यता होती है और यह सर्वथा यथार्थ भी है, क्योंकि त्ह्मतत्त्के सिवा जब और कोई वस्तु ही नहीं है, तब किसी भी वस्तुको ब्रह्मरूपसे तिरूपण करेेमें आपत्ति ही कहाँ रह जाती है। पुराणका अभिप्राय किसी भी प्रकार हो--भगवत्स्मृति, भगवदभक्ति, भगवत्तत्लज्ञान एवं भगवत्तत्त-साक्षात्कारमें है, इसीसे इसीमें जीवको कृतकृत्यता है।
सुहृत-सम्मित पुराण
( अनन्तश्रीविभूषित दक्षिणाम्नायस्थ शृंगेरी-शारदापीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीअभिनवविद्यातीर्थनी महाराज )
जिन उत्तम उपदेशोंसे हमारा जीवन पवित्र बनता है, वे उपदेश तीन प्रकारके होते हैं--प्रभु-सम्मित, सुहृत्-सम्मित और कान्ता-सम्मित। किसी कारणको बिना बताये दिये जानेवाले आदेश प्रभु-सम्मित कहे जाते हैं, जैसे राजाशञा | वेदोंके उपदेश प्रभु-सम्मित हैं। कथा-कहानीके द्वारा दिये जानेवाले उपदेश सुहत्-सम्मित हैं। मित्रपर प्रभुलसे नहीं, किंतु स्नेहके कारण मित्रकी भलाईके लिये दिये जानेवाले सुझाव भी उपदेश ही हैं, वे सुहृत्-सम्मितत माने गये हैं। अपने मधुर व्यवहारसे अपनी ओर आकैट करनेवाली बातें कान्ता-सम्मित उपदेश हैं। इस कोटियें रघुवंशादि काव्य आते हैं। पुराणेके विषयमें कहते हैं कि-- निस्ताराय तु लोकानां स्व नारावण: अश्ुः । व्यासरूपेण कृतवान् पुराणानि महीतले 0 पठनाच्छृवण्ये्षा तृर्णा पापक्षयो भवेत् । धर्माधर्मपरिज्ञाने सदाचार्रवर्तनम् । गतिक्ष परमा तहद् भक्तिर्भगवत्ति प्रभो 0 भगवान् नारायणने भूमण्डलपर व्यासरूपसे अवतरित होकर लोगोंको पार पहुँचानेके लिये पुरणोंकी रचना वी | ई पुराणोंके पठन और श्रवणसे लोगोंका पाप नष्ट होता है, धर्म
और अधर्मका ज्ञान होता है, सदाचारमें प्रवृत्ति होती है और भगवानमें भक्ति बढ़ती है। जिसके द्वारा मोक्षकी प्राप्ति सम्भव है ।'
भगवान् व्यासने मानव-समाजको भवसागरसे पार होनेके लिये पुराणोंद्राए भगवद्वतारकी लीलाएँ, आदर्श पुरुषोंका सच्चर्त्रि, भक्तिमय जीवन और धर्माचरण श्रस्तुत करके मानवसमाजका कल्याण किया। पुगणोमें सच्चे मार्गपर चलनेवालोंका श्रेय और बुरे आचरणवालोंकी दुर्गति भ्रलीभाँति दिखायी गयी है। इन कथारूप उपदेशोंको सुनते-सुनते सामान्य मानव भी अपना मन निर्मल बनाकर धर्ममा्गपर ही चलनेमें श्रद्धावान् बनेगा। व्यासजीके सोरे पुराण सुहृत्-सम्मित उपदेश हैं। इन उपदेशेकि प्रभावके ही कारण आजतक हम भारतवासियोंके मानसपटलपर अपनी पुरानी संस्कृति अड्डित है। गाँव-गाँव और मन्दिर-मन्दिरमें पुराणेकि प्रवचन होते रहें तो साधारणजन भी अपनी संस्कृति
, समझकर सन्मार्गपर चल सकेगा। पुराणोमें प्रतिपादित कु
कथाओंका मूल वेदोंमें मिलता है। वेदोंमें संक्षिप्त रूपसे प्रतिपादित कथाएँ रोचकताके साथ विस्तारपूर्वक पुराणेमिं कही गयी हैं। कृष्ण-यजुर्वेद्सहिता ६।३ २९६ ४ वाजसनेवि
अड्डू] * पुराणोंकी वेदवत् प्रतिष्ठा * ९९ फक्रककरफऋऋफ़ऋ कक कफ फफ्रक फफ्रफफकफ फ्फ़ज फफर ऊ क फ फ् क ऋ अाफ्र फफ फफफक फर्क फ के ऊ फ फल भा कमा फक पापा रा यस्य््््च्््यस्प्पिस््स््म्् फरफफ्फफफ्रफफफ कफ फफफफफफफफफफ भफ ५फक ४ क फफऊ फ्फ फ भा फ्र ५ ४ क्र ऋ फ फऋ कफ फ कफ फ़ कफ हक फ फू कफ फ फू फ जा कु.
३०। ९ आदियमें प्रतिपादित उपसद्धोम नामक विषय पुराणोंमें वर्णित शिवकृत त्रिपुर-संहार-कथासे मिलता-जुलता हे पुराणप्रतिपादित प्रह्माद, विरोचन, वसिष्ठ, विश्वामित्र आदिकोंका परिचय भी वेदमें मिलता है। वेद और पुराणोंका घना सम्बन्ध है। शास्त्रोमे कहा गया है कि-- इतिहासपुराणाभ्यां वेद सघ्तुपबृंहयेत् । बिभेत्यल्पश्चुताहेद: मामय॑ प्रतरेदिति ॥
'वेद अल्पज्ञसे भय खाता है कि यह मुझे ठगेगा। अतः इतिहास-पुराणोंसे वेदका उपबृंहण करना चाहिये।' पुराण सुहृत्-सम्मित होनेसे सबको प्रिय हैं। उनमें प्रतिपादित कथाओंसे सबको अच्छी शिक्षाएँ मिलती हैं। पुराण-कथा- श्रवणसे जीवन सुधरता है तथा इहलोक और परलोक-- दोनोंमें श्रेय ओर जीवनमें शान्ति मिलती है।
७ क ६-९
'पुराणोंकी वेदवत प्रतिष्ठा
(अनन्तश्रीविभूषित ऊर्ध्वाप्नाय श्रीकाशी-(सुमेरु) पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी श्रीशंकरानन्द सरस्वतीजी महाराज)
भारतवर्षमें पुणतनकालसे भारतीय संस्कृति एवं धर्मके विषयमें पुराणोंका महत्त्व था, है तथा रहेंगा। कारण, पुराण सनातनधर्मके कल्याण-मार्गों (कर्म, उपासना, ज्ञान) का विविध ढंगसे उपस्थापन करते हैं। पुराण वेदोंके गम्भीर एवं समाधिगम्य विषयोंका विभिन्न भाव, भाषा, अलझ्डूर तथा गाथाओंके द्वारा स्फुटीकरण करते हैं। वास्तवमें पुराण वेदोंके व्याख्यान-यग्रन्थ हैं। अतः पुराण सर्वथा वेदानुकूल हैं । पुराणोंमें एक भी विषय वेद-विरुद्ध नहीं है। पुराणोंमें यदि किसीको : बेदविरोध या प्रतिकूलता प्रतीत होती हो तो वह उसकी बुद्धि या समझका दोष है, पुराणका नहीं । अतएवं कहा गया है-- इतिहासपुराणाभ्यां. वेद समुपबंहयेत् ॥ बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदों मामये प्रहरिष्यति । (महा० आदि० १।२६७, २६८) पुराणोंकी प्रामाणिकता वेदोंकी भाँति पुराण भी ईश्वरके निःश्वास हैं। “अस्य महतो भूतस्य निश्चसितमेतद् यद् ऋग्वेदो .यजुर्वेद: साम- वेदो5थर्वादगिरस इतिहास: पुराणम्।' (वाजसनेयि ब्राह्मगोपनिषद् २ ।४।॥ १०)। ऋऋ्चय: सामानि छन्दांसि पुराणं यजुषा सह । उच्छिष्टाजज्ञिरे सर्वे दिवि देवा दिविश्रिता: ॥ _(अथर्ववेद ११५।७। २४) तमितिहासश्न पुराणं च गाथाश्न नाराशंसीश्वानुव्यचलन् (अथर्ववेद १५।६। ११) इतिहासस्य च ले स-पुराणस्थ च गाथानां च नाराशंसीनां
ज् प्रियू धाम भवति य एवं वेद॥ (अथर्व० १५।६। १२)
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्पृत्तम्। अनन्तरं चर वक्ल्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गता: ॥ (मत्त्यपुणण ५३ । ३) इतिहास पुराणं पशद्ञम॑ वेदानां वेदम् (न्यायदर्शन ४ । १। ६२) स्वाध्यायं श्रावयेत् पित्ये धर्मशासत्राणि चैव हि। आख्वानानीतिहासांश्व पुराणानि खिलानि च ॥ (मनु० ३। २३२) उपर्युक्त वेदपुराण-स्मृति-न्यायदर्शन आदि अन््धोंके अध्ययन करनेपर स्फीतालोकवर्ती घटके समान पुराणोंकी परम प्राचीनता स्फुटतम हो जाती है। 'ऋतच: सामानि उन्दांसि पुराणं यजुषा सह'--अथर्ववेदके इस मन्त्रमें 'पुराण' शब्द प्रथमा विभकत्यन्त और “यजुषा' तृतीयान्त होनेके कारण पुराणोंकी वेदापेक्षया प्रधानता स्पष्टरूपसे प्रमित होती है। सूतजी शिवमहापुराण वायबीयसंहिता पूर्वभागंके प्रथम अध्यायके श्लोक २७ से ३२में अष्टादश विद्याओंका वर्णन करते हुए कहते हैं-- अष्टादशानां विद्यानामेतासां भिन्नवर्त्मनाम् । आदिकर्ता कवि: साक्षाच्छूलपाणिरिति श्रुति: ॥ स॒हि सर्वजगन्नाथ: सिसृक्षुरखिलं जगत्। ब्रह्माणं विदधे साक्षात् पुत्रमग्रे सनातनम्॥ तस्मे प्रथमपुत्राय ब्रह्मणे विश्वयोनये । विद्याश्रेमा ददो पूर्व विश्वसृष्टयर्थमीश्वर: ॥ पालनाय हरिं देव रक्षाशक्ति ददौ ततः। मध्यम तनये विष्णुं पातारं ब्रह्मणोडषपि हि॥
२०
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोरशाणिको शुभा +
[पुराणकथधा-
लब्धविद्येन विधिना प्रज़ासृष्टिं वितन्बता । प्रथम सर्वशास्त्रार्णा पुराण ब्रह्मणा स्पृतम् ॥ अनन्तर तु वव्त्रेभ्यो वेदास्तस्थ विनिर्गताः । अवृत्तिः सर्वशारत्राणां तन्मुखादभवत् तत:ः ॥ भाव यह है कि--विभिन्न विषयोंका प्रतिपादन करनेवाली अष्टाद्श विद्याओंके मूल प्रणेता भगवान् शिव हैं यह श्रुति-सिद्धान्त है, विश्वसृष्टिकी इच्छासे भगवान् शिवने सर्वप्रथम ब्रह्माजीका सर्जन कर विश्वनिर्माणार्थ समस्त अ्रष्टादश विद्याओंको उन्हें दिया। समस्त विश्वके पालनार्थ गगवान् किष्णुको रक्षाशक्ति दिया। ब्रह्माजीने सृष्टिके पूर्व वेश्-विस्तारार्थ समस्त शाख््रोंके पूर्व ही पुराणोंका स्मरण कैया। पश्चात् ब्रह्माजीके मुखारविन्दसे अन्य शाश्ओोंका प्राविर्भाव हुआ। इस प्रकार शिवपुराणके आधारपर वेदाद्यपेक्षया पुराणोंके प्रकट्यमें प्राथम्य सुस्पष्ट ज्ञात होता है। 'अस्य महतो भूतस्य' त्यादि मनत्रके अनुसार मन्त्र-त्राह्मणात्मक वेद, इतिहास, रण महान् पुरुष परमेश्वरके निःश्वासरूप हैं। यहाँपर निःश्राप्तः शब्दसे दो अर्थ परिलक्षित होते हैं। प्रथम जिस कार प्राणियोंमें निःधास स्वाभाविंक रूपसे स्वतः निकलता हता है, उसी प्रकार परमेश्वरसे वेद-पुराणादि भी अनायास वाभाविक रूपसे निकलते हैं। द्वितीय निःश्वास शब्दसे वेद व पुराणोंकी नित्यता या सनातनता अभिव्यक्त होती है ) जीवित शरीरके यत्र दो प्रकारसे समुपलब्ध होते प्रथम स्वेच्छा-सेवक, द्वितीय परेच्छा-सेवक । हाथ-पाँव
आदि खेच्छासेवक हैं। कारण, हाथ-पाँव आदिके कार्य जीवेच्छाके अधीन हैं। द्वाथ जीवेच्छाके बिना नहीं हिल सकता, पैर जीवकी इच्छाके बिना नहीं चल सकते। जीव स्वेच्छासे हाथ-पाँव आदिसे कार्य कराता है, अतः हाथ-पाँव आदि खेच्छा-सेवक हैं ।
धासयन्त्र, पाक-यन्त्र आदि परेच्छा-सेवक है; क्योंकि जब जीव निद्राकी गोदमें रहता है, तब भी श्वास-प्रश्नास चलते रहते हैं। पाक-यन्त्र अपना कार्य करता रहता है, अतः श्वास आदि परेच्छा-सेवक हें |
श्रास आदि परेच्छा-सेवकोंके साथ जीवका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इनके बिगड़नेपर प्राणीका जीवन सड्डूटमय स्थितिमें पहुँच जाता है। कि बहुना, श्वास-क्रिया समाप्त होना ही जीवनका अन्त है। परंतु हाथ या पाँव आदिके नष्ट हो जानेपर भी प्राणी जीवित रहकर अपना कार्य विविध ढंगसे संचालित करता रहता है।
इसी प्रकार परमेश्वरका वेद एवं पुराणोंक साथ घनिष्ठ सम्बन्ध या नित्य-सम्बन्ध है; क्योंकि वेद-पुराण भगवानके निःश्वासरूप हैं। भगवान् अनादि-अनन्त हैं, अतः उनके मिःश्वासरूप बेद एवं पुराण भी अनादि-अनन्त हैं। यही बात 'अस्य महतो भूतस्थ निश्चसितम' इत्यादि मन्त्रके निःश्वास-शब्दसे ध्वनित होता है।
संक्षेपमें वेदरूपी सागरमें पुराण प्फुल्लित पड्ढूज हैँ पुराणपड्डूजमें रसब्रह्म मधु या पराग है--इस मधु-रसका पान पुण्यशाली विद्वज्जन करते हैं।
भगवानको प्रसन्न करनेवाले आठ भाव-पुष्य
अहिंसा प्रथम पुष्प पुष्यपिन्द्रियनिभ्रहः
शमः पुष्य॑ तपः पुष्पं ध्यान पुष्य न सप्तमम्। सर्व चैवाष्टमं
'अहिंसा' (किसी भी प्राणीका तन-मन इच्धिय-निय्रह' (इन्द्रियोंको मनमाने विषयोंमें न जाने उमझकर उसे दूर करनेके लिये चेष्टा) तीसरा सर्वोपयोगी ष्य सबसे बढ़कर है। 'शम' (मनका वशमें
ध्यान' (इश्देवके स्वरूपमें वित्तकी तदाकार-वृत्ति) सातवाँ पुष्प है और आठवाँ पुष्प 'सत्य है
। सर्वपुष्पं दया भूते पुष्य शान्तिर्विशिष्यते ॥
पुष्पमेतैस्तुष्यति केशव: ॥ (ऑग्निपुणण २०२ । १७-१८)
-बचनसे न बुरा चाहना, न करना, न समर्थन करना) प्रथम पु है। ने देना) दूसरा पुष्प है । 'प्राणिमात्रपर दया" (दूसरेके दुःखको अपना दुःख योगी पुष्प है ।'शात्ति' (किसी भी अव्स्थामें चित्तका क्षुव्ध न होना) चतुर्थ में रहना) पाँचवाँ पुष्प है। 'तप' (स्वधर्मके पालनार्थ कष्ट सहना) छठा पुष्प है।
ड़
। इन पुष्पींसे भगवान् केशव
+च्यक ह ध्क-्नी
पतुष्ट होते हैं।
अड्ढू]
* पुराणोंकी -महिमा *
२१९
फ्रक्रफफ्फफक्रफ फऋफ़फ ऋऋफ फक्रफ्रफफ फऋफ़रफ फफ फफऊऊ फफ्रफरफफफ्र फ्रफऋ फ्रमफफ फ्रफक्रफ फफफफरर फक्ककफकअ फ्रफ फ्रऋफफऊफ फ ऊकफ्ररऊ फकस फ पाफकक रा फीफा ना सा आफ रा यय्य्स्य्यय्य्य्य्य्स्स्श्क्््््् फफफफफ्रफफ्फ्फफ फ्फ कफ कफ ४५ कफ फ््फफ क्र फ फफफ फफ्रक फ़फ फ्रफ फफ ैरफफ फफ कफ फफ ऋ्फफफ्फऋ्फऋऔऋ$्फ्फ /ऋफ भा ऋ
पुराणोंकी महिमा
(अनन्तश्रीविभूषित तमिलनाडुक्षेत्रस्थ काज्लीकामकोटिपीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य वरिष्ठ स्वामी श्रीचन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वतीजी महाराज )
विधिप्रधान हैं चारों वेद। वेदोक्त विषयोंको ही मित्रोंके जैसे भाव प्रधानतया बताते हैं पुरण। ये अतीव प्राचीनतम इस देशके इतिहासके सारगर्भित भी हैं। अतएव प्राचीनतम भारतीय सनातनंधर्मका, उसकी उत्कृष्टतम संस्कृतिका भी अतिरुचिर स्वभावोक्ति वर्णन पाये जाते हैं इनमें | इनमें क्रुद्ध हुए ऋषि-मुनियोंके शाप-प्रतिशापके लेन-देनका भी वर्णन है ही। इन विषयोंको स्वरूपमात्रसे विचार करनेकी प्रवृत्ति छोड़कर फलसे ही इनका विचार करना उचित होगा । फल तो व्यक्ति तथा समुदाय दोनोंके ही भलाईके होते हैं । उदाहरणार्थ महाराज परीक्षित् एक दिन शिकार खेलने निकल पड़े । घने जंगलमें घूम-फिरकर थके-माँदे उन्हें अपनी प्यास बुझानेका कोई उपाय दीख न पड़ा। वहाँ ध्यानमें मग्न थे एक मुनिवर | उनसे बहुत. प्रकारसे पूछताछ की | सब व्यर्थ निकले । विषण्ण होकर लोटते उन्हें एक मरा साँप दीख पड़ा | उसे उस ऋषिवरके गलेमें माला पहनानेके लिये उनके मनमें तीव्र उत्कण्ठा उठी | सत्कुल-प्रसूत होनेपर भी वे उसे दबा न सके | अतः अपनी इच्छा पूरी करके लौट पड़े। थोड़ी देरके बाद ऋषिका पुत्र वहाँ आया और उस दृश्यको देखकर क्रुद्ध हो उठा तथा शाप दिया कि 'जिस अधमका यह कुकृत्य है, उसकी मृत्यु आजसे सातवें दिन सर्प-दंशसे ही हो जाय ।' महाराज परीक्षित॒को शापकी बातका पता चला। अपने
पुराणेष्यर्थवादत्वं ये
तैरजितानि पुण्यानि क्षय. _यान्ति द्विजोत्तमा:
कुकृत्यका दण्ड भोगनेके लिये वे तैयार हो गये। अपनी मृत्युका निश्चित समय समझकर संतुष्ट हुए। उन्होंने मुनिवर श्रीशुकंकी वाणीसे श्रीमद्धागवत' सुनते-सुनते प्राणत्याग किया और मुक्ति पायी। उन्हें मिली मुक्ति और समुदायको मिला पुराणरत्न श्रीमद्भागवत, जिससे आज भी श्रीकृष्ण-भक्तिका समृद्ध स्रोत बढ़ा रहता है।
और एक हैं ये चक्रवर्ती महाराज दशरथ | एक दिन ये शिकार करने निकल पड़े। थके-माँदे एक तालाबके किनारे एक पेड़के नीचे आराम कर रहे थे। गड़-गड़की ध्वनि सुनकर
पानी पीते हाथीपर शब्दवेधी बाण चलाये | फिर क्या ? 'हाय मरा' की मानव-वाणी सुन पड़ी । चकित होकर वे दौड़ पड़े और जान लिये कि अंधे तथा बूढ़े अपने माता-पिताकी प्यास बुझानेवाला युवक है मरता। मृत युवकको लेकर बूढ़ोंके पास पहुँचे और शाप पाया कि. 'हमारे-जैसे तुम्हें भी अपने पुत्रके वियोगसे मृत्युं हो जाय |” फलस्वरूप चक्रवर्तीको संतान-लाभ हुआ एवं समुदायको इतिहास-रत्म
श्रीमद्वाल्मीकिरामायण मिला । अतः पुराणोंका तत्त्वार्थ समझनेकी प्रवृत्ति अपनायें
हमारी संस्कृतिका सच्चा स्वरूप पहचान लें एल उन्नत जीवन बिताने लगें। न्
वदन्ति नराधमा:ः
अन्यानि साधयन्त्येव कार्याण विधिना नरा: ॥ पुराणानि ह्विजश्रेष्ठि। साधयन्ति न मोहिता: ।. अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह. द्विजोत्तमा: ॥ श्रोतत्यानि पुराणानि त्तेन. वे भक्तिभावत: ।
(नारद्र० १॥१। ५७-६१)
(सूतजीने ऋषियोंसे कहा--) 'द्विजवरो | जो नराधम पुराणोंमें अर्थवाद (अतिरज्लित कथन) की शक्ढ्ा करते हैं, उनके किये हुए समस्त पुण्य नष्ट हो जाते हैं। मोहगस्त मानव दूसरे-दूसरे कार्योके साधनमें लगे रहते हैं, परंतु पुराण श्रवणरूप पुण्यकर्मका अनुष्ठान नहीं करते हैं। जो मनुष्य बिना किसी परिश्रमके यहाँ अनन्त पुण्य प्राप्त करना चाहता हो उसको
भक्तिभावसे निश्चय ही पुराणोंका श्रवण करना चाहिये ।
२२ * सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा * [पुराणकथा-
फ क्रशफक फ्पा शक क्रम औी कक हि हि
सभी कथाओंका तात्पर्य--भगवत्प्राप्ति
(अनन्तश्रीविभूषित श्रीमद्विष्णुस्वामिमतानुयायी श्रीगोपालवैष्णवपीठाचार्यवर्य श्री १०८ श्रीविदठलेशजी महाराज) भगवानकी आज्ञारूप वेदोंमें जन-कल्याणार्थ सभी था--'पुराणं मनसाउस्मरत् ।' जैसे वेद कर्म-शन-उपासना-- साधनोंका विधान बिहित है तथा श्रीहर्की महिमाका गुणणान इन भेदोंसे त्रिकाण्ड-विषयक होकर भी ब्रह्मात्म-विषयक हैं, है। उन वेदोंके दुरूह एवं परोक्षवादी होनेके कारण सभीको वैसे सभी पौराणिकी कथाओंका तात्पर्य भगवल्माप्ति उनका ज्ञान होना असम्भव है । इसलिये दयालु भगवानने वेद- ही है। जैसे सभी नदियाँ बहती हुईं अन्तमें समुद्रमें लीन -नस-रूपसे अवतीर्ण होकर अठारह पुराणोंद्वार वेदोंका हो जाती हैं, वैसे ही सभी वचनोंका पर्यबसान परमात्मामें ही
बृंहण किया है। सभी शाख्रोंमें पुरणोंकी प्राथमिकता मानी वी है--'पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम्।' दह विद्याओंकी गणनामें पुराणका प्रथम स्थान है, जिसमें भी मानवोंके आचरणीय धर्मोका प्रतिपादन किया गया है-- पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राड्डमिश्रित: । वेदा: स्थानानि विद्यानां धर्मस्थ चर चतुर्दश | पुराण पाँचवाँ वेद है। यह डान्दोग्योपनिषद् एवं [मदभागवतमें स्पष्टतया वर्णित है-- 'इतिहासपुराणं च पह्कमं बेदानां वेदम् । '(छान््दो०)। 'इतिहासपुराणं चर पश्चमो वेद उच्यते ॥' (श्रीमद्भा० १ ४ | २०) धर्माचरणमें पुराणोंको भी प्रामाणिक मानना चाहिये । यद्यपि एणोंमें मनु आदि स्मृतियोंकी तरह आनुपूर्वक धर्मोका निरूपण हीं किया गया है तथापि उनमें सर्वत्र प्रसज्ञोमें जहाँ-तहाँ णश्रम-धर्मोका भलीप्रकारसे निरूपण हुआ है। जो धर्म परतियॉमें संक्षेपसे कथित हैं, उन््हींका पुराणोंमें दृष्टान्तरूप अनेक *थाओंद्वारा विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है । अतः स्मृतियोंके मान पुराणोंको भी उपयोगी होनेसे धर्म-विषयमें प्रमाण मानना गग्यहै। साथ ही यह भी सिद्ध होता है कि पुराण-विद्या सनातनी है, (योंकि कल्पादिमें ब्रह्माजीने पुरणका मनसे स्मरण किया
होता है । इसलिये वेदोंके उपबुंहक पौंरणिक वर्णन परमात्मपरक होनेसे प्रामाणिक माने गये हैं। पुराणोंमें सर्ग-विसर्गादि पाँच लक्षण, व्रवोपवास, तीर्थ, उपासना, योग-यज्ञादिका समास- व्यास-रूपसे वर्णन किया गया है। ये सभी साधन अन्तःकरणकी शुद्धिद्ार भगवत्य्राप्तिमें सहायक सिद्ध होते हैं । जहाँ-जहाँ भूगोल-खगोल चौदह लोकोंका वर्णन है वहसब भगवानूके स्थूल स्वरूपका ही वर्णन है । बिना स्थूल स्वरूपके जाने सूक्ष्मस्वरूपका ज्ञान असम्भव है । यही विषय पुाणोंमें यत्र-तत्र-सर्वत्र वर्णित है । ब्रह्माण्ड-वर्णनमें सभी क थाओंका--कहीं दृष्टान्त-रूपमें तो कहीं उदाहरण-रूपमें समावेश है । अतः भगवन्महिमाका वर्णन-श्रवण करनेसे भगवत्कृपाद्वारा भगवत्माप्ति अवश्य होती है । भगवान् परम दयालु हैं, जिन्होंने जीवोंके कल्याणार्थ श्रवण-कीर्तन-स्मरण करनेयोग्य बहुत-सी अदभुत लीलाएँकी हैं । जिनके सेवन करनेसे साँसारिक दुःख, शोक-अज्ञानका नाश होता है; क्योंकि सर्वत्र पुराणोमें भक्तार्तिहास्क श्रीहरिका ही वर्णन मिलता है। कहीं आवेशाबतार, कहीं अंशावतार, कहीं कलावतार, कहीं पूर्णावतारका वर्णन है। ये सभी अवतार दुष्ट-निम्रह और शिष्ट-अनुग्रहके लिये हैं। बिना असाधुके दमन किये साधुका कल्याण होना असम्भव है । एतदर्थ भगवान् देव, ऋषि, मनुष्य, जलचर आदियें प्रकट होकर जगतका पालन-निर्वाहादि करते हैं। उन्हींके गुण, विभूति, नाम, रूपोंके प्रतिपादक पुराण हैं। अतः उनमें वर्णित सभी कथाओंका तात्पर्य भगवत्प्राप्ति ही है ।
नमन
अहँ हरि: सर्वमिदं जनार्दनो नान्यत्तत्तः कारणक्ाार्यजातम् ।
ईदूडमनी यस्य न . तस्व भूयो भवोद्धवा
'मैं तथा यह सम्पूर्ण जगत् जनार्दन श्रीहरि ही हैं; उनसे भिन्न >द्वेषादि इन्द्ररूप रोगकी प्राप्ति नहीं होती !'
सी भावना है उसे फिर देहजन्य राग
इन्द्रददा भवन्ति ॥ (विष्णु १।२२।८७) ह न्न और कुछ भी कार्य-कारणादि नहीं हैं'--जिसके चित्तमं
अछ्डू ]
* शास्त्रप्रतिपादित पुराण-माहात्म्य «
फेम
फ्रफक्रफफफमजसफफफफ फफफफकफ फ कफ फफ फफ्कफफ फ फ फए््फफ कफ फ्रूफ फफ फऊ क्रफफ्र कफ फक फफफ ऊफ्फ फफफ्फ्रफफ कक कफ फ कफ ५ हुक फफ कफ फ़ऊ कफ फ्आ हक पा पा करत हज जे के पा
शास्त्रप्रतिपादित घुराण-माहाल्य
(ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्द॒का)
हमारे शास्त्रोंमें पुराणोंकी बड़ी महिमा है। उन्हें साक्षात् श्रीहरिका रूप बताया गया है। जिस प्रकार सम्पूर्ण जगतको आलोकित करनेके लिये भगवान् सूर्यरूपमें प्रकट होकर हमारे बाहरी अन्धकारको नष्ट करते हैं, उसी प्रकार हमारे हृदयान्धकार--भीतरी अन्धकारको दूर करनेके लिये श्रीहरि ही पुराण-विग्रह धारण करते हैं।' जिस प्रकार त्रैवर्णिकोंके लिये वेदोंका स्वाध्याय नित्य करनेकी विधि है, उसी प्रकार पुराणोंका श्रवण भी सबको नित्य करना चाहिये--'पुराणं शृणुयात्रित्यम' पुराणोंमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष--चारोंका बहुत ही सुन्दर निरूपण हुआ है और चारोंका एक-दूसरेके साथ क्या सम्बन्ध है, इसे भी भलीभाँति समझाया गया है। श्रीमद्धागवतमें लिखा है-- धर्मस्य ह्यापवर्ग्यस्थनार्थोडर्थायोपकल्पते । नार्थस्य धर्मैकान्तस्थ कामो लाभाय हि स्मृतः ॥ कामस्य नेन्द्रियप्रीतिलाभो जीवेत यावता। जीवस्य तत्त्वजिज्ञासा नार्थों यश्वेह कर्मभि: ॥ (१।२।९-१०) 'धर्मका फल है संसारके बन्धनोंसे मुक्ति अथवा श्रीभगवानकी प्राप्ति। धर्मसे यदि किसीने कुछ सांसारिक सम्पत्ति उपार्जन कर ली तो इसमें उस धर्मकी कोई सफलता नहीं है। इसी प्रकार धनका एकमात्र फल है धर्मका अनुष्ठान, वह न करके यदि किसीने धर्मसे कुछ भोगकी सामग्रियाँ एकत्र कर लीं तो यह कोई सच्चे लाभकी बात नहीं हुई | शास्त्रोने कामको भी पुरुषार्थ माना है। पर उस पुरुषार्थका अर्थ इन्द्रियोंकी तृप्त करना नहीं है। जितने सोने-खाने आदिसे हमारा जीवन-निर्वाह हो जाय, उतना आराम ही यहाँ “काम! पुरुषार्थसे अभिप्रेत है तथा जीवननिर्वाहका--जीवित रहनेका भी फल यह नहीं है कि अनेक प्रकारके कमेके पचड़ेमें
१. चथा. सूर्यबपुर्भूला प्रकाशाब चरेडरसि। स्वेष.. जगतायेव... सता. ज"77---+. यथा सूर्यवपुर्भूवा प्रकाशाय ररेद्धरिः। सर्वेषां तथेवान्तःप्रकाशाय. पुराणावयवो २. कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य तदा व्रिभुः ॥ व्यासरूपस्तदा ब्रह्मा संगहार्थ युगे युगे। चतुर्लक्षप्रमाणेन
घु० कक 0 अं ०0 २ ८
जगतामेव हरि: । विचरेदिह भूतेषु॒ पुराण
द्वापरे तदाष्टादशधा कृत्वा भूलोके5स्मिन् प्रकाशितम्। अद्यापि देवलोकेषु
पड़कर इस लोक या परलोकका सांसारिक सुख फ्रान छिया जाय | उसका परम लाभ तो यह है कि वास्तविक तत्त्वकी--- भगवत्तत्तको जाननेकी शुद्ध इच्छा हो।' वस्तुतः झा साधनोंका फल है भगवानकी प्रसन्नताको प्राप्त करमा। और वह भगवत्यीति भी पुराणोंके श्रवणसे सहजमें हो प्राप्त की जा सकती है। “पद्मपुराण'में कहा गया है--
तस्माद्यदि हरे: प्रीतेरुत्पादे धीयते मति:।
श्रोतव्यमनिर्श पुम्मि: पुराणं कृष्णरूपिण:। ।
(पद्म०, स्वर्ग ६११६३)
'इसलिये यदि भगवानको प्रसन्न करनेका मममें संकल्प हो तो सभी मनुष्योंको निरन्तर श्रीकृष्णके अड्भगभूत पुराणोंका श्रवण करना चाहिये |! इसीलिये पुराणोंका हमारे यहाँ चहुत आदर है। हे
वेदोंकी भाँति पुराण भी हमारे यहाँ अनादि माने गये हैं और उनका रचयिता कोई नहीं है। सृष्टिकर्ता
| ब्रह्माजी भी उनका स्मरण ही करते हैं। इसी दृष्टिसे कंहा गया है- 'पुराणं सर्वशारत्राणां प्रथम तब्रह्मणा स्वृतम ।! इनका विस्तार सौ
करोड़ (एक अरब) श्लोकॉका माना गया है--'झत- कोटिश्रविस्तरम् । उसी प्रसज्ञमें यह भी कहा गया है कि समयके परिवर्तनसे जब मनुष्यकी आयु कम हो जाती है और इतने बड़े पुरोणोंका श्रवण और पठन एक जीवनमें मनुष्योके लिये असम्भव हो जाता है, तब उनका संक्षेप करनेके लिये स्वयं भगवान् प्रत्येक द्वापरयुगमें व्यासरूपमें अतवतीर्ण होते है और उन्हें अठारह भागोंमें बाँठकर चार लाख श्लोकोमें सीमित कर देते हैं। पुराणोंका यह संक्षिप्त संस्करण ही भूलोकमें प्रकाशित होता है। कहते हैं स्वर्गादि लोकोंमें आज भी एक अरब श्लोकोंका विस्तृत पुराण विद्यमान है?। इस प्रव
भगवान् वेदव्यास भी पुराणोंके रचयिता नहीं, अपितु वे उसके
हरिरालोकहेतवे ॥ ; पावन परम्॥ (पदम०, स्वर्ग० ६१९ । ६२ -६२) द्वापे. जगौ॥
शतकोटियप्रविस्तरम् ॥ (पदम०, सृष्टि” १। ण०-पर)
र्ढ
करके म#क पक भ 04क कफ कक पक कक फ कर मक्का 4 कक कप 5१
+ सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा « . [पुराणकथा
संक्षेपक अथवा संग्राहक ही सिद्ध होते हैं| इसीलियें पुराणोंको 'पञ्मम वेद' कहा गया है | 'इतिहासपुराणं पञ्मम॑ वेदानां वेदम्। ' (छान्दोग्य-उपनिषद् ७। ११२) उपर्युक्त उपनिषद्वाक्यके अनुसार यद्यपि इतिहास-पुराण दोनोंको ही 'पद्ठम बेद' की गौरबपूर्ण उपाधि दी गयी है, फिर भी वाल्मीकीय रामायण और महाभारत जिनकी इतिहास संज्ञा है, क्रमशः महर्षि वाल्मीकि तथा बेदव्यासद्वारा प्रणीत होनेके कारण पुणाणोंकी अपेक्षा अर्वाचीन ही हैं। इस प्रकार पुराणोंकी पुरणता सवपिक्षया प्राचीनता सुतरां सिद्ध हो जाती है। इसीलिये वेदोंके बाद पुराणोंका ही हमारे यहाँ सबसे अधिक सम्मान है। बल्कि कहीं-कहीं तो उन्हें वेदोंसे भी अधिक गौरव दिया गया है। पद्मपुराणमें लिखा है! यो विद्याच्यतुरों देदान् साज्लोपनिषदों द्विजः । पुराणं च विजानाति यः स तस्मादिचक्षण: ॥ (सृष्टिग २ । ५१) 'जो ब्राह्मण अज्ों एवं उपनिषदोसहित चारों वेदोंका ज्ञान रखता है, उससे भी बड़ा विद्वान् वह है, जो पुराणोंका विशेष ज्ञात है।' यहाँ श्रद्धालुओंके मनमें स्वाभाविक ही यह शब्ढ्ा हो सकती है कि उपर्युक्त श्लोकमें वेदोंकी अपेक्षा भी पुराणेकि ज्ञनको श्रेष्ठ क्यों बतलाया है। इस शक्कञाका दो अ्रकारसे
समाधान किया जा सकता है। पहली बात तो यह है £ उपर्युक्त श्लोकके 'विद्यात' और 'विजानाति'--इन ८ क्रिया-पदोंपर विचार करनेसे यह श्ल निर्मूल हो जाती है बात यह है कि ऊपरके बचनमें वेदोंके सामान्य ज्ञानकी अपेक्ष पुएणोंके विशिश ज्ञानका वेशिष्टय बताया गया है, न वि वेदोंके सामान्य ज्ञाककी अपेक्षा पुराणोंके सामान्य ज्ञानक अथवा वेदोंके विशिष्ट ज्ञानकी अपेक्षा पुरणोंके विशि ज्ञनका। पुराणोंमें . जो कुछ है, वह वेदोंका ही ते विस्तार--विशदीकरण है। ऐसी दशामें पुरणोंका विशिष्ट ज्ञान वेदोंका ही विशिष्ट ज्ञान है और बेदोंका विशिष्ट ज्ञान वेदोंके सामान्य ज्ञनसे ऊँचा होना ही चाहिये | दूसरी बात यह है कि जो बात बेदोमें सूतरूपसे कही गयी है, वही पुराणोंमें विस्तारसे वर्णित है! उदाहरणके लिये परम तत्तवके निर्गुण-निराकार रूपका तो-वेदों (उपनिषदों) में विशद वर्णन मिलता है, परंतु सगुण-साकार तत्वका बहुत ही संक्षेपमें कहीं-कहीं वर्णन मिलता है। ऐसी दशामें जहाँ पुराणोंके विशेष ज्ञाताको सगूण-निर्गुण दोनों तत्वोंका विशिष्ट ज्ञान होगा, वेदोंके सामान्य ज्ञाताको केवल निर्मुण-निरकारका ही सामान्य ज्ञान होगा। इस प्रकार उपर्युक्त श्लोकोंकी संगति भलीभांति बैठ जाती है और पुराणोंकी जो महिमा शाखोमें वर्णित है, वह अच्छी तरह समझमें आ जाती है।
पुराणोंका क्रम और सृष्टिविद्याका निरूपण
(महामहोपाध्याय स्व” पप० श्रीगिरिधरजी शर्मा अतुर्वेदी )
ः पुगण-विद्या महर्षियोंका सर्वस्त है। यह वह अटूट खजाना है, जिसके प्रभावसे अनेक ग्रकारकी दरिद्रताओंका शिकार बनकर भी भारत आज धनी है, आज भी संसारकी सभ्य जातियोंके समक्ष यह अपना मस्तक ऊँचा रख सकता है। बीसवीं शताब्दी विज्ञानका मध्याह कही जाती है, किंतु जितने विज्ञान आजतक उच्च भूमिकापर पहुँच चुके हैं, जितने अभी अधूरे हैं तथा जो अभी गर्भमें ही हैं, उनमेंसे एक भी ऐसा नहीं है, जिसके सम्बन्धमें पुणणोमें कोई भी उल्लेख न मिलता हो! जितने भी सामाजिक और राजनीतिक वाद इस समय भूमष्डलमें प्रसिद्ध हैं, उनमेंसे भी किसीका संक्षेपसे, किसीका विस्तार्से, किसीका पूर्वपक्षरूपसे और किंसीका
निन््दारूपसे--इस तरह किसी-न-किसी प्रकारसे पुणणोंमें अवश्य उल्लेख मिलेगा। आजसे हजाएं वर्ष पूर्व इन सब बातोंका हमारे पूर्वजोंको ज्ञान था, वे इन सबकी आलोचना कर सकते थे, प्रत्यक्षदशीकी तरह सन बातोंपर अपनी शय दे सकते थे। पुराण-विद्याके समान कौन-सी विद्या संसाएकी किसी जातिके पास है? इस प्रकारकी विद्याको अपने 'कीष'में रखकर हिंदू-जाति गौखबाच्ित है।
पुराण अठारह हैं--यहे प्रसिद्ध बात है। वस्तुतः ये अठारह स्वतन्र पुराण नहीं, किंतु एक ही पुराणके अठारह प्रकरण हैं। जैसे एक ग्न्यमें कई अध्याय होते है, वैसे ही एक पुगणके ये अठारह अध्याय है। यही कारण है कि उनका क्रम
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# पुराणोंका क्रम ओर सृष्टिविद्याका निरूपण +
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नियत है। स्वतन्त्र ग्रन्थोंमें कोई नियत क्रम नहीं रहता, वक्ताकी इच्छा है कि उन्हें अपने व्याख्यान या लेखमें किसी भी क्रमसे आगे-पीछे रख दे, किंतु पुराणोंमें ऐसा नहीं हो सकता, उनका एक नियत क्रम है। सप्तम पुराण कहनेसे 'मार्कण्डेयपुराण'का ही बोध होगा, त्रयोदश पुराण कहनेसे 'स्कन्दपुराण' ही समझा जायगा। “गरुडपुराण' सत्रहवाँ पुराण "ही. कहलायेगा-- इत्यादि | इस संख्यामें कभी फेर-बदल नहीं हो सकता | एक गन्थके अध्यायोंमें उलट-फेर कौन कर सकता है । उलट-फेर कर दिया जाय तो सब अन्थका स्वारस्थ ही बिगड़ जाय। इसलिये पुराण सर्वदा निम्नलिखित क्रमसे ही समझे जाते हैं--१-ब्राह्म, २-पाद्य, ३-वैष्णब, ४-वायव्य (शैव), भागवत, ६-नारद, ७-मार्कण्डेय, ८-आग्नेय, ९-भविष्य, १०-ब्रह्मवैवर्त, ११-लैड़, १२-वाराह, १३-स्कान्द, १४- वामन, १५-कोर्म, १६-मात्स्य, १७-गारुड और १८-न्रह्माप्ड । स्थूल दृष्टिसे भी देखते ही प्रत्येक भावुकको यह चमत्कार प्रतीत होगा कि इस विद्याका आरम्भ ब्रह्मसे ओर समाप्ति ब्रह्माण्डपर है तथा मध्यमें भी 'ब्रह्मवैवर्त' में ब्रह्मकी स्मृति करा दी जाती है। इसीसे स्पष्ट हो गया कि यह 'सृष्टिविद्या' है, जो ब्रह्मसे आरम्भकर 'ब्रह्माण्ड'तक हमारे ज्ञानको पहुँचा देती है और आदि, मध्य एवं अन्तमें ब्रह्मका कीर्तन करती हुई ब्रह्मपरसे ज्ञानीको विचलित नहीं होने देती । यद्यपि-- सर्गश्च॑ प्रतिसर्गश्ष बंशो मन्वन्तराणि च। बंशानुचरितं॑ चैव पुराणं पद्चललक्षणम् ॥ “इस लक्षणके अनुसार पुराणमें पाँच विषयोंका निरूपण प्रधान है, किंतु विचारदृष्टिसे प्रतीत होगा कि सृष्टिविद्या' ही पुराणका मुख्य विषय है, शेष चार उसके 'उपोदघात' हैं। सृष्टिका निरूपण उन चारोंके बिना साड्रोपाड़ः नहीं बनता, इसलिये उन चारोंको साथ लेना पड़ता है, किंतु पुराणका मुख्य प्रतिपाद्य सृष्टिविद्या ही है। सृष्टिका क्रम पुराणोंमें संक्षेपतः इस प्रकार बताया -गया है-- क्षीरसमुद्रमें शेषशय्यापर भगवान् नारायण सो रहे हैं, जगज्जननी लक्ष्मी उनके पैर दबा रही हैं, भगवान् नारद पास खड़े स्तुति कर रहे हैं। उन्हें जब सृष्टि रचनेकी इच्छा होती है, तब उनकी नाभिसे एक पद्म! (कमल) निकलता है, उस कमलमेंसे चतुर्मुख ब्रह्मा प्रादुर्भूत होते हैं, वे ब्रह्मा स्थावर-जज्ञमात्मक सब विश्वको
बनाते हैं।' इस चित्र (नक्शे)को ध्यानमें रखिये ओर अब पूर्वोक्त पुराणोंके क्रमपर चलिये | कार्यसे कारणकी ओर जाना है, स्थूलसे सूक्ष्ममें प्रवेश करना है। स्थावर-जड्गमात्मक दृश्य-जगत्के निर्माता त्रह्माके तत्तको पहला 'व्राह्मपुराण' समझाता है। ब्रह्मा जहाँसे प्रकट हुए, उस पद्म (कमल) का निरूपण दूसरे “पाद्मपुराण'में हुआ है। पद्मके उद्धवस्थान भगवान् विष्णुको तीसरे वैष्णवपुराणने समझाया है और उनके आधार (शयनस्थान) “शेष' का वायुपुराणमें निरूपण किया गया है। इसी वायुपुराणको कहीं 'शिवपुराण' नामसे भी लिखा है, तात्तिक दृष्टिसे इन नामोंमें कोई भेद नहीं है--यह तत्त्व- निरूपणसे स्पष्ट हो सकता है। इस शेपक भी आधार 'सरस्वान् (क्षीरसागर) को पाँचवाँ “भागवत' समझाता है अतएब उसे 'सारस्वतकल्प' कहते हैं--.'सरस्वत इूददे सारस्वतम ।” अब रह गये 'नारद भगवान”, उनका निरूपण छठा नारदपुराण कर देता है । यों पूर्वपट्क (पहले छः पुराणों) में यह सृष्टिका पुराणोक्त चित्र---एक-एक करके विशदरूपसे समझा दिया जाता है ।
श्रद्धावान् उत्तमाधिकारियोंके लिये यह वर्णन संतोपप्रद हो जाता 'है। वे इन सबको भगवद्विभूति समझकर तर्क- वितर्कसे परे रहते हुए सर्वाधिष्ठाता भगवानके भजनमें समय-यापन करते रहते हैं, किंतु जो मध्यमाधिकारी तर्कके बिना संतुष्ट नहीं होते, जिनके चित्तमें शट्जा[ओंका आन्दोलन चलता रहता है कि "एक छोटे-से कमलके पुष्पपर बैठकर ब्रह्मा इतने विस्तृत ब्रह्माण्डको कैसे बनाता है, कमलके पुष्पमेंसे चार मुखका मनुष्याकारधारी ब्रह्मा कैसे निकल पड़ा ?' आदि, उनके संतोषार्थ पद्मपुराणने विशेष ग्रयत्र किया है। इस. पुराणमें यह स्पष्ट अक्षरोंमें बताया गया है कि इस पृथ्वीकी ही पद्म कहते हैं। देखिये पद्मपुराण, सृष्टिखण्ड, अध्याय ४०--
तच्च पद पुरा भूतं पृथिवीरूपमुत्तमम् ।
यत्पद्य॑ सा रसा देवी पृथिवरी परिचक्ष्यते ॥
'विष्णुभगवान्की नाभिसे जो कमल पहले उत्पन्न हुआ, वह पृथ्वीरूप था। उस पद्मको ही रसा अथवा पृथ्वी देवी कहा जाता है' आदि। इतना ही नहीं, इसके पत्र-केसरादिरूपसे भिन्न-भिन्न वर्षादिका भी वहाँ निरूपण किया गया है।
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* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा «
प्ुराणकथा-
जब यह निश्चय हो गया कि यह पृथ्वी पद्म है, तब अब समझनेमें देर न लगेगी कि इस पृथ्वीपर अभिव्याप्त आग्नेय प्राण ही ब्रह्मा है, जो 'चतुर्मुख' (चारों ओर फैलता हुआ) अन्तरिक्षके चन्रमण्डलस्थ सौम्यप्राणसे मिलकर सब प्रकारकी सृष्टि करता रहता है--'अग्नीषोमात्मक जगत्।” और यह भी शीघ्र ही समझमें आ जायगा कि जिनकी नाभिसे यह पृथ्वीरूप कमल निकला है, वे विष्णुभगवान् प्रत्यक्ष देव 'सुर्यनारायण' ही हैं। वैज्ञानिक भाषामें 'नाभि' केद्रको कहते हैं, 'सूर्यमण्डलके केन्द्रसे ही यह पृथ्वी प्रादुर्भूत होकर उस मण्डलसे पृथक् हो गयी हैः--यह विज्ञान इस वर्णनसे प्रस्फुट हो जाता है। पुराणका रहस्य यहाँ पूरा नहीं हो जाता, इससे भी गम्भीरतम विज्ञान इस वर्णनमें निगूढ है कि जितने भी (सूर्य, चन्द्र, तारा, पृथ्वी आदि) मण्डल बनते हैं, वे पद्मरूप (गोलाकार) हैं और वे सब विष्णुकी नाभिसे ही निकलते हैं। व्यज्ञो बै विष्णु:'--विष्णुभगवान् यज्ञरूप हैं और आदान-प्रदानरूष यज्ञके बिना किसी भी मण्डलकी उत्पत्ति हो नहीं सकती । द्वादश आदित्योंमें अन्तिम आदित्यका नाम विष्णु है--यह वेद, पुराण आदिमें सर्वत्र ही स्फुट है, अतः विष्णुनामसे सूर्यके अहणमें कोई श्ढा नहीं होनी चाहिये। यहाँतक यह हमारी 'ब्रिलोकी' हुई--पृथ्वी, अन्तरिक्ष और झु (सूर्यमण्डल) अथवा दूसरे शब्दोंमें भू, भुवः, खः। अब सूर्यमण्डलके आगेका जो अन्तरिक्षण- महः है, वह वायुप्रधान होनेके कारण विष्णुक्ता शयनस्थान “शेषशय्या' है। हमारे अन्तरिक्षकी (सूर्यमण्डलसे नीचेकी) वायु उपद्रावक भी है, किंतु यह दूसरे अन्तरिक्ष 'महः' लोककी वायु विशुद्ध कल्याणप्रद है, इसलिये इसे 'शिव' कहते हैं। अतएव इसके निरूपक पुराणके 'वायुपुराण' या शिवपुराण' दोनों नाम प्रसिद्ध हैं और इन्हें वायुभक्षी सर्पोके ईश्वर शेषके रूपमें पौराणिक नक्शेमें बताया गया है। वह भी जिसके आधारपर प्रतिष्ठित है, वह सोमप्रधान ' आपोमण्डल' क्षीरसमुद्र, परमेष्ठिमण्डल या जन: है और उसके समीप प्रतिष्ठित खयम्भूमण्डल 'तपः' और नारद 'सत्यम् हैं। जनलोक या परमेष्ठिमप्डल 'आपोमय' है, इसी कारण वेंहेँ क्षीरसमुद्र कहलाया है, ये 'अप' नरके पुत्र होनेके कारण 'नार' कहे गये हैं, 'नाए' को देनेवाला नारद! है--'नाएँ ददातीति नारद: ।
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इसलिये अपतत्तके उत्पादक स्वकभू भूमण्डलको नारद कहना युक्तियुक्त है। यह सब सुष्टिका वर्णन मनुस्पृति प्रथमाध्यायके
आरस्म्भमें इसी रूपमें-मिलता है--- ततः . स्वयम्भूर्भपवानव्यक्तो. व्यब्जयन्निदम् महाभूतादिवृत्तोजा: ' प्रादुरासीत्तमोनुदः ॥
सो5भिध्याय शरीरात् स्वात्सिसक्षुिविधा: प्रजा: ।
अप एब ससर्जादा तासु बीजमवासृजत् ॥
तदण्डमभवद्धैमं सहस्लांशुसमप्रभम् ।
तस्मिजअजज्ले . स्वयं ब्रह्म सर्वलोकपितामहः ॥
आपो नारा इईंति श्रोक्ता आपो वे नरसूनवः।
ता यदस्थायन पूर्व तेन नारायणः स्मृतः ॥
भर >८ भर
तस्मिनण्डे से भगवानुषित्ता परिवत्सरम् ।
स्वयमेवात्मनो. ध्यानात्तदण्डमकरोद्.. द्विधा ॥
ताभ्यां स शकलाश्यां च॒ दिव॑ भूमिं चर निम्ममे।
मध्ये व्योम दिशश्वाप्टावरपां स्थाने चर शाश्वतम् ॥ संक्षेपमें इस सबका तात्पर्य यही है कि सृष्टिक आरम्भमें सबसे पूर्व 'खयगःभू' ्रादुर्भूत हुआ, उसने प्रजासृष्टिकी इच्छासे सबसे पहले अपने शरीरसे अप् (आपोमय पस्मेष्ठिमण्डल) को उत्पन्न किया (इसे ही पौराणिक चित्रमें क्षीर्समुद्र कहा गया है।) और उसमें भावी सृष्टिका बीज रखा। वह बीज सुवर्णका अप्डा बना, उसके हजार किरणें थीं ओर सब किरणोंमें समान कान्ति थी। (इसे ब्रह्माण्डगोलक या त्रिलोकमण्डल समझना चाहिये।) उसके मध्यमें सर्वलोक- पितामह त्ह्म प्रादुर्भूत हुए। (स्मरण रहे कि पद्मयज नह्मा सं लोकोके पिता हैं, किंतु ये ब्रह्मा उनके भी उत्पादक हैँ इसलिये इन्हें (सूर्यरूप अद्याको) पित्तामह कहा गया है ।) आगे इन ब्रह्माका ही माम---'नायायण' बताया गया है और 'नारायण' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की गयी है कि नर (स्वयम्भू) के पुत्र अप् 'नार' हैं, उस नार (आपोमयमण्डल) में रहनेके कारण ये पितामह ब्रह्मा नारायण हैं। (इस सब बर्णमपर सूक्ष्म दृष्टिपात कर लेनेके अनन्तर इस विपयमें कोई संदेह नहीं रा सकता कि पूर्वोक्त पौगणिक चित्रमें जिन्हे क्षीर-समुद्रशायी विष्णु कहा गया है, वे ही मनुस्पृतिमें 'पितामह' ब्रह्मा कईलीय
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हैं।) 'नारायण' नाम दोनों जगह समान हैं। मनुभगवानने स्वयम्भूसे आरम्भ किया है, स्वयम्भूका ब्रह्मा नाम लोकप्रसिद्ध है और आगे-आगेके मण्डलोंमें जितनी शक्तियाँ उत्पन्न होती हैं, वे आदिके मण्डलकी शक्तिसे भिन्न नहीं हैं। अथवा यों कहिये कि आदित्यमण्डलका जो अभिमानी देव है, वही भिन्न-भिन्न नाम-रूपोंसे आगे उत्पन्न होनेवाले मण्डलॉंका भी अभिमानी है। वह उनमें भेददृष्टि सर्वथा नहीं करता। इसी अद्वैततत्ततके निर्वाहके लिये भगवान् मनुने “ब्रह्मा” नाम ही सर्वत्र रख दिया है, किंतु व्यवहार-सांकर्य मिटानेके लिये पुराणोंमें (विष्णु! और 'ब्रह्मा' पृथक्ू-पृथक् नाम कर दिये गये हैं, अद्गैत सबको इष्ट है। इसलिये-- एकमूर्तिस्त्रयो देवा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा: ।
--यह सिद्धान्त सर्वत्र ही उदघोषित है। पितामह ब्रह्माने वर्षभर उस अप्डेमें निवास कर अपने ध्यानसे उस अण्डेके दो विभाग कर दिये। उन्हीं दोनों टुकड़ोंसे दयु (स्वलोॉक) ओर पृथ्वी (भूलोक)को बनाया। (यही भूलोक पुराणोंमें पद्म- रूपसे निरूपित हुआ है और इसपर एक दूसरे ब्रह्मा प्रादुर्भूत होते हैं, जिनका वर्णन मनुस्मृतिमें आगे चलकर श्लोक ३२में 'विराट' नामसे आता है ।) तैत्तिरीय उपनिषदमें जो “तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:। आकाशाद्वायु: | वायो- रग्निः। अग्नेराप:। अद्भ्यः पृथिवी” आदि कहा गया है, वहाँ इतनी विशेषता है कि “अप्' शब्दसे हमारी त्रिलोकीके अन्तरिक्षको लिया है, जिसे पूर्वोक्त मनुस्मृतिके श्लोकोमें भी 'अपां स्थानम' नामसे बताया गया है। यह सूर्यमण्डलसे उत्पन्न है तथा पृथ्वी और सूर्यके मध्यमें स्थित है।
सृष्टिका मूल तत्त्व क्या है--इस विषयमें प्राचीन आचार्योके तीन प्रकारके भिन्न मत हैं । कोई प्रकृतिको मूलतत्त्व
* साधु कोन ? असाधु कोन ? *
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कहते हैं, उनका वह 'ग्राकृतवाद' सप्तम मार्कण्डेयपुराणमें प्रदर्शित हुआ है। कोई आग्नेय प्राणको मूलतत्त्व मानते हैं, वह मत अष्टम अग्निपुराणमें बताया गया है तथा कोई अन्य आचार्य सौर प्राणको मूलतत्त्व बताते हैं, उनका सिद्धान्त नवम “भविष्य-पुराण” ने बताया है। यों तीन मत दिखाकर दशम पुराण ब्रह्मवैवर्तद्वार भगवान् व्यासने अपना सिद्धान्त बता दिया कि यह सब ब्रह्मका विवर्त है। अर्थात् मूलतत्त्व 'ब्रह्म' है, उसका जो अतात्तिक अन्यथाभाव समझा जाता है, वही सृष्टि है। यों विवर्तवादको उत्तरपक्ष रखते हुए इस मूलतत्त्व- विषयक मतभेदको दूर किया है| वह ब्रह्म मन और वाकूसे परे हैं, जो सृष्टि हमें प्रतीत होती है, उसमें उस परब्रह्मका “अवतार' होता है। उसी अवतारके द्वारा वह परबरह्म उपास्य भी होता है, इसलिये एकादशसे आरम्भ कर षोडश-पर्यन्त छः पुराण अवतारप्रतिपादक हैं। इनमें लिड़ और स्कन्द--ये दो भगवान् शंकरके अवतार कहे जाते हैं और वराह, वामन, कूर्म और मत्स्य--ये चार अवतार भगवान् विष्णुके। सृष्टि- प्रक्रियामें जिन अवतारोंका उपयोग है, उन्हींके नामसे यहाँ पुराणोंके नाम रखे गये हैं और जिस क्रमसे इन अवतारोंका सृष्टि-प्रक्रियामें उपयोग है, वही क्रम उन पुराणोंका माना गया है। इस सृष्टिचक्रमें घूमेवाले जीवकी किस-किस कर्मके अनुसार क्या-क्या गति होती है-- यह 'आयति' प्रकरण सत्रहवें “गरुडपुराण'में दिखाया गया है, जिससे कि सृष्टिका परिणाम” (जीवका कर्मफलभोगरूप प्रयोजन) प्रतीत होता है और इस सब गतिका “आयतन' क्या है तथा सृज्यमान वस्तुकी सीमा कितनी है--यह निरूपण अठारहवें 'ब्रह्माप्डपुराण'में कर दिया गया है। इस प्रकार क्रमसे अठारह पुराणों या एक ही पुराणके अठारह प्रकरणोंद्वारा सृष्टिविधानकी पूर्णता हो जाती है और इसी विद्यामें सब विद्याऑका अन्तर्भाव है।
साक्षु कोन ? असाधु कोन ?
सत्कथासु प्रवर्तन्ते सज्नना ये जगद्धिता: ।। निन्दायां कलहे वापि हासन्तः पापतत्परा: ।
(नारद० १ १ | ए६-
'जो संसारका हित करनेवाले साधु पुरुष हैं, वे ही उत्तम कथाओंके कहने-सुननेमें प्रवृत्त होते हैं। पापपरायण दुष्ट तो सदा दूसरोंकी निन्दा ओर दूसरोंक साथ कलह करनेमें ही लगे रहते हैं।'
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हिंदू-संस्कृतिके' पुराणोंपर एक -दृष्टि क्
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा »
है. है श्वास 7-75: ७ न, न वि मै हल नि पं! कं के ! क्र |]
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पक कर | ; फक्रकफकफकक्फ्रफफफफ फकफकफ क फ्ररशफफ फफ फक फ फ फफ।
(नित्यलीलालीन श्रद्धेय भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोददार) :
भारतीय सेस्कृत-साहित्य-सागर अनन्त रल्लराशिसे पूर्ण है। उन रलोंमें पुराणका स्थान अत्यन्त महत्त्वका है।पुराण- साहित्य वेदकी भांति भगवान्का निःश्वास रूप ही हेै। श्रीमद्भागवत साक्षात् भगवानका स्वरूप है। इसीसे भक्त-भागवतगण इसकी भगवदभावनासे श्रद्धा-भक्ति-पूर्वक पुजा किया करते हैं। भगवान् व्यासदेव-सरीखे महापुरुषको जिसकी रचनासे ही परम शान्ति मिली, जिसमें ज्ञान-भक्तिका परम रहस्य बड़ी ही मधुरताके साथ अभिव्यक्त हुआ है, उस श्रीमदभागवतके सम्बन्धमें क्या कहा जाय ? इसके प्रत्येक अड्गसे भगवद्भावपूर्ण पारमहंस्य ज्ञान-सुधासरिताको बाढ़ आ रही है---'चस्मिन पारमहंस्यमेकममलं ज्ञार्न परं गीयते ।' -- भगवानके मधुर प्रेमका छलकता हुआ सागर है श्रीमद्धागवत । इसीसे भावुक भक्तगण इसमें सदा अवगाहन करते रहते हैं। परम मधुर भगवद-रससे भरा हुआ-- स्वादु स्वादु पदे पदे' --ऐसा ग्रन्थ बस यही है। इसकी कहीं तुलना नहीं है। विद्याका तो यह भंडार ही है । “बिद्या भागवतावधि:' प्रसिद्ध है। इस परमहंस-संहिताका पर्याप्त आनन्द तो उन्हीं सौभाग्यशाली भक्तोंकों किसी अंशमें मिल सकता है, जो हदयकी सच्ची श्रद्धाके साथ केबल भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये ही भक्तिपूर्वक इसका पारायण करते हैं और अपनी विद्या-ब॒द्धिसे नहीं, वर केवल भगवत्कृपाके बलसे ही इसका मर्म हृदयड्रम करना चाहते हैं ।
स्कन्दपुराण समस्त पुराणोंमें सबसे बड़ा है। यह सात खण्डोंमें विभक्त है। इसमें ८११०० श्लोक हैं। सात खण्डोंके नाम हैं--माहेध्वरखण्ड, वैष्णवखण्ड, ब्रह्मबण्ड, काशीखण्ड, अवन्ती, नागर और प्रभास-खण्ड | इनमें भी अनेक अवान्तर खण्ड हैं। इसके अतिरिक्त एक संहितात्मक स्कन्दपुराण पृथक् है। उसके सम्बन्ध्में शंकरसंहिताके 'हालास्थ-माहात्य में लिखा हे कि श्रुतिसार स्कन्दपुराण ' ६ संहिताओं और ५० खण्डॉमें विभक्त है । इसकी संहिताओंके नाम हैं--- १-सनत्कुमार- संहिता, २-सूतसंहिता, रे -शंकरसंहिता, ४-वेष्णवर्सहिता ५-ब्रह्मसेहिता और ६-सौरसंहिता | इन संहिताओंकी श्लोक-
संख्या क्रमशः २६,००० : 5,०००; ३०,०००; ५७ ३,००० ओर १,००० है। इस प्रकार कुल मिलाव स्कन्दपुराणकी श्लोक-संख्या भी ८१,००० होती हे सेहिताओंमेंसे पहली ,त्तीन उपलब्ध हैं। कहते हैं कि ने छहों संहिताएँ हैं । सूतसंहितापर तो आचायेकि भाष्य भी संहितात्मक स्कन्दपुराणको कोई उपपुराण कहते हैं, कोई और कोई इसे महापुराणका ही अड्ग मानते हैं| जो कुछ इसकी संहिताएँ हैं बड़े महत्त्वकी । इस महापुराणमें माहात्मकथाओंके प्रसंगमें जो * इतिहास तथा जीवनचरित्र आये हैं, वे बड़े महत्त्वके हैं। लौकिक, पारलोकिक, पार्मार्थिक, कल्याणकारी < उपदेश भरे हैं। विभिन्न प्रसंगोंमें धर्म, सदाचार, योग, भक्ति आदिका बड़ा ही सुन्दर निरूपण किया गया है रत वर्णनमें जो भूवत्तान्त आया है, वह तो अत्यन्त आश्चर्यव ओर भूगोलके विद्वानोंके लिये अत्यन्त आदरणीय विचारणीय विषय है । 'यह स्कन्दपुराण पता नहीं, कितने अतीत युगोंकी अ अमूल्य गाथाओंको अपने वक्षःस्थलपर धारण किये, वि निर्मल नद-नदी-सरित-सागर-शैलादिका विशद वर्णन प्र किये, कितने पुण्यतीर्थ, पुण्याश्रम, पुण्यायतन और वि शत-शत कृतार्थ-जीबन ऋषि-महर्षि, साधु-महात्मा , रे भक्तोंकी पृण्यमयी चारु चरित्रमालाओंसे समलंकृत होकर ३ भी भारतीयोंका भक्ति-भाजन हो रहा है। आज भी भार जीवनमें, घर-घरमें इसमें वर्णित आचारों, पद्धतियों, ब्रतों सिद्धान्तोंका कितना प्रचार है--यह देखकर आश्चर्यचवि हृदयसे इसके प्रति जीवन श्रद्धासे झुक जाता है । मार्केप्डेय. और ब्रह्मपुराणमें ऐसे अनेकाँ म साधन,उपदेश और आदर्श चरित्र भरे हैं, जिनसे मनुप्य स ही अपने अभ्युदय तथा निःश्रेयसका पथ प्राप्त कर सकता सत्यके पालनमें महाराज हरिश्वन्द्रका इतिहास महान् आद स्वरूप है। विपदयस्तोंको सुख पहुँचानके लिये महा विपश्चित॒का त्याग अपूर्व प्रभावोत्पादक है। ब्राह्मगकुमाः
अड्डू ]
* हिंदू-संस्कृतिके पुराणोंपर एक दृष्टि «
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प्राण-रक्षा करनेमें महादेवी पार्वतीजीके तपःसमर्पणका इतिहास बड़ा ही पवित्र शिक्षाप्रद है। धर्मके पक्षमें दृढ़ता और मैत्रीधर्मके पालनमें वैश्ययुवक मणिकुण्डलका चरित्र अपनी जोड़ी नहीं रखता। महाशक्तिकी उपासनासे और समस्त पृथक्-पृथक् शक्तियोंकी पुझीभूत एक महान् शक्तिकी सहायतासे विश्वदुःखदायी असुरोंका सम्पूर्ण समाज कैसे सहज ही नष्ट हो सकता है--इसका बड़ा मनोहर और ज्ञानगर्भ उपदेश देवीमाहात्म्य-- (दुर्गासप्तशती) में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त पतिव्रता-माहात्यय, तीर्थमाहात्य, भगवदू- भक्ति, ज्ञान, योग, सदाचार और लीलामय भगवानके पवित्र चरित्रोंका बड़ा ही रोचक, मनोहर, गम्भीर और मार्मिक वर्णन इन पवित्र पुराणोंमें आया है। पाठकोंको विशेष मन लगाकर इनसे लाभ उठाना चाहिये । इन पुराणोंमें नारदमहापुराण और किछ्णुपुराण बड़े महत्त्वके सात्त्तिक पुराण माने जाते हैं। नारदपुराणमें इतने महत्त्वके विषय हैं कि उन्हें पढ़-सुनकर चमत्कृत होना पड़ता है। पूर्ण विष्णुपुराण भी तेईस हजार श्लोकोंका बताया गया है। वर्तमान उपलब्ध विष्णुपुराण मूल महापुराणका पूर्वभागं है, जो वर्णनके 'मनुसार ही प्राप्त है। 'विष्णुधर्मोत्तरपुराण'को विष्णुपुराणका उत्तरभाग बताया गया है और हमारे विश्वासके अनुसार है भी यही बात। नारदपुराणमें पुराणोचित महत्त्वके प्रसंग तो हैं ही, उसमें वेदके छः अड्ग--शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष (सिद्धान्त, होरा ओर संहिता) ओर छन्दका भी बड़ा विशद् महत्त्वपूर्ण और मौलिक वर्णन है। इससे पता लगता है कि इसमें कितने महत्त्वके विषय हैं। इस एक नारदपुराणके अध्ययनसे ही सैकड़ों ज्ञातव्य विषयोंका सहज ही ज्ञान हो सकता है। इनमें आध्यात्मिक प्रसंग भी बहुत महत्त्वके हैं, जिनके श्रद्धापूर्वक अध्ययन, मनन ओर आचरणसे मनुष्यको मानव-जीवनकी चरम सफलता सहज ही प्राप्त हो सकती है। इसके अतिरिक्त नारदपुराणके तीसरे पादमें सकाम उपासनाका भी बड़ा विशद वर्णन है, जो सकाम उपासकोंके लिये बड़े महत्त्वका हैं। यद्यपि मानवजीवनका प्रधान उद्देश्य 'भगवत्याप्ति' ही हे, इसलिये उपासनामें सकाम-भाव रखना कल्याणकारी पुरुषोंके लिये कदापि वाउछनीय नहीं है । यह एक
प्रकारकी अज्ञता ही है। अपनी-अपनी रुचि, अधिकार तथा परिस्थितिके अनुसार उपासना अवश्य करनी चाहिये, परंतु करनी चाहिये निष्कामभावसे भगवषत्लीत्यर्थ ही। तथापि सकाम-उपासना पाप नहीं है, प्रत्युत आधिभौतिक साधनोंकी अपेक्षा लोकिक सिद्धि प्राप्त करनेका सुगम तथा श्रेष्ठ साधन है, क्योंकि इससे प्रतिबन्धका नाश होकर नवीन प्रारब्धका निर्माण सम्भव है। अवश्य ही यह साधन होना चाहिये सात्तिक देवताओंका तथा सात्तिक विधि-विधानके अनुसार ही | तामस देवासुरोंकी स्थापना तो अधोगतिमें ले जानेवाली होती है। सकाम-उपासना करनी हो तो श्रीभगवान्के किसी एक नाम- रूपकी करनी चाहिये। भगवानकी सकाम आराधनासे सकाम उददेश्यकी सिद्धि होने या भगवानकी मड़लमयी इच्छासे सिद्धि न होनेपर भी अन्तःकरणकी शुद्धि, भक्तिकी प्राप्ति और अन्तमें भगवत्प्राप्ति हो सकती है। भगवानने स्वये कहा है--- “मद्धक्ता यान्ति मामपि ।! (गीता ७। २३)
ब्रह्मवैवर्तपुराण ग्रन्थ वैष्णबप्रिय होनेके साथ ही कई दृष्टियोंसे सबके लिये ही उपयोगी तथा मड्ढगलप्रद है। इसमें भगवान् श्रीकृष्णफकी और उनकी अभिन्नस्वरूपा प्रकृति-- ईश्वरी श्रीराधाकी सर्वप्रधानताके साथ ही समस्त शक्तिमानोंकी तथा शक्तियोंकी एकताका, महिमाका, स्वरूपादिका तथा उनकी साधना-उपासनाका बड़ा ही विशद तथा सुन्दर प्रति- पादन है। साथ ही इसके सभी खण्डोंमें इस प्रकारके बहुत-से सिद्ध मन्त्रों, कबचों और स्तोत्रोंका वर्णन उनके इतिहासके साथ है, जिससे पता लगता है कि संकट-निवृत्ति, मनोरथ- प्राप्ति, विपत्ति-विनाश, लक्ष्मी-प्राप्ति, भक्ति-प्राप्ति तथा भगवलद्माप्तिके लिये इन मन्त्रादिके श्रद्धा-विधिपूर्वक प्रयोगसे महान् लाभ हो सकता है। जैसे--ब्रह्मखण्ड, अध्याय ३८-'ब्रह्माण्डपावन कृष्ण-कवच ।' इससे रोग-भयका नाश तथा सवार्थसिद्धि होती है। प्रकृतिखण्ड, अध्याय ४-'३% ऐं हीं श्रीं सरस्वत्ये बुधजनन्ये स्वाहा'-इस मन्त्र तथा 'सरस्वती-कवच'के प्रयोगसे मनुष्य शिक्षाके क्षेत्रमें परम सफल विद्वान, कवि-सम्राट् तथा विश्वविजयी होता है।
प्रकृतिखण्ड अध्याय ३९-३७ श्रीं ह्रीं क््लीं ऐं कमलवासिन्ये स्वाहा! -- इस मन्त्र तथा 'महालक्ष्मीस्तोत्र' के प्रयोगसे स्थिर लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है।
३० + सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा * [पुराणकधा- अ्रकष्शकल+क्रशकभकअहअअ 59 50तक्४%%फक# 4३ /अअरूफ पक ८५ ५#कऋकअऊ कक अहअ+ कफ अज मऊ शशकम्जफतभशत कफ कफ ए॒अफ्मजर अऊर अककत ३ +अजश ४ ५क्र ऋलकअ कक ४ हक़ हक
प्रकृतिखण्ड, अध्याय ५६-श्रीराधिकाके 'जगन्मज्ञल- कवच से सर्वप्ष॑कटोंका नाश तथा राधाकृष्णके द्वाय श्रीयधामाधव-प्रेमकी प्राप्ति होती है। गणपतिखण्ड, अध्याय ३१-३७ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा --इस मन्त्र एवं त्रैलोक्यविजयकवच' के प्रयोगसे घोर संग्राममें पूर्ण विजय तथा मोहपर विजय घाप्त होती है और श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति होती है । गणपतिखप्ड, अध्याय ३६-३७ हां श्री कली कालिकाये स्वाहा --इस मन्त्र तथा “कालीकंवच'के प्रयोगसे शत्रुनाश, विजय और राज्यकी प्राप्ति होती है । गणपतिखण्ड, अध्याय ३८-'महालक्ष्मीकवच'के प्रयोगसे सम्पूर्ण सम्पत्ति मिलती है। गणपतिखण्ड, अध्याय ३९-'ब्रह्माप्डविजयकबच'के प्रयोगसे महान् शत्रुपर विजय प्राप्ति होती है। भगवान् थ्रीशंकरने इस कवचके प्रयोगसे त्रिपुरासुरपर विजय पायी थी । श्रीकृष्ण-जन्मखण्ड, अध्याय १२-कृष्णकबच के प्रयोगसे बच्चोंकी अग्नि, विष, कुदृष्टि (नजर) सर्प तथा अपदेवताओंके भयसे रक्षा होती है। श्रीकृष्णजन्मखण्ड. अध्याय १९-'श्रीकृष्णस्तोत्र' के प्रयोगसे शत्रु-सेनाका क्षय होता है तथा प्रयोगकर्ताकी युद्धमें सर्वत्र विजय होती है और सहज ही रक्षा होती है। यह ज़हमवैवर्तपुराण श्रद्धा-सम्पन्न पुरुषोंके लिये दैवी साधनोंके द्वारा देशको वर्तमान महान् संकटसे मुक्त कराने, तन-धन-जनकी रक्षा कराने, खोयी हुई शक्ति-सम्पत्तिको पुनः प्राप्त कराने, संग्राममें आसुरी शक्तिका शीघ्र क्षय कराने एवं रणमें पूर्ण विजय प्राप्त करानेके महान् कार्यमें बड़ा ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है। जो साधक भक्त भगवती श्रीशाधा, दुर्गा, महालक्ष्मी, सरस्वती, काली आदि महान् शक्तियों तथा भगवान् श्रीकृष्ण, शंकर, गणेश आदि महान् भूगवत्सरूपोंकी कुँषा आप्त
करने, श्रीराधामाधवकी परमभक्ति तथा प्रेमकी प्राप्ति करनेकी पास्मार्थिक दृष्टिसे, विषयासक्ति तथा विषय-कामनासे यहित होकर इसमें उल्लिखित-साधनोंके अनुसार प्रयत्न कोंगे, उन्हें उनकी श्रद्धामयी साधनाके अनुसार परम पास्मार्थिक लाभ होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
शिवपुराण एक प्रधान पुराण है। इसमें परात्पर पखह्म प्रभुके कल्याणमय शिवस्वरूपके महत्त्व, रहस्य, लीलाविहार, अवतार तथा उनकी पूजा-पद्धतिका बड़ा ही विशद वर्णन है और भगवान् शिवकी परात्परता, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, त्रिदेवोंकी एकता, शक्तिकी प्रधानता एवं शक्ति-शक्तिमानकी अभिन्नता, सत्संग, सदाचार, भक्तियोग, ज्ञान आदिका बड़ा ही सुन्दर निरूपण हुआ है।
श्रीदेवीभागवत-पुराणके विविध विचित्र कथा-प्रसंगोंमे देवी-माहाल्य, देवी-आशधनाकी विधि तथा देवी-आराधनाे प्राप्त आश्चर्यमय शुभ परिणामोंके मधुरात्रिमधुर विषय भरे पड़े हैं ; पुत्र कुपुत्र हो जाता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होती । वह तो सदा अपनी वात्सल्य-स्नेह-सुधा-रस-धारासे संतानके जीवनको अभिषिक्त करती ही रहती है । यहाँ भी यही बात है! यह भारतीय आर्यचर्मकी विशेषता हैं कि इसमें सच्चिदानन्दपरात्पर अह्यकी मातुरूपमें आराधना की गयी हे और यह आराधना कल्पित आयधना--पद्धतिमात्र नहीं है। बस्तुतः ही अनन्त विचित्र मातृरूपोमें सच्चिदानन्दमव पशसर तत्व प्रकट है। भक्तोनि उनकी प्रलक्ष अनुभूति की हैं, अब र्भ करते हैं। समस्त क्लेशोंका नाश, समस्त विप्नोंकी नियृत्ति, सम्पूर्ण कामनाओंकी पूंर्ति, सिद्धि-सफलताकी प्राप्ति, परम बैशाग्य और तत््व-शानका उदय, भक्ति-प्रेमकी सुधा-घारामें अवगाहम--संभी अत्यन्त दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थोक्री उपलब्धि माताकी आराधना-5पासनासे सहज ही हो जाती ह इसमें तमिक भी संदेह नहीं। अतः पुराणोंका परिशीलन सभी प्रकार कल्याणदायक है।
नल ०१ ७७४४७
सत्सडूदेवार्चनसत्कथास हितोपदेशे. निश्तो. मनुष्य: ।
अयाति विष्णो: परम पर्द
'जो मानव सत्सड्, देवपूजा, पुरणकथा और हितकारी
रे
यद्देहावसानेःच्युततुल्यतिजा: । हे उपदेशमें तत्पर रहता है, वह इस देहका नाश हवपः
विष्णुके समान तेजस्वी स्वरूप घारण करके उन्हींके पस्म धाममें चला जाती हैं !'
(नारद: १7१/52 ह।
अनेपर भगवान्
अड्डा]
* मुक्तिका उपाय *
३१९
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मुक्तिका उपाय
(अश्रद्धेय स्वामी श्रीरामसुखदासजी महाराज)
पुराण भारतीय संस्कृतिकी अमूल्य निधि है। पुराणोंमें मानव-जीवनको ऊँचा उठानेवाली अनेक सरल, सरस, सुन्दर और विचित्र-विचित्र कथाएँ, भरी पड़ी हैं। उन कथाओंका तात्पर्य राग-द्वेषहहित होकर अपने कर्तव्यका पालन करने और भगवानको प्राप्त करनेमें ही है। पद्मपुराणके भूमिखण्डमें ऐसी ही एक कथा आती है।
अमरकण्टक तीर्थमें सोमशर्मा नामके एक ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नीका नाम था सुमना। वह बड़ी साध्वी और पतित्रता थी। उनके कोई पुत्र नहीं था और धनका भी उनके पास अभाव था। पुत्र और धनका अभाव होनेके कारण सोमशर्मा बहुत दुःखी रहने लगे। एक दिन अपने पतिको अत्यन्त चिन्तित देखकर सुमनाने कहा कि 'प्राणनाथ | आप चिन्ताकों छोड़ दीजिये; क्योंकि चिन्ताके समान दूसरा कोई दुःख नहीं है। स्त्री, पुत्र और धनकी चिन्ता तो कभी करनी ही नहीं चाहिये। इस संसारमें ऋणानुबन्धसे अर्थात् किसीका ऋण चुकानेके लिये और किसीसे ऋण वसूल करनेके लिये ही जीवका जन्म होता है। माता, पिता, स्त्री, पुत्र, भाई, मित्र, सेवक आदि सब लोग अपने-अपने ऋणानुबन्धसे ही इस पृथ्वीपर जन्म लेकर हमें प्राप्त होते हैं। केवल मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी ऋणानुबन्धसे ही प्राप्त होते हैं।'
'संसारमें शत्रु, मित्र और उदासीन--ऐसे तीन प्रकारके पुत्र होते हैं। शत्रु-स्वभाववाले पुत्रके दो भेद हैं। पहला, किसीने पूर्वजन्ममें दूसरेसे ऋण लिया, पर उसको चुकाया नहीं तो दूसरे जन्ममें ऋण देनेवाला उस ऋणीका पुत्र बनता है। दूसरा, किसीने पूर्वजन्ममें दूसरेके पास अपनी धरोहर रखी, पर जब धरोहर देनेका समय आया, तब उसने धरोहर लोटायी नहीं, हड़प ली, तो दूसरे जन्ममें घरोहरका स्वामी उस धरोहर हड़पनेवालेका पुत्र बनता
है। ये दोनों ही प्रकारके पुत्र बचपनसे माता-पिताके साथ .
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हैं। बड़े होनेपर वे माता-पिताकी सम्पत्तिको व्यर्थ ही नष्ट कर देते हैं। जब उनका विवाह हो जाता है, तब वे माता-पितासे कहते हैं कि यह घर, खेत आदि सब मेरा है, तुमलोग मुझे मना करनेवाले कौन हो ? इस तरह वे कई प्रकारसे माता-पिताको कष्ट देते हैं। माता-पिताकी मृत्युके बाद वे उनके लिये श्राद्ध-तर्पण आदि भी नहीं करते। मित्र-स्वभाववाला पुत्र बचपनसे ही माता-पिताका हितैषी होता है। वह माता-पिताको सदा संतुष्ट रखता है ओर स्नेहसे, मीठी वाणीसे उनको सदा प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता है। माता-पिताकी मृत्युके बाद वह उनके लिये श्राद्ध-तर्पण, तीर्थयात्रा, दान आदि भी करता है। उदासीन-स्वभाववाला पुत्र सदा उदासीनभावसे रहता है। वह न कुछ देता है ओर न कुछ लेता है। वह न रुष्ट होता है, न संतुष्ट; न सुख देता है, न दुःख *। इस प्रकार जैसे पुत्र तीन .प्रकारके होते हैं, ऐसे ही माता, पिता, पत्नी, पुत्र, भाई आदि और नौकर, पड़ोसी, मित्र तथा गाय, भैंस, घोड़े आदि भी तीन प्रकारके (शत्रु, मित्र और उदासीन) होते हैं। इन सबके साथ हमारा सम्बन्ध ऋणानुबन्धसे ही होता है।'
'प्रियतम ! जिस मनुष्यको जितना धन मिलना है, उसको बिना परिश्रम किये ही उतना धन मिल जाता है और जब धन जानेका समय आता है, तब कितनी ही रक्षा करनेपर भी वह चला जाता है--ऐसा समझकर आपको धनकी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। वास्तवमें धर्मके पालनसे ही पुत्र और धनकी प्राप्ति होती है। धर्मका आचरण करनेवाले मनुष्य ही संसारमें सुख पाते हैं। इसलिये आप धर्मका अनुष्ठान करें। जो मनुष्य मन वाणी ओर शरीरसे धर्मका आचरण करता है, उसके लिये संसारमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती |
ऐसा कहनेके बाद सुमनाने विस्तारसे धर्मका स्वरूप तथा उसके अड्जोंका वर्णन किया | उसको सुनकर सोमशमने
नत+-+4+4+-ननननमम मा +नमनम-मभ+भ+++नन+न+>+3.-++3-+-33++++--+»-
* कोई व्यक्ति किसी सन््तकी खूब लगनसे सेवा करता है। अन्तसमयमें किसी कारणसे सनन््तको उस सेवककी याद आ जाय तो वह उस सेवक
घरमें पुत्ररूपसे जन्म लेता है और उदासीनभावसे रहता है।
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* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा «
[पुराणकथा-
क्रफफफफ फफफ फफफफफफफ्रफ फफ कफ फफफफऊफ फफऋफ्रमफ़क फ़फआ फ्कफ फ्फफ फ फ कफ ऋफक्रफफफऊफ्फकऋक क्र कक फऋफफफ़फफा फ फ फकफऊफ फऋफ फ़ फ् क जकऋ्क फफ्रफफ्रफ फ्फ़रक फक्फफफ्फफ फ्रफफ्कक कफ कफ छू, फ् फ्रफ पा फकफफफ फफफफफफफ्रफफर फ्फ आफ कफ कफ फ् शफाफ कऋऊऋफ््फऊऋफफक्रक्रफ फफऊ फ्फफफ फ ऊफऋऊ कफ ऋरफ फ़क #फ्रफ फ्फ्रक फ़ फ्रककक्रफफफफकफफफऋफ्ककक कुकर,
प्रश्न किया कि "तुम्हें इन सब गहरी बातोंका ज्ञान कैसे हुआ ?' सुमनाने कहा--'आप जानते ही हैं कि मेरे पिताजी धर्मात्मा और शास्त्रोंके तत्तको जाननेवाले थे, जिससे साधुलोग भी उनका आदर किया करते थे। वे खुद भी अच्छे-अच्छे सन्तोंके पास जाया करते तथा सत्संग किया करते थे। मैं उनकी एक ही बेटी होनेके कारण बे मेरेपर बड़ा स्नेह रखा करते तथा अपने साथ मुझे भी सत्संगमें ले जाया करते थे। इस प्रकार सत्संगके प्रभावसे मुझे भी धर्मके तत्त्वका ज्ञान हो गया।' यह सब सुनकर सोमशमनि पुत्रकी ग्राप्तिका उपाय पूछा | सुमनाने कहा कि 'आप महामुनि वसिष्ठजीके पास जायें और उनसे प्रार्थना करें । उनकी कृपासे आपको गुणवान् पुत्रकी प्राप्ति हो सकती है।/ पत्नीके ऐसा कहनेपर सोमशर्मा वसिष्ठजीके पास गये। उन्होंने वसिष्ठटजीसे पूछा कि किस पापके कारण मुझे पुत्र और धनके अभावका कष्ट भोगना पड़ रहा है ?' वसिष्ठजीने कहा --'पूर्वजन्ममें तुम बड़े लोभी थे तथा दूसरॉंके साथ सदा द्वेष रखते थे। तुमने कभी तीर्थयात्रा, देवपूजन, दान आदि शुभकर्म नहीं किये। श्राद्धका दिन आनेपर तुम घरसे बाहर चले जाते थे। धन ही तुम्हारा सब कुछ था। तुमने धर्मको छोड़कर धनका ही आश्रय ले रखा था। तुम रात-दिन धनको ही चिन्तामें लगे रहते थे। तुम्हें अरबॉ-खरबों स्वर्णमुद्राएँ, प्राप्त हो गयीं, फिर भी तुम्हारी तृष्णा कम नहीं हुई, प्रत्युत बढ़ती ही रही | तुमने जीवनमें जितना धन कमाया, वह सब जमीनमें गाड़ दिया। स्त्री और पुत्र पूछते ही रह गये; किंतु तुमने उनको न तो धन दिया ओर न धनका पता ही बताया। धनके लोभमें आकर तुमने पुत्रका स्नेह भी छोड़ दिया। इन्हीं कमोके कारण तुम इस जन्ममें दरिद्र और पुत्रहीन हुए हो । हाँ, एक बार तुमने घरपर अतिधि- रूपसे आये एक विष्णुभक्त और धर्मात्मा ब्राह्मणकी प्रसन्नता- पूर्वक सेवा की । उनके साथ तुमने आए्नी ्लीसहित एकादशी- व्रत रखा और भगवान् विष्णुका पूजन भी किया | इस कारण तुम्हें उत्तम ब्राह्मण-वंशमें जन्म मिला है ! विप्रवर ! उत्तम स्त्री पुत्र, कुल, राज्य, सुख, मोक्ष आदि दुर्लभ वस्तुओंकी प्राप्त भगवान् विष्णुकी कृपासे ही होती है। अतः तुम भगवान् विष्णुकी ही शरणमें जाओ और उन््हींका भजन करो।
वसिष्ठजीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर सोमशर्मा अपनी स्त्री सुमनाके साथ बड़ी तत्परतासे भगवान्के भजनमें लग गये। उठते, बैठते, चलते, सोते आदि सब समयपें उनकी दृष्टि भगवान्की तरफ ही रहने लगी। बड़े-बड़े विध्न आनेपर भी वे अपने साधनसे विचलित नहीं हुए। इस प्रकार उनकी लगनको देखकर भगवान् उनके सामने प्रकट हो गये। भगवानके वरदानसे उनको मनुष्यलोकके उत्तम भोगोंकी और भगवद्धक्त तथा धर्मात्मा पुत्रकी प्राप्ति हो गयी।
सोमशमकि पुत्र॒का नाम सुव्रत था। सुव्रत बचपनसे ही भगवानका अनन्य भक्त था। खेल खेलते समय भी उसका मन भगवान् विष्णुके ध्यानमें लगा रहता था। जब माता सुमनां उससे कहती कि 'बेटा ! तुझे भूख लगी होगी, कुछ खा ले', तब वह कहता कि 'माँ ! भगवान्का ध्यान महान् अमृतके समान है, मैं तो उसीसे तृप्त रहता हूँ !' जब उसके सामने मिठायी आती, तो वह उसको भगवानके ही अर्पण कर देता और कहता कि 'इस अन्नसे भगवान् तृप्त हों ।' जब वह सोने लगता, तब भगवानका चिन्तन करते हुए कहता कि ' मैं योग- निद्रापपयण भगवान् कृष्णकी शरण लेता हूँ। इस ग्रकार भोजन करते, बख्र पहनते, बैठते ओर सोते समय भी वह भगवानके चिन्तनमें लगा रहता और सब वस्तुओंकों भगवानके अर्पण करता रहता । युवावस्था आनेपर भी वह भोगोंमें आसक्त नहीं हुआ, प्रत्युत भोगोंका त्याग करके सर्वथा भगवानके भजनमें ही लग गया। उसकी ऐसी भक्तिसे प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु उसके सामने प्रकट हो गये | भगवानने उससे वर माँगनेके लिये कहा तो वह बोला-- श्रीकृष्ण ! अगः आप मेरेपर प्रसन्न हैं तो मेरे माता-पिताको सशरीर अपने पस्मधाममें पहुँचा दें और मेरे साथ मेरी पत्रीकी भी अपने लोकमें ले चलें ।' भगवानने सुव्रदकी भक्तिसे संतुष्ट होकर उसको उत्तम वरदान दे दिया। इस प्रकार पुत्रको भक्तिके प्रभावसे सोमशर्मा ओर खुमना भी भगवदधामको प्राप्त हो गये ।
इस कथामें विशेष बात यह आयी है कि संसारम
किसीका ऋण चुकानेके लिये और किसीसे ऋण बयूल करनेके लिये ही जन्म होता है; क्योंकि जीवन अनेक लामाम लिया है और अनेक लोगोंका दिया है। लेन-दनका
)] या
अड्ड |
हर पुराण-महिमा न
३३
फ्मभफ्रफफकफफफ४फ्रफफ फ्फ फ्रफक फ़र फ फमफ कर्क कफ फर्क फ्री करा कक जी की कफ सजी जीप नदप दफसत हर फक्रफफ्रफफफफफफ़फ फफफ फफफ फ्फक फफ फफक्नफऊक फफफ़ ऊऋफ्रफफ्ऋऔफऋ क्मफऊफऋऋ फकफ फफ फ फ्फमफ कफ फ फ्फक्रफफ्फफ फफफफफफफफफ़ऊफफफ्फफ़फफऊफ फ्रफफ्फफफ्रफफ्रफ क्र फ पुआन्क कषपचः
व्यवहार अनेक जन्मोंसे चला आ रहा है और इसको बंद किये बिना जन्म-मरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता। संसारमें जिनसे हमारा सम्बन्ध होता है, वे माता, पिता, स्त्री, पुत्र तथा पशु-पक्षी आदि सब लेन-देनके लिये ही आये हैं। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह उनमें मोह-ममता न करके अपने कर्तव्यका पालन करे अर्थात् उनकी सेवा करे, उन्हें यथाशक्ति सुख पहुँचाये। यहाँ यह शंका हो सकती है कि अगर हम दूसरेके साथ शत्रुताका बर्ताव करते हैं तो इसका दोष हमें क्यों लगता है; क्योंकि हम तो ऐसा व्यवहार पूर्वजन्मके ऋणानुबन्धसे ही करते हैं ? इसका समाधान यह हे कि मनुष्यशरीर विवेकप्रधान है। अतः अपने विवेकको महत्त्व देकर हमारे साथ बुरा व्यवहार करनेवालेको हम माफ कर सकते हैं और बदलेमें उससे अच्छा व्यवहार कर सकते हैं। मनुष्यशरीर बदला लेनेके लिये नहीं है, प्रत्युत जन्म-मरणसे
सदाके लिये मुक्त होनेके लिये है। अगर हम पूर्वजन्मके ऋणानुबन्धसे लेन-देनका व्यवहार करते रहेंगे तो हम कभी जन्म-मरणसे मुक्त हो ही नहीं सकेंगे। लेन-देनके इस व्यवहारको बंद करनेका उपाय है--निःस्वार्थभावसे दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुराना ऋण समाप्त हो जाता है ओर बदलेमें कुछ न चाहनेसे नया ऋण उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार ऋणसे मुक्त होनेपर मनुष्य जन्म-मरणसे छूट जाता है ।
अगर मनुष्य भक्त सुत्रतकी तरह सब प्रकारस भगवान्के ही भजनमें लग जाय तो उसके सभी ऋण समाप्त हो जाते हैं अर्थात् वह किसीका भी ऋणी नहीं रहता ।* भगवद्भजन प्रभावसे वह सभी ऋणोंसे मुक्त होकर सदाके लिये जन्म-मरणके चक्रसे छूट जाता है और भगवानके परमधामक्तो प्राप्त हो जाता है। ह
पुराण-महिमा
[ पूज्यपाद श्रीदेवराहा घाबाजी महाराजके अमृत-वचन ]
भारतीय संस्कृतिके मूलाधारके रूपमें वेदोंके अनन्तर पुराणोंका ही सम्मानपूर्ण स्थान है। वेदोंमें वर्णित अगम रहस्योतक जन-सामान्यकी पहुँच नहीं हो पाती, परंतु भक्तिरस-परिप्लुत पुराणोंकी मड्जलमयी शोक-निवारिणी, ज्ञान-प्रदायिनी दिव्यं कथाओंका श्रवण-मनन, पठन-पाठन कर जन-साधारण भी भक्ति-तत््वका अनुपम रहस्य सहज ही जान लेते हैं। वायुपुराणमें कहा है-- यस्मात् पुरा हयनतीद॑ पुराणं तेन तत् स्मृतम् ! निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः अमुच्यते ॥ (१।२०३) 'प्राचीन कालसे प्राणित होनेके कारण यह पुराण कहा जाता है। जो इसकी व्याख्या जानता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।' महाभारतमें कहा है--- 'पुराणसंहिता: पुण्या: कथा धर्मार्थसंश्रिता: ।'
अर्थात् पुराणोंकी पवित्र कथाएँ धर्म और अर्थको देनेवाली हैं। अध्यात्मकी दिशामें अग्रसर होनेवाले कल्याणेच्छु साधकोंको पौराणिक कथाओंके अनुशीलनसे तात्ततिक बोधकी उपलब्धि होती है। साथ ही हृदयमें प्रभु-पाद-पद्मोंकी सच्ची प्रीति अथवा अनुरक्तिकी मन्दाकिनी प्रवाहित हो उठती है | परमात्म-दर्शनके लिये अथवा शारीरिक एवं मानसिक रोग-निवृत्तिके लिये श्रद्धापूर्वक अत्यन्त कल्याणकारी पुराणोंका पारायण करना चाहिये |
पञ्चम वेदके रूपमें दिव्य पौराणिक ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्माजीके द्वारा अभिव्यक्त हुआ--
इतिहासपुराणानि पश्चमं॑ वेदमीश्वर: । सर्वेभ्य एव वक्कत्रेभ्य: ससृजे सर्वदर्शनः |
(श्रीमद्भा० ३। १२। ३९) इतिहास और पुराण-रूप पाँचवें बेटको उन समर्थ
(आदिपर्व १११६) सर्वज्ञ ब्रह्माजीने अपने सभी मुखोंसे प्रकट किया |
नेः है पितृर्णां नी देवर्षिभूताप्तनूणां पितृर्णा न किछ्डरो नायमृणी च राजन्। सर्वत्मिना यः शरणं शरण्यं गतो मुकुन्द परिहत्य कर्तम्॥ (श्रीमद्भा० 9५ । 3 427१] ५| ४१९)
* सदा सेव्या सदा ध्येधा कथा पौराणिकी शुभा «
[पुराणक्रथा-
पुराण सर्वशाह्नाणां प्रथम ब्रह्मणा स्पृतम्। अनन्तरं च वक्त्रेष्यो वेदास्तस्थ विनिर्मता: ॥ (मंत्यपुराण ५३। ३) “ब्रह्माजीनी समस्त शाघ्तोमें सर्वप्रथम पुराणोंका स्मरण-उपदेश किया । पीछे उनके मुखसे वेद प्रकट हुए ।' लोकभाषामें वर्णित होनेके कारण वेदोंकी अपेक्षा पुराण अधिक लोकप्रिय हैं | उनमें प्रतिपादित मधुयातिमधुर आख्यानों एवं कथाओंकी सश्नद्ध चर्चा राजमहलसे लेकर झोपड़ीतक होती है। राजनीति, धर्मनीति, इतिहास, समाज-विज्ञान, ग्रह- नक्षत्र-विज्ञान, आयुर्वेद, अलझ्डार, व्याकरण, भूगोल, ज्योतिष आदि समस्त विद्याओंका प्रतिपादन पुराणोमें हुआ है । भारतीय संस्कृतिका विशिष्ट ज्ञान हमें पुराणोंद्वार प्राप्त होता है। इसके द्वारा भारतीय ग्रतिभाका उत्कृष्ट फल प्रतिफलित होता है। ब्रह्मविष्णवर्करुद्राणां माहात्म्य भुवनस्य च। सर्सहारप्रदानां च. पुराणे प्रद्चवर्णके ॥
धर्मश्चार्थश्ष कामश्न मोक्षश्नेषात॒कीर्यते सर्वेष्षपि पुराणेषु यद्विरुद्धं च यत्फलम ॥ (मल्यपु० ५३ (६५-६६) पाँच लक्षणोंवाले सभी पुराणोंमें सृष्टि ओर संहार करनेवाले ब्रह्म, विष्णु, सूर्य और रुद्रके तथा भुवनके महित्यका वर्णय किया गया है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षका भी इनमें विस्तृत विवेचन किया गया है इनके विरुद्ध आचरण करलेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका भी निरूपण किया गया है ।' अतः पुरुषार्थ-चतुष्टय-प्रदाता दिव्य ज्ञान-कोष पुएाणोंका सेवन हमारा परम अभीष्ट होना चाहिये। आयुष्णतां कथां कीर्तयन्तो माडुल्यानीतिहासपुराणानि। (आश्चलायन, गृह्मसूत्र ४ | ६) चिरंजीबी मनुष्योंकी कथाएँ और माज्नलिक इतिहास- पुएणोंका पाठ करते हुए समय-यापन करें | ह प्रेषक--श्रीमदनजी शर्मा शास्त्र
पुराणोंका महत्त्व
( पूज्यपाद श्रीप्रभुदत्त बह्यचारीजी महाराज )
तुलसीकानन यत्र यत्न पद़ावनानि च।
पुराणपठ्न यत्र तत्न संनिहितो हरिः 5॥]
पुएण शब्दका अर्थ है--जो वृत्तान्त पहले हो गया हो, उसका जिसमें वर्णन हो वही पुराण है। पुराणोंके अनेक भेद हैं---पुराण, महापुराण, उपपुराण आदि।
पहले हम समझते थे कि पुराणोमें कथाएँ ही होंगी, परेसु जब हमने पुराणोंका श्रवण-अध्ययत किया तब तो हम चकित रह गये। संसारका ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं,जो पुराणोमें न हो। हम च्याकरणका गन्थ केवल अष्टध्यायीकी ही समझते थे, किंतु नारदपुराणमें व्याकश्णका इलोक-बद्ध ऐसा विवरण है कि उसे कण्ठस्थ करके मनुष्य पूर्ण बैयाकरण बन सकता है। जितने काव्य-ग्रन्थ लिखे गये हैं, वे सब पुराणोंकी कथाके ही आषाै। पा के दे पी पुणे है एन एन पश्णाशा हैं। पुराण तो बेदोंसे भी पुराने हैं। हमने एक बार
९०जहाँ तुलसीका सघन वन हो, जहाँ कमलके २-अष्टादश पुराणानि ये: शुणोति नेरोत्तमः (फंथवद
कुण्ड हों और जहाँ पुणणोका नित्य पाठ होता गेट वा विधानेत नेह भुगः से जगत
पुराण-सत्र किया था। यह ३०-४० वर्ष पुरानी वात है। तबसे अबतक हमारे यहाँ निरन्तर पुराणोंकी कथा क्रमशः नित्य- मनियमसे होती रहती है। साक्षात् भगवानसे ही जीवेंके, संसास्से निस्तारके मिमित व्यास-रूपसे अवतार ग्रहण करके पुराणोंका व्यास करके संगर किया। इन पुणणोंके पढ़ने तथा सुननेसे मगुष्यकि पाणोंका क्षय होता है! पुराणोंके पठन-पाठनसे यह धर्म है, यह अधर्म है---इसका ज्ञान होता है, सदाचार क्या हैं, इसकी भी प्रवर्तन होता है और मनुष्योंकी मति भगवानकी भक्तिमें लगती है । नास्टपुएणमें कहा गया है कि जो अंठारह पुणाणोकर सुनता है अथवा विधानपूर्वक कहता है, उसकी मुक्ति हो जाती
सु आओ है, वह फिर जन्म-मरणके चक्करसे सदा-सनेदाक लिये छूट
जाता है।'
ता हो, वहां श्रीहगिकी संतिधि है। ॥(जारग्टीय)
अड्डू ] # पुराणोंकी प्रामाणिकता, दार्शनिकता और महत्ता * ३५ फर्क फ्फफ फफ्रफफफफकफकफ फ फ़फफअफ फफक्फ फफ्फ फ कफ फ फऋ्फ्फफ़फफफम कफ ऊफफ फ फरफक फक फऋ फफ फ्फफक फ़ फफऊ फ़कक फ फ्फ फ ऊ क्रफ फ्रफफ कऋफफ कफ कफ फ कक क अफ्र क्फ्रर फफ्फ कफ ऋऊफ फफ्रफ के.
इसीलिये कहा है कि पात्र देखकर ही पुराणोंको सुनाना चाहिये। अपात्रोंको सुनानेसे वे लोग अर्थका अनर्थ करने लगते हैं। जो सुपात्र हो, श्रद्धावान् हो, वही पुराणोंके सुननेका अधिकारी होता है। इसलिये जो दम्भी हो, पापी हो, देवताओं और गुरुओंका निन्दक हो, साधुओंका द्वेषी हो, शठ हो ऐसे लोगोंको पुराणोंका उपदेश नहीं देना चाहिये। जो शान्त- स्वभावके हों, जिनके चित्तमें भगवान् रामकी भक्ति हो, जो सेवा-शुश्रूषामें रत हों, निर्मत्सर हों, पवित्र हों तथा सद्वैष्णब
हों, उन्हींको पुराणोंका उपदेश देना चाहिये ।'
पुराणोंकी कथाएँ रोचक भी हैं, भयानक भी हैं और यथार्थ भी हैं। इनसे सदुपदेश मिलते हैं। पुराणोंकी सत्कथाओंका संग्रह करके प्रकाशित किया जाय तो लोगोंका बड़ा कल्याण हो | वास्तवमें पुराण ओर महाभारत--ये पञ्चम वेद ही हैं। जिन स्त्री, शूद्र तथा द्विज-बन्धुओंको वेदाध्ययनका अधिकार नहीं है, वे इन पञ्चम वेदसे ही वेदोंका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि ये वेदोंके भाष्य ही हैं।
पुराणोंव्ही प्रामाणिकता, दार्शनिकता और महत्ता
(स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज)
पुराणोंकी प्रामाणिकता
'पुराण' शब्दका अर्थ पुरातन या आआचीन है। मन्त्र- ब्राह्मणात्मक वेद अनादि, अपौरुषेय हैं। श्रीव्यासादिविरचित पुराण अर्थतः अनादि होते हुए भी पौरुषेय हैं। प्रजापति पितामहको सर्वप्रथम पुराणोंका स्मरण हुआ, पुनः वेदोंका। इस प्रकार वेदोंकी अभिव्यक्तिकी अपेक्षा पुराणोंकी अभिव्यक्ति पुरातन होनेके कारण पुराणको “पुराण' कहा गया है। पोरुषेय-अपौरुषेय भेदसे पुराण दो प्रकारके हैं। पौरुषेय पुराण श्रीवेदव्यासादिविरचित हैं। अपौरुषेय पुराण अष्टविध ब्राह्मणान्तर्गत होनेसे वेदात्मक हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद ओऔर अथर्ववेद--ये चार प्रकारके मन्त्र-समुदाय हैं । इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र (वस्तुसंग्रहवाक्य), आनुव्याख्यान (मन्त्रविवण) . और व्याख्यान (अर्थवाद) --ये अष्टविध ब्राह्मण हैं । इनमें 'असद्ठा इदमग्र आसीत' (तैत्तिरीिय २।७। १) आदि जगत्कारणके ख्यापक ब्राह्यणवचन पुराण हैं। “शतपथब्राह्मण ११५॥५॥। १ आदिके उर्वशी-पुरुखा-संवाद और प्राणादि-संवाद इतिहास- लक्षणात्मक हैं। चारों प्रकारके मन्त्रसमुदायसहित अष्टविध ब्राह्मण परमात्माके बुद्धि-प्रयत्न-निरपेक्ष निःश्वास॒हैं। बृहदारण्यक (२।४। १०) में इनका वर्णन इस प्रकार प्राप्त होता है--
स यथार्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा
१- न दाम्मिकाय पापाय देववगुर्वत्यनुसूयवे | देये कदापि साधूनां द्वेषिणे न शठाय च॥
अरेउस्थ महतो भूतस्य निश्चसितमेतद्यदृग्वेदी यजुर्वेद: सामवेदो<5थर्वाड्रिसस इतिहास: पुराण विद्या उपनिषदः एलोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निश्चसितानि ।
ऋषिप्रणीत रामायण-महाभारतरूप इतिहास और विष्णु, ब्रह्म आदि अष्टादश पुराण पञ्चम वेद हैं। इनका वर्णन अन््थोंमें इस प्रकारसे उपलब्ध होता है--'ऋग्वेदं भगवोःध्येमि यजुर्वेद सामवेदमाधर्वर्ण चतुर्थमितिहासपुराणं पक््थमं०* ०! (छान्दोग्यणन ७।१।२), “इतिहासपुरा् पञ्चमं॑ बेदानां वेद: (न्यायदर्श ४।१।६२ वात्थायनभाष्य), 'इतिहास-पुराणं चर पञ्चमो वेद उच्यते' (श्रीमद्धा” १ |४। २०) ।
उक्त स्थलोमें निर्दिष्ट इतिहास, पुराण ब्राह्मणप्रभेद नहीं माने जा सकते, क्योंकि पञ्चम वेदके रूपमें और व्याकरणादिके संदर्भमें उनका उल्लेख है---
इतिहासपुराणाभ्यां वेद समुपबृंहयेत् . ॥
बिभेत्यल्पश्रुतादवेदी मामय प्रहरिष्यति ।
(महा० आदिपर्व० १॥२६७-२६८)
'इतिहास और पुराणोंकी सहायतासे ही वेदोके अर्थका विस्तार एवं समर्थन करना चाहिये। जो इतिहास और पुराणोंसे अनभिज्ञ हैं, उससे वेद डरते हैं कि यह
मुझपर प्रहार कर देगा। इतिहासपुराणाख्यमुपाड़ंं' न
छकक- 7-77
शान्ताय शमचित्ताय शुश्रूषाभिरताय च ।निर्मत्सराय शुचये देये सद्वैष्णवाय च ॥(नारदीयपुराण)
7 ॥ |
६
एक ाव ०७७७3 स५७७७७७७७३३७७०४०७+डउअ४५७ररअ ५४0७७ ७५५७७७७फ+ए७ए3४४५०५द ्रकफऋकऋकफ्रफफफ्क फफक 'ऋक्फ्रामक
प्रकीर्तितम!' (सीतोपनिषद्) । “इतिहास और पुराण उपाड़ कहे गये हैं” इन वचनोंके अनुसार मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदसे पृथक् इतिहास, पुराणका बोध प्राप्त होता है। 'इतिहास- पुराणानामुन्मेष॑ निर्मित च यत्' (महा" आदि० १।६३), 'जयो नामेतिहासोइ्यम! (महा० आदि" ६२ ।२० ) 'पुराणपूर्णचनद्रेण श्रुतिज्योत्त्रा: प्रकाशिता:' . (आदि० १८६) आदि वचनोंके अनुसार महाभारत जहाँ इतिहास सिद्ध होता है, वहाँ पुराण लक्षणलक्षित होनेसे पुराण भी | पुराणोंमें लोकवृत्तका ग्रतिपादन--न्यायदर्शनके वात्थायन-भाष्यमें कहा गया है--बेद, धर्मशास्र तथा पुराण--इनके मुख्य विषय भिन्न-भिन्न होते हैं। जिस प्रकार रूपमें चक्षु, रसमें रसना, गन्धमें नासिका, स्पर्शमें वक् और शब्दमें श्रोत्रका ही प्रामाण्य है, उसी प्रकार अपने-अपने विषयमें श्रुति-स्पृति और पुराण तीनों ही प्रमाण हैं। केवल एकसे काम. नहीं -चलता | बेदका मुख्य प्रतिपाद्य विषय यज्ञ है। यज्ञमें देवपूजा, देवसम्बन्धी सड़तिकरण और देवविषयक दानादिका संनिवेश है। इतिहास-पुराणोंका मुख्य विषय है लोकवृत्त (चरित्र) -प्रतिपादन । लोकव्यवहारकी व्यवस्था बताना यह धर्मशास्त्रका प्रधान विषय है। लिखा है---
“विषयव्यवस्थानाच्व यथाविषयं प्रामाण्यम्ू। अन््यो मन्त्रत्राह्मणस्य विषय:, अन्यश्न इतिहासपुराणधर्मशारत्राणाम् इति, यज्ञों मन्त्रब्नाहणस्य, लोकवृत्तमितिहासपुराणस्य, लोकव्यवहारव्यवस्थायनं धर्मशासत्रस्थ विषयः, तत्रैकेन न सर्व व्यवस्थाप्पत इति, यथा विषय एतानि प्रमाणानि इन्द्रियादिवदिति' (४।१॥। ५२ न्यायदर्शन वाल्यायन-भाष्य) ।
यही कारण है कि धर्मशास््रविरुद्ध पौरणिक और ऐतिह्य चरित्र अनुकरणीय नहीं होते। तभी तो कहा है-- .
अतिरक्ततया नार्या त्वक्तान्यललनास्पृहः ।
सीतायां रामबत्सोउयमनुकूल: प्रकीर्तितः ॥ राधायामेव कृष्णस्थ॒ सुप्रसिद्धानुकूलता ।
तदालोके कदाप्यस्थ नान्यासडु: स्मृति श्रजेत् ॥ (उज्ज्वलनीलमणि, नायकभेद २२-२३)
वर्तितव्य॑ शमिच्छदूभिर्भक्तवन्न तु कृष्णवत् ।
इत्येव॑ भक्तिशार्त्राणां तात्पर्यस्थ विनिर्णय: ॥
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
करकफकफ कफ
[पुराणकथा-
'कऊआ, फ्
रामादिवद्ट्तितव्य॑भ क्वचिद्रावणादिवत् । इत्येष मुक्तिधमांदिपएाणां. नय इष्यते ॥ (उज्ज्चलनीलमणि, हरिवल्लभा २३-२४) श्रीरमचन्रजी जिस प्रकार एकमात्र श्रीसीतादेवीमें अनुरक्त थे, ठीक उसी प्रकार जो अन्य-ललनाविषयक स्पृह्का परित्याग कर एक ख्रीमें अत्यन्त आसक्त होता है, वह (नायक) अनुकूल माना जाता है। श्रीराधामें श्रीकृष्णकी अनुकूलता प्रसिद्ध है। राधिकाके अवलोकन करनेपर उनका अन्य ख्रीविषयक सड़ स्मृतिपथमें स्फुरित नहीं होता।' कल्याणेप्सुओंको चाहिये कि वे भगवदभक्तोंके सदुश आचरण करें, कभी भी श्रीकृष्ण-सद्श आचरण न कों। भक्ति-मुक्तिके पथिकोंको रामादिकी भाँति व्यवहार करना चाहिये, कभी भी रावणादिके समान आचरण नहीं करा चाहिये । भक्तिशास््रोके तात्प्यका यह निचोड़ है। समस्त . वेदों, पुराणों, स्मुतियों, इतिहासों, तर्कों और आगमोंका परम तात्पर्य जगत्कारण परमात्मतत्तके परिमार्गणकी योग्यता प्रदान कर उस खप्रकाश-परमात्मतत्तमें आत्मबुद्धि उदित करनेमें ही चरितार्थ है। सृष्टिश्रुत और सृष्टिप्रतिपादक वचनोंका तात्पर्य स्रष्टा परमात्माका आत्म और आत्मीयभावसे भजन करनेमें ही चरितार्थ है । श्रीमद्धागवतादि पुराण भक्ति, ज्ञान, विरगलक्षण, प्रारमहंस्यधर्म--नैष्कर्म्यके प्रतिपादक हैं। इनमें आदि, मध्य, और अन्तमें वैराग्य उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी अमृतस्वरूप कथाएँ हैं। उनसे सत्पुरुषों और सुरोंको सुरदुर्लभ अनुपम आनन्द मिलता है। सर्ववेदान्तसार अद्वितीय ब्द्यात्मतत्त पुराणोंका प्रतिपाद्य विषय है। ये कैवल्यैक-प्रयोजन हैं। जेसे दिव्य अमृत पान करनेपर कुछ भी पान करना शेष नहीं रहता, वैसे ही सर्ववेदान्तसार पुराणोंको जान लेनेपर जिज्ञासुके लिये और कुछ भी जानना शेष नहीं रहता | जो दाम्मिक, नास्तिक, शठ,श्रवणके प्रति अश्रद्धालु, अभक्त और उद्धत न हो प्रत्युत ब्राह्मणभक्त, प्रिय, साधुस्वभाव, पवित्र हो, वह पुगण- श्रवणका अधिकारी है | यदि शूद्र और ख्री भी भगवानके प्रति भक्तिभावसम्पन हों तो वे भी पुरण-श्रवणके अधिकारी है आदिमध्यावसानेषु. चैराग्याख्यानसंयुतम ।
हरिलीलाकथात्रातामृतानन्दितसत्सुरम्
फ्रऋक'
हनी मिमनीज अनिल नकल
क्रफ्ऊ (“224 फऋफ्क़्भ्कक, आकर ऊरा, फ्रऊऊऋऊ कर
सर्ववेदान्तसारं यद् ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम् । वस्त्वह्वितीय॑ तल्ष्ठ कैवल्यैकप्रयोजनम् ॥ (श्रीमद्धार १२। १३ । ११-१२) श्रद्धापूर्वक दत्ताचित होकर नित्य पुराण-श्रवण करनेका फल भगवत्खरूपमें परा भक्ति
€ पुराणकी महिमा एवं माहात्य *
और उसके प्रभावसे कर्म- “+--+++&97४२%-
3०2
ऋष ऊतक कफ फ्रफ्रफक्फकअफ्आ अफ कक जूक 64 कह इह ता हजा ब्
बन्धनकी निवृत्ति है--
य एतच्छुद्धया नित्यमव्यप्र: शृणुपालरः ।
मयि भक्ति परां कुर्वन् कर्मभिर्न स बध्यने ॥ (प्रीमद्धा ११॥२९०।८०८:
ल्-+ क्रमश.)
ला
महिमा एवं माहात्म्य (अनन्तश्री स्वामी मराधवाश्रमजी महाराज)
'पुराण' शब्द सुनते ही जिज्ञासा उतने होती है कि पुराण क्या है? इसका अर्थ क्या है? अनेक अन्धोंमें इसकी व्याख्याएँ की गयी हैं। उन्हींके आश्रयणसे हम यहाँ इसपर बिचार कर रहे हैं।
'पुरा अपि नर्व पुराणम से प्रतीत होता है कि पुराना होनेपर भी जो नवीन हो वह पुराण है। निरुक्तकार व्याख्या करते हैं--'पुराणमाख्यान पुराणम आर्थात् जिसमें प्राचीन आख्यान हों, वह पुराण है। वायुपुराण 'बस्मात पुरा हानतीदे पुराणं तेन तत् स्मृतम-: (१) ९ । १८३) के अनुसार-- जो पूर्वमं मी सजीव था, वह पुणण कहा गया है। देवीभागवत (१।२।१५८)में पुराणोंके पाँच लक्षण इस अकार कहे गये हैं--
सर्गश्च प्रतिसर्गश्ष वंशो मन्वन्तराणि च। . _ बंशानुचरितं चैब पुराण पद्चलक्षणम्॥
पुगण भी वेदार्थके ही बोधक हैं। पुराणोमें वेदोंकी व्याख्या विविध कथा-दृष्टन्तोंद्रार की गयी है। पुराणोंके ज्ञानके बिना वेदोंका भी ज्ञान पूर्णरूपेण नहीं हो सकता । इसके विषयमें नारदपुराणका वचन द्रष्टव्य है-- वेदा: प्रतिष्ठिताः सर्वे पुराणेष्वेष सर्वेदा। (नारदं० उ० २४। १८) 'बेद पुराणोमें ही प्रतिष्ठित हैं इसमें कोई संशय नहीं है ।' वेदकी व्याख्या इतिहास और पुराणोंसे ही की जा सकती है।
इतिहासपुराणाभ्यां वेद समुपवृहयेत् । वायुपुरण (१११॥१८०) में भी यह वचन मिलता यो विद्याच्चतुरों वेदान् साड्रोपनिषदों द्विजः। न चेत् पुराणे स विद्यात् नैव स स्थाद् विचक्षण: ॥
'जो द्विज अड्लॉसहित चारों वेदोंको जानता है, क्रितु पुराणोंको नहीं जानता, वह पण्डित कदापि नहीं हो सकता। श्रीमद्धागवतमें भी स्पष्ट कहा गया है--'इतिहासं पुराण च पद्ञमो खेद उच्यते ।' इतिहास और पुराणोंको पाँचवाँ वेद कहा गया है। ४
पुराणोंमें तीर्थ-ब्रत-अनुष्ठान
पुणाणोंमें काम्यादि अनुष्ठानोंका वर्णन अनेक स्थलोपर है और प्रत्येक आख्यानके अन्तमें उस आख्यायिकाकी फल भी रहती है। प्रायः सभी पुराणोंमें यही शैली प्रशस्त है। कक पुराणोंका परम तात्पर्य अद्दैत ब्रह्ममें ही है तथापि अवान्तर तात्पर्य अनेक काम्यादि कर्मो्मे भी है। अतएव इसी संदर्भपें तीर्थोका माहात््य एवं तीर्थस्नान, तीर्थमें दान-पुण्य तथा ै करनेकी विधि वर्णित है। ये
पुराणोंमें धर्म-निरूपण एवं निर्णय पुराणोंमें विविध विद्याओंके साथ वर्णश्रमधर्मका विविध संस्कारोंका, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष तथा ँ शास््रादिका वर्णन प्रचुर मात्रामें है। पुराणोंकि बिना बे गति होनी सम्भव नहीं । यह निश्चय समझ लेना चाहिये
महाभारतमें कहा गया है-- पुराण भी वेदवत् ही प्रमाण माने जाते है। >- ->कय)०८छ०परसू0 २€६-+--- रामकथा... सुंदर करे तारी । संसय बिहग उड़ावनिहारी रामकथा. कलि बिटप कुठारी । सादर सुनु | न् ि 5:८०--->> |
गिरिराजकुमारी ॥
३८
अजिजीसीमअअअफऊअफ्रमऊ क्क कक डी भास शक अतीफफ्रफ श् कफ फकफ कफ फ फू फ कफ फफफ फफ फ कफ कक फफ कफ फ्रर फऋकफ़रफफफऊ फ फ़ कफ कफ कफ फ़चप् ऊ फ़क कप कफ क कफ फ अभमक अक्रकऊ ऋक्रक्र कक # क्रमश रा फ ऋभफ फ्फ शफ फ फ कफ क कफ फक फफ फ्फफ फ फफ क्र फ फ क फफ कफ फर्क
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा «
[पुराणकूधा-
फेक क कुक पा ऋ पा फपप काका 5४ क पक कफ कफ क कफ कफ हु छ एक कप
भारतीय पुराणोंका महत्त्व (श्री १०८ दण्डी स्वामी श्रीविपिनचद्धानन्द सरस्वतीजी “जज स्वामी' )
'पुराण' भारतवर्षकी बहुमूल्य निधि हैं, जिनका महत्त्वपूर्ण परिचय सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद्के सप्तम अध्याय (१।२) में इस प्रकार मिलता है--'शोकाकुल नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये और उनसे आत्मज्ञानकी जिज्ञासा की। सनत्कुमारजीके यह पूछनेपर कि “आप पहलेसे क्या-क्या जानते हैं?' नारद मुनिने उत्तर दिया कि “मैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेदके अतिरिक्त पञ्चम वेद इतिहास, पुराणादि तथा अन्य अनेक शास्त्रों, विद्याओंसे परिचित हूँ।' तब सनत्कुमारजीने परोवरीय (उत्तरोत्तर उत्कृष्ट) -क्रमसे शब्द-ब्रह्मका. परबहारूप . भूमसंज्ञक आत्मतत्त्में ही परम तात्पर्य बताकर, शोकापहारक भूमाविद्या- रूप आत्मज्ञान प्रदान कर देवर्षि नारदकों कृतार्थ किया। आधुनिक समयमें भी भारतके प्राचीन इतिहासकी शूह्बला बिठानेमें पाश्चात्य विद्वानोंने पौराणिक सहायता प्राप्त की है। भारतीय साहित्य और धर्मशास्त्रोंमें पुरणोंका अत्यन्त आदरसे स्मरण हुआ है और उन्हें प्रबल प्रमाण भी माना गया है।
वेदव्यासद्वारा विरचित पुराण आख्यायिकाओं, विद्याओं, कथाओं और इतिहासोंके संग्रहरूप ग्रन्थ हैं, जो प्रायः श्लोकबद्ध हैं और वैदिक सिद्धान्तोंकी व्याख्यारूप हैं। इनकी भाषा इतनी सरल है कि सर्वसाधारणजन भी क्लिष्ट दार्शनिक
श्रीमदभागवतपुराणको व्यासजीसे प्राप्त किया। राजा
परीक्षित्का कल्याण श्रीमद्भागवत महापुराणके श्रवण और मननसे हुआ। तबसे यह महापुराण सर्वसाधारणके लिये परम कल्याणका साधन बन गया।
सारांश यह है कि हमारे वेदोंमें शाश्रत सत्य परमतत्लका सर्वोत्तम प्रामाणिक वर्णन है। मन्वादि स्मृतियोंमें हमारे धर्माचार एवं शिष्टाचास्का वर्णन है। कर्तव्याकर्तव्यका ज्ञान मन्वादि धर्मशास्रोंके द्वारा होता है। जो सजन बुद्धिमान्य, प्रमाद, करणापाटव, दुराग्रह, दुरित अथवा विधिवत शिक्षाके अभाव आदि प्रतिबन्धों--दोषोंके कारण श्रुति-स्मृतियोंके रहस्योसे अपने कल्याणका मार्ग प्रशस्त नहीं कर पाते, उन्हें सुगमता- पूर्वक श्रुति-स्मृतियोंके अभिप्रायकों सरलतासे हृदयज्ञम करानेके लिये पुराणोंका निर्माण हुआ है, जिनके श्रवणसे प्रतिबन्ध कट जाते हैं और कल्य्ाणकामी सन शोध और सुगमतापूर्वक श्रेयोमार्गपर आरूढ़ हो जाते हैं | पुराणोंके नित्य श्रवण और मननसे शिष्टाचार और सभ्यताको उत्तम शिक्षा प्राप्त होती है, जिससे मनुष्य इस जगत्में पाप करनेसे निवृत हो जाता है और परलोकमें सदगति प्राप्त करता #। इनमे: अतिरिक्त मन्त्र, तन्त्र, यन्त्र, ज्योतिष-विद्या, युद्ध-विद्या आदि भी पुराणोंके माध्यमसे सीख सकते हैं।
अड्डढ]
« सिद्धोंकी पोराणिक प्रासंगिकता *
३९
अमल न! म्णण्य््न्ण््ग्ण्ण्ण्ब्ग्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्ण्णशशंःाणा फ्क्रफफ़ फफ़फफफफफ फक््फ्फफ़कऊऊ फरफफफफ फफ फक्फ #र् श्रकफ्रफकफ्फऊ फफ्रफफ्रफऋफ फफफ्फ कफ फफ भ्र फ क्र फ कक फ्रफफफ्ररफऋ कफ ्ऋफऊ
फफ्फफ़फफ़फ ऋषफ फफ | फ्रफ फ्फधफफ कफ कफ फ फ्फफ कफ फ कफ कह कहक कै
अब हम कुछ पौराणिक कथाओंकी सम्यक् विशेषता बतलाकर इस लेखको समाप्त करते हैं। जैसे वेदकी आज्ञा है--'सत्ये बद, धर्म चर' (तैत्तिय १।११। १), इसका पूरा-पूरा पालन राजा हसिश्विन्द्र, भगवान् राम ओर बलिके द्वारा पुराणोंमें दर्शाया गया है। 'अतिथिदेवो भव' (तैत्तिरीय १॥११।२) के उदाहरण राजा शिवि और रन्तिदेव माने गये हैं। ब्रह्मचर्थ-पालन करनेकी बैदिकी आज्ञाका अनुपम उदाहरण कपिल, भीष्म, हनुमान, शेकराचार्य एवं अर्जुन आदि हैं। इन प्रसिद्ध कथाओंका विस्तृत वर्णन यहाँ करना उपयुक्त नहीं होगा ।
अब पौराणिक राजाओंकी न्यायनिष्ठाके सम्बन्धमें एक विलक्षण कथाका वर्णन किया जाता है--कैशिनी नामकी एक सुन्दर राजकुमारीको राजा प्रह्लादके पुत्र वियेचन और बृहस्पतिके पुत्र सुधन्वा--दोनों वरण करना चाहते थे। केशिनीने कहा--'तुम दोनोंमें जो श्रेष्ठ होगा, उसीसे मैं विवाह करूँगी ?' दोनों लड़कोने श्रेष्ठ होनेका दावा किया। गुरुपुत्रने ब्राह्मण होनेके कारण अपनेको श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहा तथा विरोचनने राजपुत्र क्षत्रिय होनेके हेतु अपनेको श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहा और शर्त यह ठहरायी गयी कि जो श्रेष्ठ सिद्ध होगा, उसके साथ कन्या केशिनीका विवाह होगा और वह असफल लड़केका प्राण ले लेगा | निर्णयके लिये प्रह्मादके पास दोनोंने
जाकर अपना अभिप्राय सुनाया तथा प्राणोंकी बाजीकी शर्त भी बता दी। प्रह्मदके सामने आश्चर्यजनक समस्या उपस्थित हो गयी--एक ओरे प्रिय पुत्र विरोचनके प्राणहरणकी सम्भावना तो दूसरी ओर उचित निर्णय देकर न्यायरक्षा कर कर्तव्य- निर्वाहका दायित्व। विचार कर ग्रह्वादने निर्णय दिया कि 'मुझसे अड्डिरा ऋषि श्रेष्ठ हैं और तुमसे सुधन्वा श्रेष्ठ है ।' ऐसा निर्णय देकर प्रह्नादने अपने पुत्रको ब्राह्मणको अर्पित कर कहा--“ऋषिकुमार ! इसका जीवन अब आपकी इच्छाके अधीन है।' यह सुनकर ऋषिकुमारने कहा कि 'ऐसे निष्पक्ष न्यायकारी राजाके पुत्रका विनाश कैसे हो सकता है ? इसे हमने क्षमा किया।' न्यायकर्ता प्रह्मादके पुत्रकी रक्षा हुई। पुराणोंमें ऐसे ओर कई आख्यान हैं। पर क्या इस प्रकारका न्याय कोई कर सकता है ? अपने और सम्बन्धियोंके लिये आज न्यायकी हत्या की जाती है । छल-कपटका आश्रय लेकर हितकर कानूनको भी बदलनेकी दुष्प्रवृत्ति देखी जाती है । ऐसी
परिस्थितिमें पुराणोंके पठन-पाठन, मनन और आदर्श चरित्रों- का प्रचार एवं प्रसार परमावश्यक है। यदि पुराण न हों तो भारतीय सभ्यता एवं महत्ताका प्रमाण क्या रहेगा ? तथा बिना सभ्यता एवं संस्कृतिके देशका क्या अस्तित्व होगा ? यही भारतीय पुराणोंकी महत्ताका रहस्य है।
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सिद्दोंव्दी पोराणिक प्रासंगिकता
(गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्रीअवेद्यनाथजी महाराज)
तपःपुझ्न॒ परम कारुणिक महर्षि व्यासरचित अठारह पुराण तथा उपपुराणादि समग्र सार्वभौम आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा सामाजिक आदि जीवन-दर्शनके जीवन्त भाष्य अथवा विश्वकोष हैं। पुराणोंमें भारतीय सांस्कृतिक सम्पत्ति सुरक्षित है। योगदर्शन ही नहीं, विशेष परिप्रेश्ष्यमें महायोगी शिवगोरक्ष--गोरक्षनाथजीद्वारा संरक्षित शिवोपदिष्ट नाथयोगामृत और अनेक नाथसिद्धयोगियोंके साधनामय जीवनके यत्र-तत्र सहज यथावश्यक संदर्भसे यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी रहनी-करनीमें कितने व्यापकरूपमें पौराणिक प्रासंगिकताएँ भरी पड़ी हैं। स्कन्दपुराणके काशीखण्ड, नारदपुराण, मार्कप्डेयपुराण,
ब्रह्मवैवर्तपुरण, वायुपुराण, पद्मपुराण, श्रीमद्भागवतपुराण ब्रह्माप्डपुराण आदियमें सिद्धयोगियों और उनकी साधना-पद्धति तथा योगकी सामान्य उपादेयताओंका निरूपण इस तथ्यका संकेत है कि उनमें योग ओर सिद्धोंके सम्बन्धमें कितना उदार दृष्टिकोण परिलक्षित है।
गेरक्षसिद्धान्तसंग्रहमें त्रह्माण्डपुरणके ललिताखप्डमें ललितापुरवर्णनमें योगमहाज्ञान-चिन्तनमें तत्पर महायोगी गोरक्षनमाथ और अनेक सिद्धसमूह, दिव्य ऋषिगण तथा प्राणायामपरायण योगियोंके प्रसंग मिलते हैं।
ललितापुरके उत्तरकोणमें अत्यनः है। उस लोकमें वायुशरीरधारी, मः
वायुलोक द्धसमूह,
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
[पुराणकथा-
दिव्य ऋषिगण, प्राणायामके अभ्यासी दूसरे योगी तथा योगपरायण, योगमहाज्ञानचिन्तनमें तत्पर श्रीगोरक्षनाथजी आदि अनेकानेक योगियोंके समुदाय निवास करते हैं। श्रीमद्धागवतपुराणमें, बातरशना मुनियोंके संदर्भमें, नाथसिद्धोंके सम्बन्धमें यथेष्ट प्रकाश पड़ता है। वातरशनाकी यह परम्परा ऋग्वेद (१०।१३६) में परिलक्षित है जो प्राणायामादि योगिक क्रियाओंमें प्रवृत्त कायादण्डन तथा निवृत्तिप्रधान जीवन-यापनमें विश्वासी और आस्थावान् चित्रित किये गये हैं। श्रीमद्धागवतमें कहा गया है-- कविहरिरन्तरिक्ष: प्रबुद्ध: पिप्पलायन: । आविहत्रोडथ ह्ुमिलश्षमस: करभाजनः ॥ (५।४। ११) श्रीमद्धागवतमें वर्णित नवयोगेश्वरॉँंकी, नवनाथोंकी मान्यतामें शिवगोरक्ष महायोगीकी गणना नहीं की गयी है । उन्हें तो साक्षात् शिवका अवतार शिवस्वरूप कहा गया है आदिनाथ भगवान् महेश्वरने क्षीरसागरमें मणि- प्रदीप्त सप्तशंग पर्वतपर भगवती उमाके प्रति महायोगज्ञानका वर्णन आरम्भ किया। भगवतीके निद्राभिभूत होनेपर मत्स्यके उदरसे निकलकर मस्ेन्द्रनाथजीने यह योगोपदेश सुना। उन्होंने महेश्वरको देवीसहित नमस्कारकर समस्त वृत्तान्तका वर्णन किया। त॑ कल्पयामास सुतं शुभाडने सोत्सड्र आस्थाप्य चुच्॒म्ब वक््त्रम् । सुतो ममायं॑ किल मत्स्यनाथो विज्ञाततत््वोडईसखिबलसिद्धनाथ:._॥ (नारदपुराण उत्तर” ६९ | २३) संतयोगी ज्ञानेश्वरने नारदपुराणके इसी प्रासंगिक उद्धरणके अनुरूप श्रीमद्भगवद्गीताकी टीका ज्ञनेश्वरीके १८वें अध्यायमें वर्णन किया है कि क्षीरसमुद्रके तटपर श्रीशंकरने न जाने कब एक बार शक्ति-पार्वतीके कानमें जो उपदेश दिया था, वह क्षीस्समुद्रकी लहरोंमें किसी मत््यके पेटमें गुप्त मस्व्येन्द्रनाथके हाथ लगा--अचलसमाधिका उपभोग लेनेकी इच्छासे मह्येन्द्रनाथने गोरखनाथको उपदेश दिया।
क्षीरसिंधु परिसरी | शक्तिच्या कर्णकुहरी । नैणाके श्रीत्रिपुरारी । सांगितलेजे । ते क्षीरकल्लोला आंतु। मकरोदरीं गुप्तु । होता तया च्ञा हातु। पैहो जालें ।
७ ०७००+३७०७०/००७०+०७०+०५००००५००९५३+५९ ४ ७ ७ *$ $ ७ ७ ७ ७ ७ ७ ७ #+ ०१ ०००७००००९७
मग समाधि अव्यत्ययां। भोगार्वीं वासना यया ।
ते मुद्रा श्रीगोरक्षराया। दिधलीं मीनीं ॥ (जञनेधरी, अध्याय १८) अवधूत दत्तात्रेयकी तपस्था, योग-साधना और
जीवन-वृत्तान्तका पर्याप्त वर्णन मार्कप्डेयपुराणके अनेक अध्यायोंमें प्राप्त होता है। श्रीमद्धागवतके एकादश स्कन्धमें दत्तात्रेयका वर्णन उनकी योग-साधनाका परिचायक है।. वे श्रीमद्धागवतमें दिष्टभुक्-रूपमें वर्णित हैं | उनका कथन है कि दिन-रातमें जो कुछ मिल जाता है, उसे मैं ग्रहण करता हूँ तथा दिष्ट-जैसा भोग करता हूँ, उससे संतुष्ट रहता हूँ।
वसेउन्यद॒पि सम्प्राप्त॑ दिष्टभुक तुष्टधीरहम् ॥
ह (७ १३। ३९)
मार्कण्डेयपुरणके १७से १९वें अध्यायमें दत्तत्रेयके सम्बन्धमें कहा गया है कि वे सती अनसूया और महर्षि अ्रिके पुत्रके रूपमें प्रकट हुए थे ! उन्होंने कावेरी नदीकें तटपर तथा , सहाद्िक्षेत्रमें तपस्था की थी। मार्कप्डेयपुराणके ३९वेंसे ४१वें अध्यायमें वर्णन है कि उन्होंने मदालसाके पुत्र अलर्कको योगोपदेशामृत प्रदान किया था। उनका कथन है--
समाहितो.. ब्रह्मपरोषप्रमादी
शुचिस्तथैकान्तरतिर्यतेद्धियः समाश्ुयाद् योगमिम॑ महात्मा विमुक्तिमाप्रोति ततः स्वयोगत:॥
मार्कप्डेय. और श्रीमद्धागवतपुराणकी आसंगिकताक परिप्रेक्ष्ममें सिद्ध अवधूत-रूपमें वर्णित माथसिद् दत्तत्रेयने शिवयोगी गोरखनाथको प्रणाम किया है। ।
निःसंदेह पौराणिक आख्यानों और प्रासंगिकताओंमें यथट रूपसे उदारता और सर्वमड्गलमयताका स्वर अक्षर-अक्षरमें अनुप्राणित है |
अड्डू |
* पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् +
४९२
कफकफफफफफफफ्फफफफफकफफफफफफफ फ फफ़फ फफफक कम फसंकक फफकर फ मऊ ऊ साफ कफ फऊसास सास सास सस्च््च्च्च््््ल्ल्ल्ल्ल फकफ फफफफफ+क्रफ््फ्ऋऋफक+ऋ फकफ्फ्फ फफफफ़फ फफफऋफ फफ फ भफ क फ्फ्फफ फ्फ फम फफफ्र फट ऊऊ फफफफफफकफफफअककफ फ्फफक्फफ ५ क फऋफ कफ फफभ४ऋऋफ्रफ्क कफ फ४ कफ फ्काककाप्फक छ़ 0.0 अंश
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् (पं० श्रीलालबिहारीजी मिश्र)
निम्नलिखित श्लोक अनेक पुराणोंमें प्राप्त होता है--
पुराणं सर्वशास्त्राणां प्रथर्म ब्रह्मणा स्मृतम् ।
अनन्तरं च वस्त्रेभ्यो वेदास्तस्य विनिर्गताः ॥
यह श्लोक बहुत महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इससे शास्त्रोका स्वरूप और इनके आविर्भावके क्रमका ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है। इस श्लोकसे परिचित न होनेके कारण ही आज वेद और पुराणके ख्वरूप और कालके सम्बन्धमें अनेक भ्रमपूर्ण मत प्रचलित हो गये हैं। अतः इस श्लोकके अर्थसे परिचित होना अपेक्षित हो गया है। - ह
'कृत', 'स्मृत' और “बिनिर्गत” (श्रुत) अन्थ
उपर्युक्त वचनमें पुराणके लिये 'स्मृत' और वेदके लिये 'विनिर्गत' शब्दका प्रयोग किया गया है। दोनों अन्थोमेंसे किसीके लिये भी 'कृत' शब्दका प्रयोग नहीं है। इन अनुगुण शब्दोंका प्रयोग जान-बूझकर किया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वेदके लिये 'विनिर्गत' शब्दका ही प्रयोग क्यों होता है, 'कृत' और 'स्मृत' शब्दका प्रयोग क्यों नहीं होता ? इसी तरह पुराण आदि शास्त्रोंके लिये 'स्मृत' शब्दका ही प्रयोग क्यों होता है, 'विनिर्गत' या 'कृत' शब्दका प्रयोग क्यों नहीं होता ?
इसका समाधान तभी सम्भव है, जब हम “कृत', 'स्मृत' और “विनिर्गत' शब्दोंके अर्थोकों ठीक-ठीक जान जायेँ। संस्कृत-वाडममयमें ही 'स्मृत' और “विनिर्गत' ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं, अन्य वाडंमयोमें नहीं। अतः अन्य भाषाविदोंके लिये इनकी जानकारी विशेषरूपसे अपेक्षित है।
(क) 'कृत' ग्रन्थ
“कृत' अन्थ वह होता है, जिसके अर्थ और शब्द किसी पुरुषके द्वारा निर्मित होते हैं, जैसे---मालती-माधव, रघुवंश आदि। “'मालती-माधव' भवभूतिकी रचना है। इसके संवाद, सामाजिक चित्रण आदि सभी अर्थ कविकी कल्पनासे प्रसूत हैं। समूची कथावस्तु ही कल्पित है। इसी तरह 'मालती- माधव'के अर्थ ओर शब्द किसी पुरुषद्वारा कल्पित हैं। इसलिये इस ग्रन्थकोी हम 'कृत' कहते हैं। रघुवंशकी कथावस्तु यद्यपि रामायणसे और पुराणोंसे ली गयी है, फिर भी
इसे जो कल्पित माना जाता है, इसका कारण यह है कि कविलोग सरस बनानेके लिये उसके अर्थ और भावोंको अपनी कल्पनासे गढ़ लेते हैं। ध्वन्यालोक आदि आकर- ग्रन्थोने इन्हें ऐसा करनेके लिये आदेश भी दे रखा है। दूसरी बात यह है कि कालिदासने अपने काव्य-रचना-प्रसद्गको रामायण सुन-पढ़कर ही जाना है, ऋतम्भरा प्रजासे उसका स्मरण सा किया, है । अतः रघुवंश वाल्मीकि-रामायणकी तरह 'स्मृत' कोटिमें नहीं आता। इस तरह कवियों एवं विद्वानोंकी कृतियाँ 'कृत” ग्रन्थकी कोटिमें आती हैं। (रब) 'स्मृत' ग्रन्थ
शासत्र दो दलोंमें विभक्त हैं। एक दलका नाम है--'श्रुति' (वेद) और दूसरे दलका नाम है 'स्मृति' । वेदोंको छोड़कर पुराण, उपपुराण, धर्मशातत्र आदि सब शास्त्र 'स्मृत' (स्मरणके द्वारा प्राप्त) होनेके कारण 'स्मृति' कहलाते हैं। यह पह्कुजकी तरह योगरूढ़ शब्द है। पड्डूज कमलका पर्यायवाची शब्द है। कीचड़से उत्पन्न (पड्लाज्जात इति पह्लज:) होनेके कारण इसमें यह व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ घटित होता है। अतः “योग' है। फिर जोंक आदि अर्थको व्यावृत करनेके लिये कमल-अर्थमें रूढ़ भी माना जाता है। इस तरह 'स्मृत' ग्रन्थ वह कहलाता है, जिसके नित्य-नूतन अर्थको तपःपूत ऋतम्भरा प्ज्ञाके द्वारा स्मरण किया जाता है और बादमें उसे अपने शब्दोंमें बाँध लिया जाता है। पुराण इस तरहसे 'स्पृत' अन्य है। इसका अर्थ नित्य-नूतन है। इसके शब्द कल ब्रह्माके थे और आज व्यासके हैं, किंतु पुराणका अर्थ न तो ब्रह्माकी बुद्धिकी उपज है ओर न व्यासकी ही।
'कृत' अन्थ भी परिस्थिति-विशेषमें " स्मृत' हो सकते मान लीजिये, बीस वर्ष पहले हमने 2 हक पढ़ा था। बादमें परिस्थितिवश उसकी चर्चा भी छूट |यी। आज हम उसे याद करना चाह रहे हैं। ऐसी परिस्थितिमें पहले तो उसका चुँधला अर्थ स्मृति-पटलपर उभरने लगता है। कहीं स्मरणशक्तिने ठीक-ठीक साथ
दिया, तब उसका पूरा-का-पूरा अर्थ याद हो आता है। शब्दोंकी आनुपूर्वी पहले भी याद न थी
अतः उसका स्मरण न हो पायेगा। यदि इस स्मृत (याद किये हुए) अर्थकी हम अपने शब्दोंमें बाँध लेते हैं तो 'भालती-माधव' नामका ग्रन्थ तैयार हो गया | यह गन्थ हमसे 'स्पृत' कहा जायगा, न कि कृत: क्योंकि इस अन्थके अर्थको हमने नहीं बनाया है, इसके बनानेवाले तो भवभूति हैं। हमने तो इसे स्मरणमात्र किया है। हाँ, इस अर्थको हमने अपने शब्दोंमें बाँधा है। इसलिये इस अंशमें हमारा कृतित्व अवश्य है, कितु इतनेसे हम मालती-माधवके 'कर्ता” नहीं हो सकते, केवल 'अनुवादक' हो सकते हैं। यह हुआ “'कृत' मालती-माधव और 'स्मृत' मालती-माघवका भेद । 3]
स्मृत मालती-माधव'में जैसे स्मर्ताका कर्तृत्व नहीं होता, वैसे ब्रह्मा या व्यासद्वारा 'स्मुत' पुराण आदि शाखोंगें भी इनका कर्तृत्व सम्भव नहीं है। ये केवल 'स्मर्ता' कहे जाते हैं।
(ग) “विनिर्गत' अन्य
विनिर्गत' ग्रन्थ वह होता है, जिसका अर्थ, शब्द और उच्चारण किसी युरुषके द्वासा कृत नहीं होता। संस्कृत-वाड्मयमें ऐसे ग्रन्थको 'श्रुति' कहा जाता है। यह भी योगरूढ शब्द है। “श्रूषत्त एव, न केनचित् क्रियत इति श्रुति: ।' अर्थात् जो वाक्यसमूह सुना ही जाता है, किसी पुरुषके द्वारा किया नहीं जाता, उसे 'श्रुति' कहते हैं। यह योग (व्युत्पत्ति) है और यह “श्रुति' शब्द वेद-रूप अन्धमें रूढ भी है।
उदाहरणके लिये रेडियोसे विनिर्मत मालती-माधव'को रखा जा सकता है। मान लीजिये, हम 'मालती-माधव'को रेडियोसे सुन रहे हैं ओर लिपिबद्ध भी करते जा रहे हैं | पुस्तक तैयार हो गयी। प्रश्न है कि इस पुस्तकके कर्ता हम कहे जा सकते हैं क्या ? उत्तर है--नहीं; क्योंकि हमने न तो इस अन्थके शब्दका निर्माण किया है, न अर्थकी कल्पना की है और न उच्चारण ही बनाया है। ये सब-के-सब रेडियोसे विनिर्मत (निकले हुए) हैं। हमने तो इन्हें सुनकर लिखा भर है। इस तरह इस रेडियोसे विनिर्गत 'मालती-माधव'के हम न तो 'कर्ता हो सकते हैं, न 'स्मर्ता' तथा न 'अनुवादक' ही केवल 'लिपिक' हो सकते हैं।
ठीक इसी तरह ब्रह्मा या अन्य ऋषि श्रुतिके वाक्योंके न कर्ता हो सकते हैं न स्मर्ता और न अनुवादक ही ।
* सेदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा +
गज अअीजाआअ कक ऋष कल झककरऋ जज ० 2 3:44. 4: ५ ।] 3: प्मक वऔजज जज का ऋकफ कफ कऊ कक ५ कक्ष जज 20 हा ३ ऋ ऋ जे पक अक ज फ़कफ।
कृत' अन्थ अनित्य होते हैं, किंतु ब्ह्मद्वारा 'स्मृत' अर्थ और 'विनिर्गत' वाक्य नित्य-नूतन होते हैं। इसी बातको व्यक्त करनेके लिये उपर्युक्त वचनमें पुराणके लिये 'स्मृतम” और वेदके लिये “बिनिर्गताः” पद दिये गये हैं|
शट्डा--यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि ऊपर उद्धृत पुराण वचनमें जो 'स्मृतम” और 'विनिर्गता:' पद आये हैं, इनसे पुराण और वेदकी नित्यता नहीं प्रमाणित की जा सकती; क्योंकि इन दोनों पदोंका प्रयोग अनित्य अन्थोंमें भी होता है। जैसा कि अभी-अभी 'स्वृत मालती-माघव” और 'विनिर्गत मालती- माधव'में इनका प्रयोग दिखलाया जा चुका है। इस तरह जब दोनों पद व्यभिचरित हैं, तब इनके प्रयोगसे यह कैसे समझा जा सकता है कि ब्रह्मने 'अर्थतः' नित्य-पुराणको स्मरण किया और उनके मुखोंसे 'शब्दत:', “अर्थतः' और “च्चारणतः' नित्य-वेद उच्चेरित हुए ? रह गयी बात इन दोनों पदोंके योगरूढ होनेकी, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि इनके योगरूढ होनेमें कोई एकतर पक्षपातिनी युक्ति नहीं है। फिर क्यों न इन्हें 'पाचक'की तरह यौमिक ही मान लिया जाय ?
समाधान--इस प्रश्नका उत्थान उद्धुत वचनके प्रसड्रपर दृष्टि न डालनेसे होता है। देखना होगा कि 'ब्रह्मने किस काल और किस्न परिस्थितिमें पुरणको स्परण किया। फिर वह कौन-सी परिस्थिति आयी कि वेद उनके मुखोंसे अपने-आप निकलते चले गये।'
इंतिहाससे पता चलता है कि यह घटना उस समयकी है, जब भौतिक सृष्टिका आरम्भ भी न हुआ था । महाप्रलयमें ब्रह्मको छोड़कर और कुछ न था। जैसे शान्त सागरमें तरंग, फेन, बुदबुदका अस्तित्व नहीं रहता, वैसे ही जीव आदिका महाप्रलयमें पृथक् अस्तित्व नहीं हुआ करता । ब्रह्मने सृष्टिकी इच्छा की और भूत सृष्टिके बाद पहला प्राणी ब्रह्माको उत्पन्न किया । तुरंत उत्पन्न शिशुकी बुद्धि जैसे अत्यन्त अविकसित रहती है, वेसे नवजात ब्रह्माजीकी बुद्धि अविकसित थी। वे स्वर्य समझ नहीं पाते थे कि वे कौन हैं, क्यों हैं और किसने इन्हें उत्पन्न किया है ? इनकी उत्सुकता देखकर भगवानने आकाशवाणीके द्वार इनसे तपस्या करायी | तपस्याके बलपर उनकी दो जिज्ञासाओंका समाधान हो गया। तपोवलसे उन्होंने प्रत्यक्ष देखा कि वे भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे उत्पन्न हैं। भगवानने उनकी शेष जिज्ञासाक
अड्ड ] फफ्फणफ्फ्पक्रमक्रफअफफरककफफफफफफ् फक्क फ फक फ्रफ कफ कफ शक फफ् कफ फऋफऊफक कफ फऋ फज कफ कम फ कऊऊफ फकफऊ फ फऊ कफ फ कस क आज क अ की कफ फ आप: आफ 2 3
समाधानमें कहा कि 'तुम सृष्टिका निर्माणं करो ।' ब्रह्माजीको अब यह समझमें नहीं आ रहा था कि सृष्टि क्या होती है और उसका निर्माण कैसे होता है? ब्रह्माजीने अपनी जिज्ञासा भगवानके सामने रखी। भगवानने कहा--'तुम फिर तपस्या करो। इसीसे तुम जान सकोगे कि सृष्टि क्या है और उसका निर्माण कैसे होता है ?” ब्रह्म फिर तप करने लगे। तपस्या जब सीमापर पहुँचने लगी, तब उसके प्रभावसे उन्हें पुरुण याद आने लगा । यही बात 'पुराणं सर्वशार्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम' --इस पंक्तिसे कही गयी है। अभी तपस्यामें उस पूर्णताकी अपेक्षा थी, जिसके द्वारा उनका हृदय रेडियो बन जाय, जिससे वह ईश्वरके द्वारा प्रेषित वेदोंको प्रतिफलित कर उनके कण्ठोंसे विनिर्गत कर सके | जब तपस्या पूर्ण हुई, तब कहीं भगवानके भेजे हुए वेद उनके हृदयमें प्रतिफलित हुए और कण्ठोंसे उच्चरित होने लगे-- यो ब्रह्माणं॑ विद्धाति पूर्व यो वे वेदांश्न प्रहिणोति तस्मै। (श्वेतन उ० ६। १८) अर्थात् ब्रह्म पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है, फिर तपस्या पूर्ण होनेपर उनके पास वेदोंको भेजता है। 'प्रहिणोति' शब्दसे यह स्वारसिक अर्थ निकलता है कि जैसे रेडियो-स्टेशन शब्दोंको भेजता है और रेडियो उसका प्रतिफलन करता है, वैसे ईश्वरके भेजे हुए वैदिक शब्द ब्रह्माके हृदयमें प्रतिफलित होकर कण्ठोंसे निकलने लगे। विनिर्गमन--हाँ, तो रेडियोसे जिस तरह “िनिर्गत मालती-माधव'का उच्चारण करनेवाला उसका कर्ता नहीं हो जाता, उसी तरह वेदके शब्दोंका, उनमें अनुविद्ध अर्थोका और उदात्त आदि ख्रोंका कर्ता ब्रह्मा नहीं हो सकते। इस तरह इतिहाससे पता चलता है कि ब्रह्माने जिस पुराणका स्मरण किया, वह किसी मनुष्य-कृत मालती-माधवकी तरह “कृत ग्रन्थ नहीं था। वह तो अर्थरूप ब्रह्म ही था। इसी तरह उनके कण्ठोंसे जो बेद निकले उनका भी प्रेषण करनेवाला ब्रह्म ही था और वह प्रेषित शब्द भी ब्रह्म ही था। दृष्ठान्त ओर दाष्ट्रान्तका विवेचन इस तरह जो अनित्य अर्थ है, वह स्मृत और विनिर्गत होकर अनित्य रहता है, यह सही है, किंतु जो “नित्य अर्थ! ओर “नित्य
€ पुराण सर्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् * ४३
धपध्ाफकक फफ्रकफफ फ्फफ कक भय भा फ भो अकु ४५ एफ फ काऋफ्फफु पाया आफ कफ
शब्द' हैं, वे स्मृत ओर विनिर्गत होकर भी नित्य ही रहते हैं। जैसे ब्रह्म नित्य है। अतः वह अरबों लोगोंसे स्मृत होकर भी सदा नित्य ही रहता है, वैसे वेद और पुराणादि शास्त्र नित्य हैं। अतः ये “'विनिर्गत' और 'स्मृत' होकर भी नित्य ही रहते हैं। नित्यतामें प्रमाण स्थूणा-निखनन-न्यायसे वेद और पुराणकी नित्यताके प्रतिपादक कुछ वचन दिये जा रहे हैं--- (क) वेद--ब्रह्मरूप वस्तुतः वेद और पुराण ब्रह्मके स्वरूप हैं। स्वयं बेदने अपनेको ब्रह्मस्वरूप बतलाया है-- ब्रह्म स्वयम्पू ॥ (तै० आ०) पुराणने इसी बातको दुहराया है-- बेदः नारायण: स्वयम्। (बु० ना० पु० ४। १७) ब्रह्मका स्वरूप सद्-रूप, चिद्-रूप और आनन््दरूप होता है-- | विज्ञानमानन्दं ब्रह्म | (बृहदा० ३।९।२८)
'चित् का अर्थ होता है ज्ञान | इस तरह ब्रह्म जैसे नित्य सत्-स्वरूप, नित्य आनन्द-रूप है, वैसे ही नित्य ज्ञान-रूप भी है। ज्ञानमें शब्दके अनुवेधका होना आवश्यक रहता है---
अनुविद्धमिव ज्ञान सर्व शब्देन भाषते। (वाक्यपदीय) नित्य-ज्ञानके लिये नित्य-शब्दका ही अनुवेध होना चाहिये। इस तरह नित्य-शब्द, नित्य-अर्थ, नित्य-सम्बन्धवाले वेद ब्रह्मरूप सिद्ध हो जाते हैं।
(ख) पुराण--ब्रह्मरूप
वेदने पुराणको अपने समान नित्य माना है। यह समता ।
निम्नलिखित मन्त्रसे व्यक्त होती है--- ऋक्ष्व: सामानि छन्दांसि पुराण यजुषा सह। (अथर्व० ११५ ॥७। २४) स्वयं पुराणने अपनेको ब्रह्म-स्वरूप माना है। पुराण वस्तुत: एक- ही है। इसके अठारह प्रकरण ही अठारह पुराण कहे जाते हैं। ये अठारहों प्रकरण अठारह अवयवके रूपमें हैं। अवयवीसे अवयव भिन्न नहीं होता। पद्मपुराणने ब्रह्मको पुराणरूप बतलाते हुए कहा है कि ब्रह्म अनेक रूपोमें अवतरित होता है। उसका एक रूप पुराण भी है-- एकं पुराणं रूप वै। (प० पु०, स्व० खें० ६२ ।२)
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा «
[पुसरणकथा-
यह भी बताया है कि कौन पुराण ब्रह्मका कौन-सा अवयव है,-- जैसे १-त्रह्मपुरण--भगवानका मस्तक, २-पद्मपुरुण--हृदय, ३-विष्णुपुरुण--दाहिनी भुजा, ४-शिवपुराण--बार्यी भुजा, ५-भागवतपुराण--ऊरु-युगल, ६-नारदीयपुराण---नाभि, ७-मार्कण्डेयपुराण--दाहिना चरण, ८-अग्निपुराण--बायाँ चरण, ९-भविष्यपुराण--दाहिना £. घुटना, १०-न्रह्मवैवर्तपुरण--बायाँघुटना, ११-लिज्भपुराण-- दाहिनी घुद्दी, १२-वराहपुराण--बाँयी .. घुट्टी, १३-स्कन्दपुराण--रोएँ, १४-वामनपुराण--त्वचा, १"-कूर्मपुराण--पीठ, १६-मत्स्यपुरुण--मेदा, १७-गरुड- पुराण--मज्जा और १८-न्रह्माप्डपुराण--- अस्थि |
एकं पुराणं रूप जै तत्र पाह्म पर॑ महत्।
ब्राहा मूर्धा हरेरेव हृदय पद्मसंज्ञितम् ॥।
वैष्णवं दक्षिणो बाहुः शैब॑ वामो महेशितुः ।
ऊरू भागवत प्रोक्ते नाभि: स्यान्नारदीयकम् ॥
मार्कण्डेये च दक्षाडिप्रिवांमो ह्याग्नेयमुच्यते ।
भविष्य दक्षिणो जानुर्विष्णोरेव महात्मन: ॥
ब्रह्मवेवर्तससंज्ञध तु वामजानुरुदाहत: ।
लैड़: तु गुल्फर्क दक्ष वाराह॑ वामगुल्फकम्॥
स्कान्दं पुराणं लोमानि त्वगस्य वामन स्मृतम् ।
कौर्म पृष्ठ समाख्यातं मात्स्य मेदः प्रकीर्त्यते ॥
मज्जा तु गारुडं प्रोक्त ब्रह्माण्डमस्थि गीयते।
एवमेवाभवद्िष्णु:;. पुराणावयवों हरिः ॥ (पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड ६२ | २---७) इस तरह वेद और पुराण जब ब्रह्मरूप हैं, तब इन्हें अनित्य कहना स्वतः बाधित है। महाप्रलयमें जब त्रह्मका स्दंश और आनन्दांश विद्यमान रहते हैं, तब उसके चि्देशको भी विद्यमान रहना ही चाहिये। उनका वही चिदंश वेद और पुराण हैं। महाप्रलयके बाद भौतिक सृष्टिके निर्माणके लिये ब्रह्म ब्रह्माको प्रकट करता है और जैसे-जैसे ब्रह्माकी बुद्धिका विकास होता जाता है तथा तपस्थाका सहयोग मिलता जाता है,बैसे-वैसे पहले ब्रह्मरूप पुराणका स्मरण होता है ओर पीछे
बेदका प्राकट्य होता है। बेदोंसे सृष्टि
जबतक त्रह्माके पास वेद नहीं पहुँचे थे, तबतक वे सृष्टि
और इसके निर्माणके विषयसे अनभिज्ञ थे। पुराण और वेदोंकी प्राप्तिकि बाद उनकी सारी दुविधाएँ मिट गयीं। पश्चात् इन्हींकी सहायतासे वे भौतिक सृष्टिकी रचनामें समर्थ हुए। मनुने लिखा है-- बेदशब्देभ्य एवादो पृथक्संस्थाश्व निर्मम । (मनु० १।२१) ब्रह्माद्गारा सम्प्रदायका प्रवर्तन सृष्टि-क्रमका विस्तार होनेपर ब्रह्माजीनी सनक-सनन्दन, वसिष्ठ आदि मानसपुत्रोंको उत्पन्न किया । ब्रह्माने इन्हें पुराण ओर वेदोंको पढ़ाया। इसके बाद वसिष्ठ आदिने अपने शिष्योंको पढ़ाया। इस तरह शास्त्रोंके पठन-पाठनकी परम्पय चल पड़ी, जो आज भी चलती आ रही है-- वेदपुराणाध्ययन गुर्वध्ययनपूर्वकम्, अधुनाध्ययनवत्। व्यासद्वारा संक्षिप्त संस्करण द्वापरके अन्तमें पुराणकी अध्ययन-परम्परामें विशुद्जुलता आ गयी थी। इसका एक कारण यह भी था कि ब्रह्माका स्मरण किया हुआ पुराण बहुत विशाल था। उसमें सो करोड़
* एइलोक थे--
प्रथमममराणां.. पितामहः । मर् ५ र् पुराणं स्वशास्त्राणां प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् । नित्य शब्दमर्य पुण्य॑ शतकोटिप्रविस्तरम् ॥ (मस््यपुराण ३। २-३) इन सौ करोड़ श्लोकोंका पढ़ पाना तब कठिन हो रहा था; क्योंकि आयु और बुद्धिका अधिक हास हो चुका था। आज कलियुगमें ब्रह्मा-स्मुत उस विशालकाय पुराणका पढ़ पाना तो और असम्भव ही है। अतः भगवानकी ज्ञानशक्तिके अवतार वेदव्यासने चार लाख श्लोकॉमें इस ब्रह्माद्ारा सृत पुराणका संक्षेप कर दिया। आज जो पुराण हमारे पास ६ इसके शब्द व्यासजीके बनाये हुए हैं। अबतक त्रह्मा-स्मृत पुराणका कोई संस्करण उपलब्ध नहीं हुआ है। ु ''स्मृत वाक्य'से 'विनिर्गत वाक्य' प्रवल है यहाँ यह भ्रम नहीं होना चाहिये कि 'ब्रह्माकों सर्वप्रथम पुराण स्मृत हुआ, इसलिये यह परवती वेदसे बढ़कर £। क्योंकि इतिहासने स्पष्ट कर दिया है कि पुराण तपस्याऋा
तपश्चचार
अड्डू] * श्रेष्ठ भगवदभक्त कोन हैं? * ड५ फ्रफफफफक्षफक्क्रफफफ्ऊफकफफरा क्क्कक्रफफफफ फ कफ क्र कक कफ फ ऊ फर्क कफ की फल कक ऊ कक जी की कक फीकी फीस माय ताली मरा फफफकफ्स कफ फ़क फफ फफ़फ फफ फ क फक फफ फ क फ़फ फफककफकऋक फ क ऋफफ् फ कक फ ऋ के ऋ फऋऋ ऋ | कफ फ् फाफ कफ ऋ का कफ फू पका कक कक का हू हु कफ हर एव का हु हर हू के. क्रमफ्फऊ कम क्रफ फीफा ऊ _
पूर्णतके पहले स्मृत हुआ, जबकि वेद उसकी पूर्णताके बाद ज्यों-के-त्यों श्रुत॒ हुए। स्मरणमें बुद्धिकी कुण्ठासे गलती हो सकती है, किंतु श्रुत वाक््यमें कुण्ठाका प्रश्न नहीं उठता। इसलिये बेद स्व॒तः प्रमाण है और पुराण आदि स्मृति-वेदमूलक प्रमाण है। मीमांसाने स्पष्ट कर दिया है कि श्रुतिसे स्मृतिके विरोध होनेपर स्मृति अप्रमाण हो जाती है--
विरोधे त्वनपेक्ष स्थात्:'****** ॥ (जै० सू० १।३।३)
यदि स्मृतिकी कोई बात श्रुतिमें न मिल सके तो उरोे अप्रामाणिक न समझना चाहिये, अपितु यह अनुपान करना चाहिये कि इस स्मृतिका मूल कोई-न-कोई श्रुति अवश्य है जो अब अप्राप्य है-- असति हानुमानम'” (जै० सृ०१।३।३)
यह पुराण विश्वकी अद्भुत सम्पत्ति है। इसमें सामाजिक, राजनीतिक आदि जितने वाद हैं, सबका किसी-न-किसी रूपमें
पुराणमें उल्लिखित विषय यदि वेदकी प्राप्त शाखाओंमें
न मिले तो शास्त्रकारोने बतलाया है कि पुराणका वह विषय
मान्य होता है। तब अनुमान करना चाहिये कि तन्मूलक कोई शाखाओंमें अधिकांशका लोप हो गया है। इसके
श्रुति रही होगी | जैमिनि मुनिने तो यहाँतक बतला दिया है कि पठन-पाठनके लिये विशेष सचेष्ट रहनेकी आवश्यकता हे। -+<>व-औंट5--
श्रेष्ठ भगवद्भक्त कोन हैं ? ये हिता: सर्वजन्तूनां गतासूया अमत्सराः। वशिनो निस्पृहा: शान्तास्ते वे भागवतोत्तमा: कर्मणा मनसा वाचा परपीडां न कुर्वते। अपरिग्रहशीलाश्व ते वै भागवताः स्मृता: सत्कथाश्रवणे येषां वर्तते सात्तिकी मतिः। तदभक्तविष्णुभक्ताश्न ते वै भागवतोत्तमा: मातापित्रोश्व शुश्रूषां कुर्वन्ति ये नरोत्तमा: | गड्भाविश्वेश्वरधिया ते वै भागवतोत्तमा: ब्रतिनां चर यतीनां च्॒ परिचर्यापराश्च ये। वियुक्तपरनिन्दाक्ष ते ले भागवतोत्तमा: सर्वेषां हितवाक्यानि ये वदन्ति नरोत्तमा:। ये गुणग्राहिणो लोके ते वै भागवताः स्पृता: आत्मवत् सर्वभूतानि ये पश्यन्ति नरोत्तमा: | तुल्या: शज्रुषु मित्रेषु ते वे भागवतोत्तमा अन्येषामुदरय॑ दृष्टवा येडभिनन्दन्ति मानवाः। हरिनामपरा ये चर ते वै भागवतोत्तमा शिवे चर परमेशे क्ष विष्णो चर परमात्मनि। समबुद्ध्या प्रवर्तन्ते ते वै भागवता: स्मृता
परिचय मिल जाता है। पुराणके समान तत्त्वोंका प्रतिपादन करनेवाला और कोई ग्रन्थ इस समय नहीं है। बेदकी
हल क् म्कक जन, अम्मा अम्मा,
भी भा ४
ह (नारदपुराण १। ५)
जो सब जीवोंके हितैषी हैं, जो दूसरोंका दोष नहीं देखते, जो किसीसे डाह नहीं करते, मन-इन्द्रियॉंको वशमें रखते हैं निःस्पृह और शान्त हैं, वे उत्तम भगवदभक्त हैं। जो कर्म, मन और वचनसे दूसरोंको पीड़ा नहीं पहुँचाते, जिनका संग्रह करनेका स्वभाव नहीं है, वे भगवदभक्त हैं। जिनकी सात्तविकी बुद्धि उत्तम भगवत्कथा सुननेमें लगी रहती है तथा जो भगवान् और उनके भक्तोंके भी भक्त हैं, वे श्रेष्ठ भगवदभक्त हैं। जो श्रेष्ठ मनुष्य माता-पिताके प्रति गड़ाा और विश्वनाथका भाव रखकर उनकी सेवा करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो ब्रतधारियों और यतियोंकी सेवामें लगे रहते हैं और परायी निन्दा कभी नहीं करते वे श्रेष्ठ भगवदभक्त हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष सबके लिये हितभरे वचन बोलते हैं और केवल गुणोंको ही ग्रहण करते हैं, वे हे लोकमें भगवदभक्त हैं। जो श्रेष्ठ पुरुष समस्त जीवोंको अपने ही समान देखते हैं तथा शत्रु-मित्रमें भी समान भाव रखते हे वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं। जो मनुष्य दूसरोंका अभ्युदय देखकर प्रसन्न होते हैं और सदा हरिनामपरायण रहते हैं,वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं और जो परमेश्वर शिव एव परमात्मा विष्णुके प्रति समबुद्धिसे बर्ताव करते हैं, वे श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।
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प्रधान वर्ण्य विषय
पञग्जलक्षणात्मक विषय
“इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपब॒ंहयेत'--इतिहास एवं पुराणोंसे वेदार्थका उपबृंहण करना चाहिये, क्योंकि ये बेदके उपबृहण हैं। वेदादि शास्त्रों, मन्वादि धर्मशा्त्रों, वेदान्तादि दर्शनशास्त्रों तथा पुराणेतिहास-ग्रन्थों--इन सभी शास्त्रोंका लक्ष्य है जीवका कल्याण करना। जीवका श्रेयः सम्पादन तथा उसे भगवद्धाप्ति (मुक्ति) करा देनेमें ही इन सदयन्थोंका पर्यवसान है. यह आत्यन्तिक सत्य है। किंतु यहाँ एक प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि वेदादिके उपस्थित रहनेपर भी इन पुराणग्रन्थोके आविर्भावकी क्या आवश्यकता पड़ी ? जब सभी शास्त्रोंका प्रतिपाद्य एक ही है, सभीका लक्ष्य एक ही है, तब पुराणोंकी क्या उपयोगिता रह जाती है और पुराणों तथा अन्य शाख्तरोंमें क्या अन्तर रह जाता है? बात ठीक है, विचारणीय भी है, किंतु यह तथ्य सर्वदा अविस्मरणीय है कि महर्षि वेदव्यासजी त्रिकालदर्शी थे, जीवमात्रपर उनका यह परम अनुग्रह है कि उन्होंने भगवद्माप्तिके साधनोंका जैसा समावेश पुराणों तथा उपपुराणोंमें कर दिया है, वैसा वर्णन किसी भी शाख्रमें नहीं मिलता । वेदादिके दुरूहतम रहस्योंको भी आख्यान-शैलीके माध्यमसे सरलतंम बनाकर पुराणोंमें विस्तारसे समझाया गया है, जिसे एक साधारण बुद्धिका मानव भी अच्छी तरह ग्रहण कर सकता है। यह पुराणोंका अद्भुत वैशिष्टय है । विषयगत वैशद्यता भी उसका अपना ही वैशिष्ट्य है। उनमें लौकिक तथा पारलीकिक ज्ञानकी सभी बातोंको--जिनका बीज-रूपमें सूत्रपात वेदादि अन्धोंमें हुआ है, विस्तार्से समझाया गया है। तथापि पुराणोंके अपने कुछ मुख्य प्रतिपाद्य विषय हैं, जिनकी उपस्थितिपर ही तत्तद-ग्रन्थोंकी 'पुराण' संज्ञा होती है। पुराणोंकी परिभाषा बताते हुए सभीने यह स्वीकार किया है कि ज्ञात-सत्यार्थभूत- पञ्जललक्षणात्मक आख्यान-उपाख्यान, प्रबन्ध-कल्पनासे युक्त अन्थोंका नाम पुराण है। इस सम्बन्धमें सभी युराणोमें प्रायः स्वल्पशब्दान्तरसे निम्नश्लोक प्राप्त होता है--
सर्गश्च प्रतिसर्गक्ष बवंशो मन्वन्तराणि च।
वंशानुचरित॑ चैव पुराण पश्चलक्षणम् ॥
अर्थात् १-सर्ग, २-प्रतिसर्ग, ३-वंश, ४-मन्वन्तर तथा ५-वंशानुचरित---पुराणों तथा उपपुराणोंके ये पाँच लक्षण हैं । अर्थात् ये ही पाँच विषय पुराणोंके मुख्य प्रतिपाद्य हैं। विष्णुपुराणके आरम्भमें यह स्पष्ट किया गया है कि इन प्रधान विषयोंके अन्तर्गत किन-किन बातोंका समावेश होता है। जगत् तथा उसके नाना पदार्थोकी उत्पत्ति अथवा सृष्टिको 'सर्ग' कहा जाता है। सृष्टिके विपरीत अर्थात् प्रलय तथा पुनः सुष्टि-करणको 'प्रतिसर्ग' कहा जाता है। देव, ऋषि तथा मनुष्योंकी संतान-परम्पराका उल्लेख करना 'वंश' कहलाता है तथा सृष्टिक्रमकी काल-गणना “मन्वन्तर' में मानी जाती है और महर्षियों तथा राजाओंके चरित्रोंके वर्णनको “वंशानुचरित' कहते हैं ।
दशलक्षणात्मक विषय:
सभी पुराणोंने उपर्युक्त पद्चललक्षणोंकों ही पुराण तथा उपपुराणोंका प्रमुख वर्ण्य विषय बताया है, किंतु श्रीमद्धागवत तथा त्ह्मवैवर्तपुराणमें पुराणोंक दस विषयोंका परिगणन करते हुए पाँच लक्षणोंसे युक्त पुराणोंकी उपपुणण तथा दस लक्षणोंबाले पुराणोंकी महापुराण कहा है। इसका क्या रहस्थ है, इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि ये दस विषय कौन-कोनसे हें ?
श्रीमदू्भागवत (१।१०।१-२) में पुराणोंके दस लक्षण इस प्रकार बताये गये हैं--
अन्न सर्गों बिसर्यश्ष स्थान पोषणमृतयः ।
मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो.मुक्तिराश्चयः ॥
द्शमस्य॒ विशुद्धयर्थ नवानामिह लक्षणम।
वर्णयन्ति महात्मान: श्रुतेनाथेंन चाझ्सा ॥
अर्थात् 'इस भागवतपुराणमें सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रव--३7 दस विषयोंका वर्णन है। इनमें जो दसवाँ आश्रय-तत्त ह,
अड्ढू]
# प्रधान वर्ण्य विषय *
, ४७
क्रफफफरफफफफफ्फरककफओ फफ फ्फ फ फ्आक्फ कफ फफ्रफफफ कफ फ कफ क्ररफफ कफ फ फफ फफ फ्रफअफऋ+फऋ्ऊऊक् फ््म फफफ्रफ ऊऋफऋफँ कफ क कफ क्कक् कफ फफ आफ फक्रमफ्ऊ कम फक्फफफ कर क्र फवा कफ फ क्रम फ म फा फफ_
उसीका ठीक-ठीक निश्चय करनेके लिये कहीं श्रुतिसे, कहीं तात्पर्यसे और कहीं दोनोंके अनुकूल अनुभवसे महात्माओंने अन्य नौ विषयोंका बड़ी सुगम रीतिसे वर्णन किया है।' ईश्वरकी प्रेरणासे गुणोंमें क्षोभ होकर रूपान्तर होनेसे जो आकाशादि पदञ्ञभूत, शब्दादि तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, अहंकार और महत्तत््वकी उत्पत्ति होती है उसे 'सर्ग' कहते हैं। उस विराट् पुरुषसे उत्पन्न ब्रह्माजीके द्वारा जो विभिन्न चराचर सृष्टियोंका निर्माण होता है, उसका नाम है 'विसर्ग' | ग्रतिपल नाशकी ओर बढ़नेवाली सृष्टिकी एक मर्यादामें स्थिर रखनेसे भगवान् विष्णुकी जो श्रेष्ठठा सिद्ध होती है, उसका नाम है “स्थान! । अपने द्वारा सुरक्षित सृष्टिमें भक्तोंके ऊपर उनकी जो कृपा होती है, उसका नाम है 'पोषण'। मन्वन्तरोंक अधिपति जो भगवदभक्ति और प्रजापालनरूप शुद्ध धर्मका अनुष्ठान करते हैं, उसे 'मन्वन्तर' कहते हैं। जीवोंकी वे वासनाएँ जो कर्मके द्वारा उन्हें बन्धनमें डाल देती हैं, 'ऊति' नामसे कही जाती हैं । भगवानके विभिन्न अवतारोंक और उनके प्रेमी भक्तोंकी विविध आख्थानोंसे युक्त गाथाएँ. 'ईशकथा' हैं। जब भगवान् योगनिद्रा स्वीकार करके शयन करते हैं, तब इस जीवका अपनी उपाधियोंके साथ उनमें लीन हो जाना निरोध' कहलाता है। अज्ञानकल्पित कर्तृत्व, भोक्तृत्त आदि अनात्मभावका परित्याग करके अपने वास्तविक स्वरूप परमात्मामें स्थित होना ही “मुक्ति' है। इस चराचर जगत्की उत्पत्ति ओर प्रलय जिस तक्त्वसे प्रकाशित होते हैं, वह परम ब्रह्म ही 'आश्रय' हैं। इसीको परमात्मा कहा गया है। यही परमात्मा सबका अधिष्ठान--आश्रय-तत्त्व है। उसका आश्रय वह स्वयं ही है, दूसरा कोई नहीं। इन्हीं दस लक्षणोंको कुछ शब्दान्तरके साथ श्रीमद्- भागवतके ही द्वादश स्कन्धके सातवें अध्यायके नवें श्लोकमें इस प्रकार बताया गया है--- सर्गोडस्याथ विसर्ग्व वृत्ती रक्षान्तराणि च ! वंशो वंशानुचरितं संस्था हेतुरपाश्रयः ॥ अर्थात् १-सर्ग, २-विसर्ग, ३-वृत्ति, ४-रक्षां, ५-मन्वन्तर, ६-वेश, ७-वंशानुचरित, ८-संस्था, ९-हेतु तथा १०-अपाश्रय- ये दस लक्षण पुराणोंके हैं। जब मूलप्रकृतिमें लीन गुण क्षुब्ध होते हैं, तब महत्तत्त्वकी
उत्पत्ति होती है। महत्तत्वसे तामस, राजस ओर बैकारिक (सात्तिक) तीन प्रकारके अहंकार बनते हैं। त्रिविध अहंकारसे ही पञ्ञतन्मात्रा, इन्द्रिय ओर विषयोंकी उत्पत्ति होती है। इसी उत्पत्ति-क्रमका नाम 'सर्ग' है। परमेश्वरके अनुग्रहसे सृष्टिकी सामर्थ्य प्राप्त करके महत्तत्तव आदि पूर्वकर्मोकि अनुसार अच्छी और बुरी वासनाओंकी प्रधानतासे एक बीजसे दूसरे बीजके समान जो यह चराचर शरीरात्मक जीवकी उपाधिकी सृष्टि करते हैं, इसे 'विसर्ग' कहते हैं । चर प्राणियोंके लिये अचर-पदार्थ--जीवन-निर्वाहकी सामग्री 'वृत्ति' है। भगवान् युग-युगमें पशु-पक्षी, मनुष्य, ऋषि, देवता आदिके रूपमें अवतार ग्रहण करके अनेक लीलाएँ करते हैं। इन्हीं अवतारोंमें त्रे वेदधर्मके विरोधियोंका संहार भी करते हैं। उनकी यह अवतार-लीला विश्वकी रक्षाके लिये होती है, इसीलिये उसका नाम रक्षा' है। मनु, देवता, मनुपुत्र, इन्द्र, सप्तर्षि ओर भगवानके अंशावतार--इन्हीं छः बातोंकी विशेषतासे युक्त समयको “मन्वन्तर' कहते हैं। ब्रह्माजीसे जितने राजाओंकी सृष्टि हुई है, उनकी भूत, भविष्य और वर्तमानकालीन संतान-परम्पराको 'वेश' कहते हैं। उन राजाओं तथा उनके वंशधरोंके चरित्रका नाम “बंशानुचरित है। इस विश्व-त्रह्माप्डका स्वभावसे ही प्रलय हो जाता है। इस प्रलयके चार भेद हैं--मैमित्तिक, प्राकृतिक, नित्य और आत्यन्तिक | तत्त्वज्ञ दिद्वानोंने इन्हींको 'संस्था' कहा है। पुराणोंके लक्षणमें 'हेतु' नामसे जिसका व्यवहार होता है, वह 'जीव' ही है; क्योंकि वास्तवमें वही सर्ग-विसर्ग आदिका हेतु है और अविद्यावश अनेक प्रकारके कर्मकलापमें उलझ गयो है। जो लोग उसे चैतन्यप्रधानकी दृष्टिसे देखते हैं, वे उसे अनुशयी अर्थात् प्रकृतिमें शयन करनेवाला कहते हैं और जो उपाधिकी दृष्टिसे कहते हैं, वे उसे अव्याकृत अर्थात् प्रकृतिरूप मानते हैं। जीवकी वृत्तियोंके तीन विभाग हैं---जाग्रतू, स्वप्न ओर सुषुप्ति। जो इन अवस्थाओंमें इनके अभिमानी विश्व, तैजस ओर प्राज्ञके मायामय रूपोंमें प्रतीत होता है और इन अवस्थाओंसे परे तुरीयतत्त्वके रूपमें भी लक्षित होता है, वही ब्रह्म है, उसीको यहाँ 'अपाश्रय' शब्दसे कहा गया है। श्रीमदभागवतके दो स्थलोंपर निर्दिष्ट उपर्युक्त दस लक्षणोंमें सर्वथा साम्य है, यह बात दोनोंके अर्थावबोधसे स्पष्ट
पुराणकथा-
हो जाती है। शब्दान्तर है, परंतु तात्पर्यमें अभेद है। निम्न तालिकासे यह स्पष्ट हो जायगा कि किस विषयका किसके साथ साम्य है--
क्रम | द्वितीय स्कन््धके विषय | द्वादश स्कन्धके विषय
२- | सर्ग सर्ग
२- | विसर्ग विसर्ग
३- | स्थान वृत्ति
४- | पोषण रक्षा
५- | ऊति हेतु
६- | मन्वन्तर अन्तर
७- | ईशानुकथा वंश-बंशानुचरित
८- | निरोध संस्था--नित्य-प्रलय, नैमित्तिक प्रलय, प्राकृतिक ग्रलय
९- | मुक्ति संस्था--आत्यन्तिक प्रलय
१०- | आश्रय अपाश्रय
श्रीमदभागवतके समान ही त्ह्मवैवर्तपुराणने भी पुराणों- को दशलक्षणात्मक बताते हुए उनके दस विषयोंको इस प्रकार गिनाया है-- सृष्टिश्रापि विसृष्टिक्ष स्थिति: तेषां च पालनम् | कर्मणां वासना वार्ता मनूनां त्र क्रमेण च॥ वर्षन॑ प्रलयानां च मोक्षस्थ॒ च निरूपणम् | तत्कीर्तन॑ हरेरेव वेदानां च॑ पृथक पृथक ॥। दशाधिकं लक्षणं च महतां परिकीर्तितम। (श्रीकृष्णजन्मखंण्ड १३३ | ८-१०) अर्थात् 'सृष्टि, विसृष्टि, स्थिति, उनका पालन, कर्मोकी वासना, मनुओंका वर्णन, प्रलयोका वर्णन, मोक्षका निरूपण, श्रीहरिका गुणगान तथा देवताओंका पृथक्-पृथक्् वर्णन-- ये दस विषय पुराणोके हैं ।' ध्यानसे देखनेपर यह निश्चित होता है कि श्रीमद्भागवतके दस लक्षणोंको ही यहाँ शब्दान्तरके पाथ कहा गया है। अर्थमें कोई भेद नहीं है। पाँच लक्षणोंमें दस लक्षणोंका अन्तर्भाव सूक्ष्म विवेचन करनेपर यही निष्कर्ष निकलता है कि अन्य पुराणोंमें सर्ग-प्रतिसर्ग आदि जो पाँच विषय गिनाये गये हैं, श्रीमद्धागवत तथा ब्रह्मवैवर्तमें उन््हींकी विस्तृत कर दस
कक फक फफ फऊआऔफ फफ कफ फ ऋऋ रू ऋ हक
विषय कहा गया है। यह भी कहा जा सकता है कि दश- लक्षणात्मक विषय यूर्वोक्त पाँच विषयोंकी विस्तृत व्याख्या स्वरूप ही हैं। दस लक्षणवाले पुराणको महापुराण मानना तथा पाँच लक्षणवाले पुराणको उपपुराण माननेकी जो बात श्रीमद्भागवतमें कही गयी है, उसका तात्पर्य मात्र यही है कि वह श्रीमद्भागवतका ही मुख्य रूपसे लक्षण है, पुराण- सामान्यका नहीं। क्योंकि ऐसा न माननेपर अर्थात् दश- लक्षणात्मक पुराणोंको ही महापुराण माननेपर तो केवल श्रीमद्भागवत तथा ब्रह्मवैवर्तपुगण--ये दो ही महापुराणकी कोटिमें आयेंगे, अन्य सभी उपपुराण कहे जायँगे। तब तो कहीं अतिव्याप्ति होगी, कहीं अव्याप्ति हो जायगी | जबकि लक्षण या परिभाषाको अतिव्याप्ति, अव्याप्ति तथा असम्भव--इन तीन दोषोंसे रहित होना चाहिये। पुराणोमें विशेष आदरके योग्य विष्णु, पद्म, स्कन्द, मत्य तथा वायु आदिमें यद्यपि दस लक्षणोंकी बात स्पष्ट-रूपसे नहीं दीखती तथापि वे सभी विषय इनमें आ गये हैं। अतः इस दृष्टिसे भी
ये उपपुराण नहीं कहे जा सकते । इसी प्रकार श्रीमद्भागवत तथा विष्णुपुराणमें भी अदभुत
साम्य है। दोनोंके विषय प्रायः एक समान हैं। ऐसी स्थितिमें विष्णुको उपपुराण कथमपि नहीं कहा जा सकता। अत: महापुराणोंके लिये पाँच लक्षणोंका होना आवश्यक है नकि दस लक्षणोंका । वास्तवमें स्थिति यह है कि जो दस विषय बताये गये हैं, उनमेंसे सर्ग, विसर्ग, वंश, वंशानुचरित तथा मन्वन्तर--इन पाँच विषयोंको तो उसमें शब्दतः ग्रहण किया हो गया है, शेष पाँचका भी अत्तर्भाव इन्हीं पाँचोंमें हो जाता है, इसका विशेष विवेचन न करके यहाँ एक तालिका प्रस्तुत की जा रही है, जिससे यह बात स्पष्ट हो जायगी-- '... ?-सर्ग--सर्ग, विसर्ग, हेतु, ऊति, आश्रय, अपाश्रय ।
२-प्रतिसर्ग--संस्था, निरोध |
३-मन्वन्तर--अन्तर ।
४-५०-वंश-वंशानुचरित--वंश, दृत्ति, स्थान-रक्षा,
पोषण-ईशानुकथा ।
जिन विद्वानोंने बहुत अधिक परिश्रमसे ऊहापोहपृर्तक दस लक्षण और पाँच लक्षणोंकी तुलना की है, वे सभी अत्षम इस निष्कर्पपर पहुँचे हैं कि पश्चलक्षणालकता ही वास्तविक
अड्डू]
» पुराणोंमें सभी शास्त्रों, विद्याओं, कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञानका समावेश «
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फ्रफ्रफ्रमऊक्रभकफफ्फ्ककफफ कक +44फ कफ कक कभी कफ कील कील लक कस कल ननननदा चर || फ्कफफफ्रफफफफफऊ%्फफफ़फफरफ कं कम फ ऊ के फ्रफफफ्फफक्रकफफफफफ्फफफफऊऊफ कक ऊ के फ्रफफ फ्फक फ्रफफ्फ्रफफ्फ़् फू $ रे फ ऊ ऊ ऊे फ्फफफ़फऋफफ्रफफफ,
रूपसे पुराणोंकी मुख्य परिभाषा और स्वरूप है और सभी दस लक्षण इन पाँचोंमें ही अन्तर्निहित रहते हैं । पुराणोंके पाँच लक्षणों अथवा पाँच विषयोंके स्थिर हो
जानेपर एक महत्त्वपूर्ण बात यह हो जाती है कि पश्च- लक्षणात्मक जो वर्णन पुराणोंमें है, उस वर्णनका लक्ष्य भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष-रूपसे ईश्वरतत््वका ही निरूपण करना है, क्योंकि सभी पुराणोंने उसे ही अन्तिम सत्य स्वीकार किया है। उसे कहीं विष्णु, कहीं कृष्ण, कहीं शिव तथा कहीं देवी कहा गया है और यही भक्तितत्वका बीजभूत भी है। विष्णुपुरणणने (१।१।३श१में) तो स्पष्ट ही कह दिया है कि--
विष्णो: सकाशादुदभूत॑ जगत् तत्रेव च स्थितम् ।
स्थितिसंयमकर्तासो जगतोउस्थ जगच्च सः ॥
अर्थात् 'यह जगत् विष्णुसे उत्पन्न हुआ हैं, उन्हींमें स्थित : है, वे ही इसकी स्थिति और लयके कर्ता हैं तथा यह जगत् भी वे ही हैं।'
इसीलिये श्रीमद्भागवतमें दस लक्षणोंके विवेचन- « प्रसंगमें कह दिया गया है कि दसवाँ जो आश्रय (त्रह्म, भगवान्) नामक तत्त्व है, उसीके स्वरूप-परिज्ञानके लिये ही नौ तत्वोंको बताया गया है। स्कन्दपुराणका कथन है कि वेदादि शास्त्रों, रामायण, महाभारत ओर पुराणोंमें आदि-मध्य तथा अन्तमें अर्थात् सर्वत्र हरिका ही गुणगान रहता है । इससे यह स्पष्ट होता है कि मुख्य तथा अवान्तररूपसे 'भगवच्चर्चा' ही पुराणोंका अन्यतम प्रतिपाद्य विषय हे। आख्यानों, उपाख्यानों तथा गाथाओंके द्वारा पुराणोंमें उसी परम प्रभुकी महिमाका गान किया गया है।
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पुराणोंमें सभी शास्त्रों, विद्याओं, कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञानका समावेश
पुराण अनन्त ज्ञान-राशिके भण्डार हैं। इनका साहित्य अत्यन्त विशाल है। लौकिक तथा पारलौकिक ज्ञान-विशानके सभी विषय इनमें भरे पड़े हैं। सृष्टिसि आजतकके तथा भविष्यके भी इतिहासको ये अपनेमें सँजोये हुए हैं। पुराणोंका आविर्भाववेदार्थक उपबृंहणके लिये हुआ है। वर्तमानकालतक जितने ज्ञान-विज्ञान, कला तथा विद्याके क्षेत्रेंका और उनकी शाखा-प्रशाखाओंका आविष्कार हुआ है, त्रिकालदर्शी ऋषियोंने इन सभीका सारांश सूक्ष्मरूपसे इन पुराणोंमें संनिवेश किया है। इनका महर्षि वेदव्यासजीने सुचारुरूपसे सम्पादन और वर्गीकरण कर पुराण-अन्थोंके रूपमें प्रस्तुत किया है। महर्षि वेदव्यासजीका यह अद्भुत वैशिष्टय है कि उन्होंने वेदादि शाख्त्रोंमें प्रतिपादित जटिलतम विषयोंको भी आख्यान तथा उपाख्यानोंके माध्यमसे सर्वसाधारणंके लिये भी बोधगम्य बना दिया है। यद्यपि पुराणों तथा उपपुराणोंमें कथाभाग अधिक है तथापि जिज्ञासुओंके लिये अनेक विद्या, कला, ज्ञान, विज्ञान तथा शास्त्रोंका भी
इनमें सूक्ष्म किंतु पुराण-शैलीमें सुस्पष्ट-बोधगम्य विवेचन हुआ है। इस प्रकारके पुराणोंमें वायु, ब्रह्माण्ड, अग्नि, गरुड, | नारद, शिवधर्मोत्तर तथा विष्णुधर्मोत्तर प्रमुख रूपसे गणनीय ' हैं। अग्निपुराणमें तो सभी विद्याओं (परा, अपरा) को बताया गया है--“आग्नेये हि पुराणेउस्मिन् सर्वविद्या: प्रदर्शिता: ।' (अग्नि०ग ३८३ । ५१) | विश्वकोशोंकी परम्परा इन्हींको देखकर आरम्भ हुई होगी। अतः प्राचीनतम विश्वकोश होनेपर भी पवित्रता, रचना-सौष्ठव और श्रेष्ठ पद्चबद्धताको देखते हुए ये आज भी सबसे श्रेष्ठ हैं। ये कण्ठस्थ करनेमें सुगम हैं। इन पुराणों तथा उपपुराणोंमें इतने अधिक विषयोंका समावेश है कि यदि उसकी एक सूचीमात्र भी बनायी जाय तो एक विशाल ' ग्रन्थ तैयार हो जायगा, क्योंकि विद्याएँ तथा कलाएँ अनन्त हैं, ' उनकी कोई इयत्ता नहीं है, उनका परिगणन असम्भव-सा है। तथापि पुराणोंमें एवं उपपुराणोंमें वेदादि शास्त्रों, मन्वादि धर्मशासत्रों तथा अन्य कला-विज्ञान एवं उनके विषयोंका जिस : रूपमें समावेश हुआ है, उसका संख्या-निर्देशपूर्वक
___ ॑ रे ् ्््र् र रडइड_ी् पफपमणप पभप "प*/तकश,कझथ “८ ३-ेटे रुणायणे चैद पुतणेषु च भासते | आदिमध्यावसानिषु हर्स्किज्त्र नापरः ॥ (स्कन्दण काशी० ९७) २, हुश्विश २१४९ में भी कुछ शब्दान्तरसे
यह झलोक प्राप्त होता है ।)
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संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जा रहा है, विशेष जानकारीके लिये पुराण-वाड्मयका गम्भीर अध्ययन करना चाहिये। चार वेद--पुराणोंमें वेदोंका ही विस्तार है। यह तथ्य निर्विवाद है। चारों संहिताओं, ब्राह्मण-ग्रन्थों तथा आरण्यकोंके विषय यहाँ पर्याप्त रूपसे विवेचित हैं। ऋग्वेद की पूरी जानकारीके लिये विष्णुपुरणके तृतीय अंशके चतुर्थ अध्यायका अवलोकन किया जा सकता है। इसी प्रकार यजुर्वेद' शुक्ल तथा कृष्ण--दोनों शाखाओंका विशद वर्णन उसीके पाँचवें अध्यायमें है। फिर साम' तथा अथर्ववेदकी * शाखा-प्रशाखाओंका विवेचन छठे अध्यायमें हुआ है। इसी प्रकार श्रीमद्धागवतके द्वादश स्कन्धके छठे तथा सातवें अध्यायमें चारों वेदोंकी शाखा-प्रशाखाओंका सूक्ष्म वर्णन है । अग्निपुराणमें ऋग्विधान, यजुर्विधान आदि चारों वेदोंके विधान-ग्रन्थोंका सम्यक् रूपसे समावेश किया गया है। इसीके साथ वेदोंके मन्त्र ओर सूक्त भी विभिन्न कर्मकाण्डोंके प्रसज्जमें उल्लिखित हें । वैष्णवोमें भागवत तथा विष्णु आदि पुराणोंकी एवं 'पुरुषसूक्त' की महिमा अपस्मिय है। भागवत तथा विष्णु आदि पुराणोंने समग्ररूपसे इसका अनेक बार उल्लेख किया है। पुराणोंमें वैदिक संहिताओंके मन्त्रोंकी व्याख्या भी विस्तारसे मिलती है। 'विष्णोर्नु क॑ दीर्याणि प्र बोचम्! (ऋक्० १।१५७५४। १) की व्याख्या भागवत (२।७॥।४०) में की गयी है । यहाँतक कि किंचित् शब्दान्तरके साथ पूरा मन्त्र यथावत् मिलता है। इसी प्रकार 'ईशावास्यमिदं सर्वम” इस ईशोपनिषदके मन्त्रकी व्याख्या भागवत (८।१। १०) में मिलती है। 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया” (ऋग्वेद १। १६४ ॥ २०, अथर्व” ९।९।२०) नामक प्रसिद्ध वैदिक मन्त्रकी व्याख्या भागवतके एकादश स्कन्धके ग्यारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें बड़ी विशद्तासे की गयी है। इसी प्रकार 'चत्वारि शुंगा त्रयोउस्थ पादा:” इस ऋग्वेदके पूरे मनत्रको भागवतने ८।१६॥३१ में यथावत् लेते हुए इसका यज्ञपरक अर्थ किया है। वैदिक मन्त्रों तथा सूक्तोंके साथ ही वेदोंमें वर्णित आख्दानोंको पुराणोंमें विस्तारसे देखा जा सकता है, जैसे विष्णु आदिके अवतारकी कथाएँ, पुरूरवा-उर्वशी-आख्यान, शुनःशेप-आख्यान, नाचिकेतो-
* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पौराणिकी शुभा « '
[पुराणकथा-
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पाख्यान, वृत्रासुर-आख्य[न आदि। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि संहिताओंके विषय पुराणोंमें विशद-रूपसे विवेचित हैं । |
चार उपवेद---आत्यन्तिक सूक्ष्म गवेषणापूर्वक विचार करनेपर ऋग्वेदका स्थापत्यवेद ', यजुर्वेदका धर्नुवेंद', सामवेदका गान्धर्ववेद” ओर अथर्ववेदका आयुर्वेद उपवेद निश्चित होता है। विष्णुधर्मोत्तरपुराणमें इन चारों उपवेदोंका साड़्जोपाड़ वर्णन हुआ है। स्थापत्यवेद और शिल्पशासत्रका वर्णन इसमें सर्वाधिक विस्तारसे है । धनुर्वेदका ही वर्णन इसमें प्रायः सौ अध्यायोंमें प्राप्त होता है। गरुडपुराण अध्याय १४६से २०४ तक आयुर्वेदका सम्यक् वर्णन है।
आयुर्वेदके उपभेदोंका भी वर्णन पुराणोंमें प्राप्त होता है । अग्निपुराणके २८९वें अध्यायमें शालिहोत्रसार अश्वायुर्वेदका वर्णन है और २९१वें अध्यायमें बुधके ग्रन्थ गजवैद्यकका सारांश वर्णित है, जिसे गजायुर्वेद . कहा गया है। इसके साथ ही २९२वें अध्यायमें गवायुर्वेदका तथा शान्त्यायुवेंदका . वर्णन है! इनमें घोड़े, हाथी तथा गाय आदिकी चिकित्साका वर्णन मिलता है। इसी अग्निपुराणके २८२वें अध्यायमें वृक्षायुवेंदका . भी वर्णन है। इसका अधिक वर्णन विष्णुधर्मोत्तरमें है। अन्य पशुओंकी चिकित्सा, उनके लक्षण तथा शान्तिके मन्त्र भी विष्णुधमोत्तर, अग्नि तथा गरुडपुराणमें विस्तारसे विवेचित हैं।
छः वेदाड्र--वेदाड्रोंमें व्याकरण. प्रमुख है। इसका नारदपुराणके पूर्वभागके द्वितीय पादके ५१वें अध्यायमें सूक्ष्म किंतु सुन्दर विवेचन हुआ है। नारदपुराणका व्याकरण 'कातन्त्र-व्याकरणका सार है, जिसे माहेश्वर या कौमार-व्याकरण कहा जाता है। इसी प्रकार अग्निपुरणके ३४९वें अध्यायसे ३५९वें अध्यायतक लगभग १० अध्यायोंमें व्याकरणशा्त्रका वर्णन है। छन्दःशासत्र'' या पिड्लशाख्रका वर्णन गरुडपुरणके २०७ से २११ अध्यायतक, नारदपुराणके पूर्व-भागके द्वितीय पादके "छत अध्यायमें वैदिक तथा लौकिक छन्दोंका वर्णन है | इसी प्रकार अग्निपुराणके ३२८वें अध्यायसे ३३५ अध्यायतक
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छन्दःशाख्रका विशद निरूपण मिलता है। ज्योतिषशास््रके लिये नारदपुराण तथा विष्णुधर्मोत्ततकतमा विवेचन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । नारदपुराणके तीन अध्यायों (१। २ | ५४-५६) में त्रिस्कन्ध ज्योतिष (सिद्धान्त, संहिता तथा होरा) का सुन्दर निरूपण है जो नारदीय ज्योतिषके नामसे विख्यात है। निरुक्त' सम्बन्धी सामग्री पुराणोंमें अत्यल्प है। नारदपुराणके पूर्वभागके द्वितीय पादके ५३वें अध्यायमें निरुक्तसे सम्बद्ध थोड़ेसे श्लोक प्राप्त होते हैं, जो मुख्यतया व्याकरणशाख्रके स्वर्वैदिक-प्रक्रिया एवं धातुप्रकरणसे अभिन्न-से प्रतीत होते हैं । वेदादिके पाठका विधान, स्वरोंके उच्चारणकी विधि, सामबेदकी गान-प्रक्रिया और वर्णोके स्पष्ट उच्चारणकी विधि जिस शारूमें वर्णित हो उसे 'शिक्षा” * शास्त्र कहा जाता है। इसका वर्णन नारदपुराणके पूर्वभागके द्वितीय पादके ५०वें अध्यायमें प्रायः तीन सौ श्लोकोंमें तथा अग्निपुराणके ३३६ वें अध्यायमें हुआ है। कल्पों का वर्णन प्रायः पुराणोंमें भरा पड़ा है। कल्पमें वैदिक एवं लौकिक कर्मकाण्डोंका समन्वय है, जिनमें श्रौतसूत्र, गृह्मसूत्र, स्मार्ससूत्र और शुल्बसूत्र--ये चार गृहीत होते हैं! इनका वर्णन भविष्यपुराणमें सर्वाधिक है, जिसमें यज्ञ, इष्टापूर्त तथा संस्कारकी विधियाँ कही गयी हें। वैसे कल्पोंके पाँच भेद होते हैं---(१) नक्षत्रकल्प, (२) वैतानकल्प, (३) संहिताविधानकल्प, (४) आ्विरसकल्प ओर (५) शान्तिकल्प । नक्षत्रकल्पमें यज्ञ और संस्कार आदि कमकि मुहूर्तोका निर्णय होता है। वैतानकल्पमें यज्ञों (हविर्यज्ञ, सोमयज्ञ और पाकयज्ञ--इन तीन संस्थाओं) की साज्लोपाड़ विधि निरूपित होती है। संहिताकल्पमें विशेषकर वेदनिर्दिष्ट अश्वमेध, राजसूयादि यज्ञों और उससे भिन्न भी सभी विधियोंकी सम्पादन-प्रक्रिया प्राप्त होती है। आड्रिरसकल्पमें शत्रु-राष्ट्रीक लिये मारण, मोहन, वशीकरण तथा उच्चाटनादि अभिचारकर्मोका निर्देश है। शान्तिकल्पमें विविध दैव, अन्तरिक्ष, अद्भुत आदि उत्पातों, ईति, भीति आदि भयोंके निवारणका तथा शबर॒राष्ट्रोंद्राग किये गये मारण-मोहनादि प्रयोगोंकी शान्तिविधिका वर्णन है। ये सभी विषय पुराणोंमें विशेषकर भविष्य, अग्नि, गरुड तथा विष्णुधर्मोत्तरमें विस्तारसे प्राप्त होते हैं ।
# पुराणोंमें सभी शास्त्रों, विद्याओं, कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञानका समावेश « ५९
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षड्दर्शन--पुराणोंमें सर्वदर्शनसंग्रहके सभी दर्शनोंके मूलभूत सिद्धान्तोंका समावेश हो गया है। इनमें सबसे प्राचीनतम दर्शन सांख्यदर्श” माना जाता है। सांख्यशासत्रका साड़ोपाड़ वर्णन ब्रह्मपुरणके २३णवठें अध्यायसे लेकर २४४ तक प्राय: दस अध्यायोंमें हुआ है, जो करालजनक तथा महर्षि वसिष्ठके संवादके रूपमें वर्णित है । भागवतके तीसरे स्कन्धके दस अध्यायोंमें कपिल-देवहूति- संवादमें सेश्वर-सांख्यका वर्णन हुआ है, जिसमें २५ तत्तोंका विस्तारसे विवेचन है; किंतु एकादश स्कन्धके २२वें अध्यायमें २८ तत्त्वतक परिंगणित हुए हैं। योग का विषय प्रायः प्रत्येक पुराणोंमें आया है; किंतु सबसे विशद् वर्णन तथा योगदर्शनके साक्षात् पद्चबद्धानुवाद-जैसा ही वर्णन लिंगपुराणके पूर्वार्धके ८ से १० अध्यायों तथा ६६ से ८८ अध्यायोंमें हुआ है। प्राचीनतम योगशाखत्रका विशद वर्णन विष्णुपुराणके धठे अंशमें खाण्डिक्य और केशिध्वजके संवादमें तथा स्कन्दपुराणके काशीखण्डके ४१वें अध्यायमें लगभग १९० श्लोकॉमें हुआ है।
पूर्वमीमांसा , प्राचीनन्याय.. नव्यन्याय. और वैशेषिकदर्शनका . पुराणोंमें यद्यपि खतन्त्र शीर्षकके रूपमें वर्णन परिलक्षित नहीं होता तथापि पुराणोंके विभिन्न प्रकरणोंमें इन दर्शनोंके सिद्धान्तोंका प्रतिपादन हुआ है। विष्णुधर्मोत्तर- पुराणके तृतीय खण्डके चार, पाँच तथा छः अध्यायोंमें इनका कुछ संक्षेपसे किंतु अतिस्पष्ट विवेचन किया गया है। वहाँ न . केवल विवेचन ही है, अपितु अत्यन्त प्रौढ़ पदावलीमें दर्शन- शासत्रोकी भाँति गद्ययुक्त लम्बे सूत्रोंद्मर पारिभाषिक शब्दावलीमें उनके विषयोंको वर्गीकृत कर समझाया गया है। उदाहरणके लिये न्यायदर्शनके पदार्थोकी परिगणना इस प्रकार की गयी है---“अधिकरणं योग: पदार्थ: हेत्वर्थ उद्देश्यो निदेश: प्रदेशोडतिदेश: अपवर्गो वाक्यविशेषो<र्थापत्ति: प्रसंग एकान्तो नैकान्तः पूर्वपक्षो निर्णयो विधानपर्यायोउति- क्रान्तावेक्षणं॑ संशयो व्याख्यानमनुमतिः स्वसंज्ञानिर्वक्नन दृष्टान्तो वियोगो विकल्प: समुच्चयोऊर्थ इति । (विष्णुधर्मो० ३।६ गद्यभाग) |
आत्मतत्त्व, औपनिषदज्ञान, उत्तरमीमांसा, ब्रह्मसूत्र या
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* सदा सेव्या सदा ध्येया कथा पोराणिकी शुभा + :!
[पुराणकथा-
नं गंगा पक जया मल मम ल सल तल पीकर कफ कफ फ्रफफफ कफ फ फफक कफ कफ फ्फ का क्रफफऋर कफ फ कफ क क्र क कफ फ्रक आमिर अक्रफ # ऊ फफफ ऋ पका कक आफ पा क क कर ऊ क फफ् फा भा का कभी करफफफअऋफ फऊ कफ फ फ फक क फ फ ऋ कर फक्रफफऋफ कक कक
वेदान्तका * निर्देश सभी पुराणोंमें विस्तारसे हुआ है। जिनमें भागवतका एकादश स्कन््ध, विष्णुपुराणका छठा आरश, गरुडपुराणके पूर्वभागके २३५ से २३९ तकके अध्याय मुख्य हैं। ब्रह्मसूत्रमें प्रायः आरम्भके सूत्र 'अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा' (१ । १।१) से लेकर द्वितीय अध्यायके “अविरोधश्चवन्दनवत' (२।३।२३) सूत्रतक इस आत्मतत्त् (ब्रह्म) की सर्वव्यापकताका वर्णन किया गया है और अन्तमें अर्चि और धूममार्गका सभी श्रुतियोंसे समन्वय दिखाकर आत्माको सर्वव्यापक और मुक्त दिखाया गया है। 'अर्चिरादिना तत्मथिते:' (४।३। १) से ब्रह्मप्राप्तिकी बात कही गयी है। ब्रह्मसूत्रके इन सूत्रोंका भाष्य विष्णुपुराणके द्वितीय अंशके १५ तथा १६ वें अध्यायमें कितने सुन्दर ढंगसे हुआ है, इसके लिये एक श्लोक उदाहरण-स्वरूप दिखलाया जा रहा है, जिसमें ऋभु तथा निदाथके संवादमें आत्मा (परमात्मा) की सर्वव्यापकता दिखलायी गयी है-- एक: समस्त यदिहास्ति किल्षित् तदच्युतो नास्ति परं॑ ततोडन्यत् |. सोडह॑स॒ च त्वं स च सर्बमेत- दात्मस्वरूप॑ त्यज भेदमोहम् ॥ (विष्णु० २। १६ | २३) अर्थात् 'इस संसारमें जो कुछ है,वह सब एक आत्मा ही है और वह अविनाशी है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है | मैं, तू और ये सब आत्म-स्वरूप ही हैं, अतः भेद-ज्ञानरूप मौहको छोड़ ।' इसी प्रकार श्रीमद्धागवतके दशम स्कन्धके चौदहवें अध्याय तथा तीसरे स्कन्धके ३२वें अध्यायमें वेदान्तके सिद्धान्तोंका महत्त्वपूर्ण वर्णन है। ब्रह्मसूत्रके प्रथम अध्यायके प्रथमपादके द्वितीय सूत्र 'जन्माद्यस्थ यतः' में ब्रह्मका लक्षण किया गया है। श्रीमद्धागवतका प्रारम्भ ही इस सूत्रको लेकर
हुआ है। यथा-- जन्मादास्य यतोउन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराद
तेने ब्रह्म हदा य आदिकवये मुहायन्ति यत्सूरय:। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसगोंठमृषा
धाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्य पर धीमहि 7 (१।१।१)
अर्थात् 'जिससे इस -जगत्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं---क्योंकि वह सभी सद्गूप पदार्थेमिं अनुगत है और असत-पदार्थोंसे पृथक् 'है; जड नहीं चेतन है, परतन्त्र नहीं स्वय॑ प्रकाश है, जो ब्रह्मा अथवा हिरण्यगर्भ नहीं प्रत्युत उन्हें अपने संकल्पसे ही जिसने उस वेदज्ञानका दान किया है, जिसके सम्बन्धमें बड़े-बड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं, जैसे तेजोमय सूर्यरश्मियोंमें जलका, जलमें स्थलका ओर स्थलमें जलका भ्रम होता है, वैसे ही जिसमें यह त्रिगुणमयी जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्तिरूपा सृष्टि मिथ्या होनेपर भी अधिष्ठान- सत्तासे सत्यवत् प्रतीत हो रही है, उस अपनी स्वयंप्रकाश ज्योतिसे सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्यसे पूर्णतः मुक्त रहनेवाले परम सत्यरूप परमात्माका हम ध्यान करते हैं।'
श्रीमद्धागवतके अन्तमें भी स्पष्ट-रूपसे कहा गया है कि 'समस्त उपनिषदोंका सार है ब्रह्म और आत्माका एकत्वरूप अद्वितीय सदवस्तु ।' यही श्रीमद्धागवतका प्रतिपाद्य विपय है । इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैवल्यमोक्ष | इस प्रकार अथ तथा इतिकी एकवाक्यतासे वेदान्तशास्त्रका ही परिपाक श्रीमद्धागवतपुराणमें हुआ है ।
वैष्णवर्दर्शन और पुराण--वेदान्त-दर्शनके अन्तर्गत तीन ग्रन्थ हैं--'उपनिषद्', “वेदान्तसूत्र' तथा “श्रीमद्धगवद- मीता /' इन तीनोंको 'प्रस्थानत्रयी' कहा जाता है । प्रथम प्रस्थान अर्थात् ईशादि बारह उपनिषदोंका नाम 'श्रुतिप्रस्थान' है। दूसरा प्रस्थान जिसे “न्यायप्रस्थान' भी कहते हैं, 'ब्रह्मसृत्र' है। इन ब्रह्मसूत्रोंका नाम वेदान्तसूत्र, शारीरकमीमांसा, उत्तरमीमांसा भी है। ब्रह्मसूत्रोके रचयिता भगवान् बादरायण अशभथा श्रीवेटव्याजी हैं। तीसरा प्रस्थान 'स्मृतिप्रस्थान या 'मीता-प्रस्थान कहलाता है। यहाँ केवल प्रस्थानत्रयौक द्वितीय प्रस्थान ब्रह्मसूत्रके बेष्णव भाष्योपर विचार किया जा रहा है। | |
ब्रह्मसूत्रके आधारपर अनेकों वेण्णबाचायेत्रि अपन मतवाद स्थापित किये हैं और भाष्यकी रचना की #. जिनमें रामानुजभाष्य, वल्लभाचार्य भाष्य, मध्याचार्सभास, निम्बार्कभाष्य,. भास्कराचार्यभाष्य,. विश्ञानिक्षुभाएर, श्रीकण्ठाचार्यभाष्य प्रमुख हैं। ये सभी आचार्य शवः्स
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परवर्ती हैं। इन सभी प्रधान आचायेनि अपने मतवादकी पुष्टिमं उपनिषदोंके साथ-साथ विष्णु, भागवत आदि पुराणोंक अनेक वचनोंको उद्धृत किया है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराणोंमें इन आचायेके सिद्धान्तोंका पूर्ण परिपाक उपलब्ध है। यहाँ इन्हीं प्रमुख आचायकि मतोंका पौराणिक परिध्रेक्ष्यमें संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है । विशिष्टाद्वैतर्र्शन --इसके संस्थापक श्रीरामानुजाचार्य हैं। ब्रह्मसूत्रपर इनकी व्याख्या 'श्रीभाष्य' के नामसे विख्यात है। इनका कहना है कि ब्रह्म एक है और उसमें तीन वस्तुएँ हैं-"“/- (१) जड प्रकृति, (२) चेतन आत्मा और (३) सर्वनियन्ता, सत्यज्ञान, आनन्दस्वरूप निखिल कल्याणगुणोंका भाजन परमेश्वर। ब्रह्मका अद्वैत ही इन तीनों पदार्थोकी समष्टिका नाम है। इस प्रकारके विशिष्ट ब्रह्मको श्रीरामानुजाचार्य विशिष्टाद्रैत कहते हैं। अपने श्रीभाष्यमें उन्होंने अपने मतकी पुष्टिमें विष्णुपुराणके अनेक वचन उद्धृत किये हैं। आचार्यने विष्णुपुरणके आधारपर पहले परमात्माको ज्ञानस्वरूप मानकर फिर जीव और मायासे विशिष्ट उसे अनेक रूपोंमें विवर्तित दिखाया है और फिर तत्त्वतः उसे परमात्मा माना है। इस सिद्धान्तके प्रतिपादनमें उन्होंने विष्णुपुराणके द्वितीय अंशके श१रवें अध्यायके ३९ से ४५ तकके श्लोकोंको विशेष समारोहके साथ अपने श्रीभाष्य (श्रीवत्सप्रदीप, मद्राससे प्रकाशित, वर्ष १९६३)के पृष्ठ २७ में उद्धृत किया है। उनमेंसे एक-दो वचन इस प्रकार हैं। यथा-- ज्ञानस्वरूपो भगवान् यतोउ्सावशेषमूर्तिन तु॒बस्तुभेदः । ततो हि शैलाब्धिधरादिभेदाज्जानीहि विज्ञानविजृम्भितानि ॥ (२। १२। ३९) अर्थात् 'क्योंकि भगवान् विष्णु ज्ञानस्वरूप हैं, इसलिये वे सर्वमय हैं, परिच्छिन््न पदार्थाकार नहीं हैं। अतः इन पर्वत, समुद्र और पृथ्वी आदि भेदोंको तुम एकमात्र विलास जानो।' इसी प्रकार-- सदा तु शुद्ध निजरूपि सर्व कर्मक्षये ज्ञानमपास्तदोषम । तेदा हि संकल्पतरो: फलानि भवन्ति नो वस्तुषु वस्तुभेदाः ॥ जिस समय जीव आत्ज्ञानके द्वारा दोषरहित होकर सम्पूर्ण कर्मोका क्षय हो जानेसे अपने शुद्ध स्वरूपमें
* पुराणोंमें सभी शास्त्रों, विद्याओं, कलाओं तथा ज्ञान-विज्ञानका समावेश » ५३
रफफफ फफफफफफ कफ फ्फक फक्रमक कफ फ्कऊ कक फऋफ फ्ररफ़रफ ऋक्् कक कफ कफ कक फेक कफ ऋफ फ कर्फे की वीक ्फफफफ्फफफ़फऊफफ फफ फफफफफफफफफफऊफ
स्थित हो जाता है, उस समय आत्मवस्तुमें संकल्पवृक्षके फलरूप पदार्थ-भेदोंकी प्रतीति नहीं होती।' पुनः आगे कहा गया है कि विज्ञानसे अतिरिक्त कभी कहीं कोई पदार्थादि नहीं है। अपने-अपने करमोके भेदसे भिन्न-भिन्न चित्तोंद्रार एक ही विज्ञान नाना प्रकारसे मान लिया गया है। वह विज्ञान अति विशुद्ध, निर्मल, निःशोक ओर लोभादि समस्त दोषोंसे